Last Updated:January 03, 2026, 11:39 IST
IB-CIA Nuclear Mission: न्यूक्लियर प्रोग्राम हमेशा से एक संवेदनशील मसला रहा है. पश्चिमी देश खासकर अमेरिका किसी भी देश की ओर से किए जाने वाले परमाणु परीक्षण को रोकने का हर संभव प्रयास किया जाता रहा है. 60 के दशक में जब चीन परमाणु परीक्षण कर रहा था, तब आईबी और सीआईए ने मिलकर मिशन चलाया था. इसमें न्यूक्लियर कैप्सूल खो गया था. रेडिएशन की तमाम आशंकाओं के बीच मशहूर न्यूक्लियर साइंटिस्ट अनिल काकोडकर ने परमाणु विकिरण की किसी भी आशंका को खारिज किया है.
IB-CIA Nuclear Mission: चीन के न्यूक्लियर प्रोग्राम पर नजर रखने के लिए भारत और अमेरिका ने ज्वाइंट मिशन लॉन्च किया था. एटोमिक कैप्सूल हिमालय में इंस्टॉल करने की कोशिश की गई थी, पर एवलांच की वजह से वह कैप्सूल गुम हो गया था, जो अभी तक नहीं मिला है. रेडिएशन का खतरा जताया जा रहा है. (फाइल फोटो/AP)IB-CIA Nuclear Mission: वर्ष 1965 में उत्तराखंड के नंदा देवी क्षेत्र में एक सीक्रेट मिशन के दौरान हिमस्खलन (Avlanche) में खोए न्यूक्लियर कैप्सूल (परमाणु उपकरण) को लेकर समय-समय पर उठने वाली आशंकाओं पर पूर्व परमाणु ऊर्जा आयोग (AEC) अध्यक्ष अनिल काकोडकर ने स्पष्ट और सख्त शब्दों में कहा है कि इससे किसी भी तरह का रेडिएशन या पर्यावरणीय खतरा बिल्कुल नहीं है. उन्होंने कहा कि इस उपकरण से उत्तराखंड या गंगा नदी क्षेत्र में किसी तरह की आपदा की आशंका शून्य है. अनिल काकोडकर ने कहा, ‘बिल्कुल शून्य. मेरी समझ के अनुसार उस परमाणु उपकरण के टूटने या उससे रेडिएशन फैलने की संभावना न के बराबर थी.’ उनका यह बयान इसलिए अहम माना जा रहा है, क्योंकि हाल के महीनों में फिर से ऐसी रिपोर्टें सामने आई हैं, जिनमें दावा किया गया है कि अक्टूबर 1965 में खोया गया SNAP-19-C नामक परमाणु कैप्सूल आज भी पर्यावरण के लिए खतरा बन सकता है. काकोडकर ने बताया कि यह उपकरण बेहद मजबूत बनाया गया था और खास बात यह थी कि वह जंग-रोधी (corrosion-free) था. उन्होंने कहा कि उस समय परमाणु कैप्सूल की संरचना और उसकी सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया था. उन्होंने कहा, ‘मुझे उस परमाणु कैप्सूल की गुणवत्ता और मजबूती की पूरी जानकारी है. उसकी मजबूती बहुत अच्छी थी, इसलिए किसी तरह की चिंता की कोई वजह नहीं है.’
दरअसल, यह पूरा मामला एक बेहद गोपनीय मिशन से जुड़ा है, जो भारत की खुफिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) और अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA का संयुक्त अभियान था. इसका उद्देश्य हिमालय के नंदा देवी शिखर के पास एक निगरानी उपकरण स्थापित करना था, ताकि चीन द्वारा किए जाने वाले परमाणु परीक्षणों पर नजर रखी जा सके. इस मिशन के लिए बिजली की जरूरत थी और उस समय कठिन पर्वतीय परिस्थितियों में परमाणु ऊर्जा को सबसे उपयुक्त समाधान माना गया. यह मिशन चीन के पहले परमाणु परीक्षण के बाद शुरू किया गया था. चीन ने 16 अक्टूबर 1964 को शिनजियांग के लोप नोर क्षेत्र में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया था. इसी के जवाब में भारत और अमेरिका ने मिलकर हिमालय में यह निगरानी मिशन तैयार किया. इस अभियान का नेतृत्व प्रसिद्ध भारतीय पर्वतारोही एमएस कोहली ने किया था. ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, 1965 में खराब मौसम और भारी हिमस्खलन के कारण यह मिशन सफल नहीं हो सका और परमाणु उपकरण बर्फ में दबकर खो गया. इसके बाद से यह कैप्सूल कभी बरामद नहीं हो पाया. कई दशकों तक यह पूरा ऑपरेशन पूरी तरह गोपनीय बना रहा.
भारत के मशूहर न्यूक्लियर साइंटिस्ट अनिल काकोदकर ने हिमलाय में के नंदा देवी पीक एरिया में गुम परमाणु कैप्सूल से किसी तरह का खतरा न होने की बात कही है. (फाइल फोटो/PTI-AP)
मोरारजी देसाई के खुलासे से सन्न रहा गया था देश
इस रहस्यमय मिशन की जानकारी पहली बार अप्रैल 1978 में सामने आई, जब अमेरिकी पत्रिका ‘आउटसाइड’ में खोजी पत्रकार हॉवर्ड कोन ने ‘द नंदा देवी केपर’ शीर्षक से एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इसके बाद भारत में इस मुद्दे पर तब चर्चा शुरू हुई, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने 17 अप्रैल 1978 को संसद में इस गुप्त ऑपरेशन का खुलासा किया. हाल के वर्षों में यह मामला फिर चर्चा में आ गया है. उत्तराखंड पर्यटन विभाग ने आशंका जताई थी कि यह खोया हुआ परमाणु उपकरण पर्यावरण के लिए खतरा बन सकता है. इसके अलावा भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने भी सोशल मीडिया पर सवाल उठाया था कि क्या यह उपकरण पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है. एक पूर्व रॉ (RAW) अधिकारी आरके यादव ने भी इस विषय पर चिंता जताते हुए 2019 में ‘न्यूक्लियर बॉम्ब इन गंगा’ नामक किताब लिखी थी, जिसमें उन्होंने गंगा नदी और आसपास के क्षेत्रों पर संभावित खतरे की बात कही थी.
अनिल काकोडकर का क्या है दावा?
अनिल काकोडकर का कहना है कि इन सभी आशंकाओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. उन्होंने दोहराया कि उस समय इस्तेमाल किया गया परमाणु उपकरण इतना मजबूत था कि उसके टूटने या रेडिएशन फैलने की संभावना लगभग नहीं के बराबर थी. साथ ही इतने वर्षों बाद भी अगर वह उपकरण बर्फ के नीचे सुरक्षित है, तो उससे किसी तरह का पर्यावरणीय नुकसान होने का सवाल ही नहीं उठता. काकोडकर के बयान से यह स्पष्ट होता है कि नंदा देवी में खोए परमाणु उपकरण को लेकर फैलाई जा रही आशंकाएं अधिकतर अफवाहों और अपुष्ट रिपोर्टों पर आधारित हैं. एक शीर्ष परमाणु वैज्ञानिक के रूप में उनका यह आश्वासन न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि उन लोगों के लिए भी राहत की बात है जो उत्तराखंड और गंगा क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं.
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बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु...और पढ़ें
Location :
New Delhi,Delhi
First Published :
January 03, 2026, 11:38 IST

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