करवा चौथ बस दो दिन दूर है। अगर आप थोड़ा पीछे मुड़कर अपने बचपन की यादों में जाएं तो आपको याद आएगा कि कैसे मम्मी या दादी करवा चौथ की पूजा के लिए जमीन या लकड़ी की चौकी पर सफेद घोल से खूबसूरत डिजाइन बनाया करती थीं। उन डिजाइन्स में चांद, तारे, कलश, स्वास्तिक और करवा माता उकेरी जाती थीं। हाथ से बनाए जाने वाले इस बेहद खूबसूरत डिजाइन को 'ऐपन आर्ट' कहा जाता है। तो क्यों न हम अपनी जड़ों की ओर लौटें और इस कला को फिर से एक्सप्लोर करें।
ऐसे बनती है 'ऐपन आर्ट'
- मूल रूप से उत्तराखंड (कुमाऊं क्षेत्र) से जुड़ी यह एक बेहद प्राचीन और पारंपरिक लोक कला है। इसे शुभ मौकों, त्योहारों और पूजा-पाठ में घर के आंगन, देहरी और पूजा की चौकी पर बनाया जाता है। यह पूरी तरह से इको-फ्रेंडली होती है।
- इसे बनाने का तरीका बहुत ही आसान लेकिन दिलचस्प है। सबसे पहले जमीन या चौकी को 'गेरू' (लाल मिट्टी) से रंगा जाता है। इसके बाद भीगे हुए कच्चे चावलों को सिलबट्टे या मिक्सी में पीसकर एक सफेद लिक्विड पेस्ट तैयार किया जाता है जिसे लोकल लैंग्वेज में 'बिस्वार' कहते हैं।
- इसी सफेद घोल में उंगलियों के पोरों को डुबोकर गेरू के लाल बैकग्राउंड पर बेहद बारीक और ज्योमेट्रिकल डिजाइन बनाए जाते हैं। लाल और सफेद रंग का यह कंट्रास्ट देखने में बहुत ही एस्थेटिक और वाइब्रेंट लगता है।
करवा चौथ और ऐपन का पवित्र कनेक्शन
करवा चौथ की पूजा में चंद्रमा, तारे और सुहाग के प्रतीकों का सबसे ज्यादा महत्व होता है। 'ऐपन' में लाल रंग को सुहाग, सौभाग्य और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है जबकि चावल का सफेद रंग शांति, पवित्रता और चंद्रमा की शीतलता को दिखाता है। जब महिलाएं करवा चौथ पर ऐपन से देवी-देवताओं के चरण, चांद-तारे या करवा का चित्र बनाती हैं तो हर डिजाइन के पीछे घर की सुख-शांति की प्रार्थना छिपी होती है।

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