दिवाली की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। अगर आप पीछे मुड़कर देखें तो याद आएगा कि त्योहारों पर घर की सजावट सिर्फ रेडीमेड स्टिकर्स या प्लास्टिक के दीयों तक सीमित नहीं होती थी। लोग अपने हाथों से आंगन और दीवारों पर बेहद खूबसूरत आर्ट उकेरती थीं। आज के मॉडर्न दौर में जब हम वापस अपनी जड़ों की तरफ लौट रहे हैं तो इस दिवाली क्यों न हम बिहार की फेमस 'मधुबनी आर्ट' को अपनी सजावट का हिस्सा बनाएं।
ऐसे बनती है 'मधुबनी आर्ट'
प्राचीन और पारम्परिक: मधुबनी या मिथिला पेंटिंग बिहार के मिथिला क्षेत्र की एक बेहद प्राचीन लोक कला है। इसे खास तौर पर त्योहारों, शादियों और शुभ मौकों पर घर की दीवारों और फर्श पर बनाया जाता है। इसमें प्रकृति, भगवान राम-सीता, सूर्य, चंद्रमा और जियोमेट्रिकल शेप्स को उकेरा जाता है।
पूरी तरह इको-फ्रेंडली: इसे बनाने का तरीका पूरी तरह नेचुरल है। ट्रेडिशनल तौर पर इसे बनाने के लिए चावल के पेस्ट और नेचुरल कलर्स का इस्तेमाल किया जाता है। हल्दी से पीला रंग, फूलों (जैसे पलाश) से लाल या नारंगी और काजल या कालिख से काला रंग तैयार किया जाता है।
बारीक और वाइब्रेंट डिजाइन: इस कला की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें कोई भी जगह खाली नहीं छोड़ी जाती। खाली जगहों को भरने के लिए फूल-पत्तियों और बारीक लाइनों का इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए उंगलियों, बांस की तीलियों या माचिस की तीलियों का इस्तेमाल ब्रश की तरह किया जाता है।

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