लद्दाख वार्ता में नया दावेदार:बौद्ध समुदाय ने बनाया ‘वॉयस ऑफ बुद्धिस्ट लद्दाख'

7 hours ago

दिल्लीः केंद्र शासित प्रदेश बनने के पांच साल बाद लद्दाख की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर आ गयी है. लेह लद्दाख के हित के लिए केंद्र सरकार के साथ बातचीत में अब एक और दावेदार सामने आ गया. बौद्ध समुदाय ने ‘वॉयस ऑफ बुद्धिस्ट लद्दाख’ नाम से एक अलग ग्रुप का गठन किया है. वॉयस ऑफ बुद्धिस्ट लद्दाख (VBL) के औपचारिक गठन ने न केवल लद्दाख की आंतरिक सामाजिक-राजनीतिक संरचना को झकझोर दिया है, बल्कि गृह मंत्रालय (MHA) के साथ चल रही बातचीत की दिशा और स्वरूप दोनों को नए सिरे से परिभाषित कर दिया है.

2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद जब लद्दाख को UT का दर्जा मिला, तभी से जमीन, पर्यावरण, सांस्कृतिक पहचान, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और विधानसभा सीट जैसे मुद्दों पर चर्चा गरम है. केंद्र सरकार लगातार इन मुद्दों को लेकर वहाँ के स्थानीय कमिटी से बातचीत कर रही है. जानकारी के लिए बता दें कि लद्दाख के मुद्दों और विषय की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार ने हाई-पावर्ड कमेटी (HPC) का गठन किया है, ताकि लद्दाख के प्रतिनिधियों के साथ संस्थागत संवाद हो सके. हालांकि बौद्ध समुदाय के प्रभावशाली वर्गों का आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया में उनकी आवाज न केवल कमजोर पड़ी, बल्कि कई अहम मुद्दों पर उन्हें हाशिये पर रखा गया. यही वजह रही है कि वरिष्ठ बौद्ध धर्मगुरुओं और प्रमुख नागरिकों ने द्वॉयस ऑफ बुद्धिस्ट लद्दाख का गठन किया.

अब तक लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) को केंद्र सरकार का मुख्य वार्ताकार माना जाता रहा है. लेकिन VBL के आने से यह स्पष्ट हो गया है कि लद्दाख के भीतर “एक स्वर” की धारणा दरक रही है. बौद्ध समुदाय को यह आशंका थी कि LAB-KDA द्वारा तैयार किए गए मसौदा प्रस्तावों में उनके दीर्घकालिक हित-विशेषकर भूमि सुरक्षा, जनसांख्यिकीय संतुलन और सांस्कृतिक संरक्षण समझौतों की भेंट चढ़ सकते हैं.

VBL के गठन के ठीक अगले दिन संयोजक स्करमा नामतक के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल का उपराज्यपाल से मुलाक़ात की, जिससे ये संकेत मिलता है कि यह मंच खुद को प्रतीकात्मक संस्था तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि नीति-निर्माण की प्रक्रिया में प्रत्यक्ष दखल चाहता है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि VBL की एंट्री से केंद्र और लद्दाख के बीच चल रही वार्ता जटिल जरूर होगी, लेकिन इससे समझौते की वैधता भी बढ़ सकती है. अब यदि कोई अंतिम समाधान निकलता है, तो उसे यह दावा करना होगा कि वह केवल संगठनों का नहीं, बल्कि समुदायों का भी प्रतिनिधित्व करता है.

सर्वसम्मति से संयोजक चुने गए स्करमा नामतक को लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन (LBA), LAB, HPC, UT प्रशासन और MHA से समन्वय का दायित्व सौंपा गया है. यह भूमिका VBL को एक “ब्रिज” बनने का अवसर देती है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यदि संतुलन नहीं साधा गया, तो यह मंच एक समानांतर सत्ता केंद्र के रूप में उभर सकता है. VBL का उदय लद्दाख की राजनीति में एक गहरे बदलाव का संकेत है. जहां अब मांगें केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि पहचान-आधारित स्वर में मुखर हो रही हैं. यह बदलाव केंद्र के लिए चेतावनी भी है और अवसर भी.

स्पष्ट है कि अब लद्दाख-MHA संवाद दो पक्षों तक सीमित नहीं रहा. वार्ता की मेज बड़ी हो चुकी है — और साथ ही बढ़ गए हैं दांव.

लद्दाख मसले पर गृहमंत्रालय के साथ बैठकों का इतिहास
अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग कर लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश (UT without legislature) बनाया गया. शुरुआत में फैसले का स्वागत हुआ, लेकिन जल्द ही भूमि सुरक्षा, नौकरियों, संस्कृति और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर असंतोष उभरने लगा. लद्दाख को विधानसभा न देने के फैसले पर भी क्षेत्र मे विरोध दर्ज होना शुरु हुआ.

2020–2021 मे लेह लद्दाख मसले पर कई मांगें तेज हुयी और दिल्ली पर दबाव बढ़ने लगा. लेह और करगिल दोनों जिलों में अलग-अलग लेकिन समान मांगें सामने आईं. छठी अनुसूची या वैकल्पिक संवैधानिक सुरक्षा, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार सुरक्षा, भूमि और पर्यावरण संरक्षण कानून जैसे मसले पर मांग तेज हुई. इसी दौरान लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) दो प्रमुख राजनीतिक-सामाजिक मंच के रूप में उभर कर सामने आई.

जनवरी 2023: हाई-पावर्ड कमेटी (HPC) का गठन
लगातार आंदोलन और राजनीतिक दबाव के बाद केंद्र सरकार ने गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय की अध्यक्षता में हाई-पावर्ड कमेटी (HPC) का गठन किया. HPC का मुख एजेंडा लद्दाख की संवैधानिक, प्रशासनिक और रोजगार संबंधी मांगों पर संवाद, MHA और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच संस्थागत बातचीत आगे बढ़ाना रहा. सबसे बड़ी बात रही है कि LAB और KDA को आधिकारिक वार्ताकार के रूप में शामिल किया गया.

2023–2024 मे कई दौर की बैठकें हुयी लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला
HPC की दिल्ली और लेह में कई बैठकें हुईं.
प्रमुख मुद्दे:

* छठी अनुसूची की मांग
* विधानसभा या वैकल्पिक लोकतांत्रिक ढांचा
* भूमि, पर्यावरण और जनसांख्यिकीय सुरक्षा
* सरकारी नौकरियों में स्थानीय आरक्षण

हर दौर के बाद यह धारणा मजबूत हुई कि संवाद चल रहा है. 2024 में LAB और KDA ने MHA को एक संयुक्त मसौदा प्रस्ताव सौंपा और यहीं से बौद्ध समुदाय के एक वर्ग में असंतोष खुलकर सामने आया. आरोप लगे कि HPC में संतुलित प्रतिनिधित्व नहीं, मसौदे में बौद्ध समुदाय के दीर्घकालिक हितों की स्पष्ट गारंटी नहीं है.

2025: ‘वॉयस ऑफ बुद्धिस्ट लद्दाख’ का उदय

HPC और LAB–KDA ढांचे से असंतुष्ट बौद्ध नेतृत्व ने ‘वॉयस ऑफ बुद्धिस्ट लद्दाख (VBL)’ का गठन किया।गठन के तुरंत बाद VBL का एक प्रतिनिधिमण्डल ने उपराज्यपाल से मुलाकात की. संकेत साफ है कि अब ये संगठन MHA तक अपनी मांगें सीधे रखने जा रही है. इससे स्पष्ट हो गया कि अब MHA के साथ बातचीत केवल दो मंचों तक सीमित नहीं रही.

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