Monday Motivation: चीजें जमा करने में नहीं, खुद को समझने में है असली खुशी, इस मंडे अपनाएं एरिक फ्रॉम की 3 सीख

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 चीजें जमा करने में नहीं, खुद को समझने में है असली खुशी, इस मंडे अपनाएं एरिक फ्रॉम की 3 सीख

By: Vishal Yadav | Updated Date: Sun, 11 Oct 2026 19:36:11 (IST)

क्या पैसा, सक्सेस और अचीवमेंट्स ही खुशी का पैमाना हैं? साइकोलॉजिस्ट एरिक फ्रॉम की किताब To Have or to Be? बताती है कि असली खुशी बाहरी चीजों को जमा करने में नहीं, बल्कि खुद को समझने, रिश्तों को संवारने और हर दिन कुछ नया सीखने में है। जानिए इस मंडे मोटिवेशन में जिंदगी को बेहतर बनाने के 3 आसान तरीके।

हम अक्सर अपनी पहचान उन चीजों से बनाने लगते हैं जो हमारे पास हैं। अच्छी नौकरी, बैंक बैलेंस, रिश्ते, अचीवमेंट्स और सोशल मीडिया पर मिलने वाली तारीफ। हमें लगता है कि जितना ज्यादा हासिल करेंगे उतने ही खुश और सक्सेजफुल होंगे। लेकिन अगर एक दिन ये सारी चीजें आपसे दूर हो जाएं तो क्या आप खुद को उतना ही वैल्यूएबल महसूस करेंगे। साइकोलॉजिस्ट और थिंकर एरिक फ्रॉम की किताब 'To Have or to Be?' इसी सवाल से रूबरू कराती है। फ्रॉम बताते हैं कि जिंदगी को जीने के दो तरीके हैं चीजों को जमा करने की सोच और खुद को समझते हुए जिंदगी जीने का तरीका। इस मंडे जानिए कैसे उनकी यह सोच आपको पूरे हफ्ते मोटिवेटेड रहने में मदद कर सकती है।

'हैविंग' और 'बीइंग' के बीच का फर्क

एरिक फ्रॉम की किताब टू हैव ऑर टू बी साल 1976 में पब्लिश हुई थी। इसमें उन्होंने बताया कि हमारी जिंदगी दो अलग-अलग तरीकों से चल सकती है। पहला है 'हैविंग' यानी मेरे पास क्या है? कितने पैसे हैं, कौन-सी नौकरी है, कितने अचवीमेंट्स हैं और कितने लोग मुझे जानते हैं। दूसरा है 'बीइंग' यानी मैं कौन हूं और जिंदगी को किस तरह जी रहा हूं? हैविंग की सोच में हम अपनी वैल्यू बाहरी चीजों से तय करने लगते हैं। नौकरी चली जाए तो लगता है कि हमारी पहचान खत्म हो गई। रिश्ता टूट जाए तो लगता है कि जिंदगी में कुछ बचा ही नहीं। इसके उलट बीइंग हमें अपने अनुभवों, सीखने की इच्छा, रिश्तों और भावनाओं को समझने पर ध्यान देना सिखाता है। इसका मतलब यह नहीं कि पैसा या सफलता जरूरी नहीं हैं। असली बात यह है कि इन्हें अपनी पूरी पहचान न बनने दें।

'मेरे पास क्या है?' से 'मैं क्या सीख रहा हूं?' तक

कई बार हम किसी काम को सिर्फ उसके रिजल्ट के लिए करते हैं। ऑफिस में काम किया तो प्रमोशन चाहिए, पढ़ाई की तो अच्छे नंबर चाहिए और सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट किया तो लाइक्स की उम्मीद रहती है। जब नतीजा मन मुताबिक नहीं मिलता तो मोटिवेशन कम होने लगता है। फ्रॉम की सोच हमें काम करने के एक्सपीरिएंस पर भी ध्यान देना सिखाती है। इस हफ्ते खुद से पूछें कि आप अपने काम से क्या सीख रहे हैं। कोई नया स्किल सीखना, अपनी गलती सुधारना या किसी मुश्किल काम को पूरा करने की कोशिश करना भी प्रोग्रेस है।

इस मंडे से अपनाएं ये 3 आसान तरीके

छोटे गोल बनाएं: पूरे हफ्ते के लिए ऐसे टारगेट तय करें जिन्हें पूरा करना आपके लिए पॉसिबल हो। रोज 20 मिनट पढ़ना, कोई पेंडिंग काम खत्म करना या एक नया स्किल सीखना अच्छी शुरुआत हो सकती है। बड़े रिजल्ट का इंतजार करने के बजाय हर दिन की छोटी जीत को पहचानें। कंपेरिजन कम, अपनी प्रोग्रेस पर फोकस ज्यादा: सोशल मीडिया पर दूसरों की सक्सेज देखकर अपनी जिंदगी को कम न आंकें। आपको उनकी अचीवमेंट्स दिखती हैं लेकिन उनके स्ट्रगल्स नहीं। इस हफ्ते खुद से तुलना करें। सोचें कि पिछले हफ्ते के मुकाबले आपने क्या सीखा और किस मामले में बेहतर हुए। खुद के लिए समय निकालें: दिनभर की भागदौड़ में रोज 10 मिनट बिना फोन के बैठें। सोचें कि आज आपने क्या अच्छा किया, किस बात से परेशानी हुई और कल क्या बेहतर कर सकते हैं। अपनी भावनाओं को समझना और गलतियों से सीखना आपको आगे बढ़ने में मदद कर सकता है।

रिश्तों में भी 'बीइंग' को दें जगह

हम कई बार रिश्तों को भी इस नजर से देखने लगते हैं कि उनसे हमें क्या मिल रहा है। फ्रॉम की सोच इसके बजाय प्रेम, समझ और एक-दूसरे से जुड़ाव को इंपॉर्टेंस देती है। इस हफ्ते किसी अपने की बात ध्यान से सुनें बिना किसी काम के उसका हालचाल पूछें या जरूरत पड़ने पर मदद करें। हर रिश्ते से फायदा मिलना जरूरी नहीं है। कुछ रिश्तों की अहमियत उनके साथ और अपनापन देने में होती है।

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