Gandhi Jayanti Special : 18 KM पैदल चलने से लेकर जीरो वेस्ट तक बापू की ये आदतें थीं 100 साल आगे

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 18 KM पैदल चलने से लेकर जीरो वेस्ट तक बापू की ये आदतें थीं 100 साल आगे

By: Aditi Shukla | Updated Date: Fri, 02 Oct 2026 16:19:00 (IST)

इंस्टाग्राम स्क्रॉल करते हुए 'सस्टेनेबल फैशन', 'जीरो वेस्ट' या 'मिनिमलिज्म' जैसे शब्द सुनकर हमें लगता है कि ये जेन-जी के बनाए मॉडर्न इको-फ्रेंडली ट्रेंड्स हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया जिसे आज अपना रही है महात्मा गांधी 100 साल पहले ही उसे जी चुके थे।

इंस्टाग्राम स्क्रॉल करते हुए 'सस्टेनेबल फैशन', 'जीरो वेस्ट' या 'मिनिमलिज्म' जैसे शब्द सुनकर हमें लगता है कि ये जेन-जी के बनाए मॉडर्न इको-फ्रेंडली ट्रेंड्स हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया जिसे आज अपना रही है महात्मा गांधी 100 साल पहले ही उसे जी चुके थे। इस गांधी जयंती पर बापू को एक नए नजरिए से देखते हैं। वे सिर्फ एक राजनेता नहीं बल्कि दुनिया के 'द ओरिजिनल मिनिमलिस्ट' थे यानी कम से कम चीजों में बेहतर जीवन जीने की उनकी सादगी आज के हर यूथ और एनवायरनमेंट एक्टिविस्ट के लिए असली मास्टरक्लास है।


'जीरो वेस्ट' के असली पायनियर

- आज हम प्लास्टिक स्ट्रॉ और डिस्पोजेबल कप्स को लेकर बहस करते हैं लेकिन गांधीजी 'जीरो वेस्ट' के सिद्धांत को बहुत पहले ही समझ गए थे। गांधीजी के करीबी सहयोगी रहे काका कालेलकर ने अपने संस्मरणों ('Stray Glimpses of Bapu') में एक किस्सा लिखा है। एक बार बापू का एक बहुत छोटा सा पेंसिल का टुकड़ा खो गया और वे उसे घंटों तक खोजते रहे। जब उन्हें नई पेंसिल देनी चाही गई तो उन्होंने साफ मना कर दिया और कहा कि मद्रास में एक छोटे बच्चे ने मुझे वह पेंसिल बड़े प्यार से दी थी उसे यूं ही खो जाने देना बर्बादी है।

- इसके अलावा 'कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी' के आर्काइव्स से पता चलता है कि वे कभी कागज का एक भी टुकड़ा बर्बाद नहीं करते थे। उन्हें जो भी चिट्ठियां या लिफाफे आते थे वे उन्हें सावधानी से खोलते थे और उनके पीछे के खाली हिस्से पर अपने नोट्स या ड्राफ्ट लिखते थे। यहां तक कि भारत के आखिरी वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन को भी गांधीजी ने कई बार इस्तेमाल किए हुए पुराने लिफाफों पर ही खत लिखे थे। आज की 'पेपर रीसाइक्लिंग' के दौर में बापू का यह तरीका एक मिसाल है।


पृथ्वी के दो चक्कर लगाने वाला रिकॉर्ड

अगर 'लो कार्बन फुटप्रिंट' की बात करें तो बापू का पैदल चलने का रिकॉर्ड आपको हैरान कर देगा। इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च (IJMR) में छपे एक हेल्थ डेटा के विश्लेषण के मुताबिक साल 1913 से 1948 (उनकी डेथ) यानी उनके अभियान-काल के बीच गांधीजी रोज औसतन 18 किलोमीटर चलते थे। अगर उनके इस सफर को जोड़ा जाए तो उन्होंने अपनी जिंदगी में लगभग 79,000 किलोमीटर की दूरी पैदल तय की थी। आपको जानकर हैरानी होगी कि हमारी पृथ्वी का सर्कमफरेंस लगभग 40,000 किलोमीटर है। यानी बापू ने अपनी जिंदगी में पैदल चलकर ही पूरी दुनिया के लगभग दो चक्कर लगा लिए थे। यह आज के दौर में 'जीरो एमिशन' और 'इको-फ्रेंडली' लिविंग का सबसे बड़ा और प्रामाणिक उदाहरण है।


आप भी अपना सकते हैं 'गांधियन मिनिमलिज्म'

बापू को सम्मान देने का सबसे अच्छा तरीका है उनकी आदतों को अपनी डेली लाइफ में अपनाना -

1. नीड वर्सेस वांट का फॉर्मूला : गांधीजी का एक कोट है, 'धरती के पास हर इंसान की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त है लेकिन किसी एक के लालच को पूरा करने के लिए नहीं।' तो अगली बार ऑनलाइन शॉपिंग साइट पर 'Add to Cart' करने से पहले खुद से पूछें, 'क्या मुझे सच में इसकी जरूरत है या यह सिर्फ मेरी इच्छा है?'

2. फास्ट फैशन से ब्रेक लें: हर हफ्ते नए ट्रेंड के कपड़े खरीदने के बजाय, कुछ ऐसे क्लासिक और टिकाऊ कपड़े खरीदें जो लंबे समय तक चलें। कपड़ों को तुरंत फेंकने के बजाय उन्हें रिपेयर करना या अपसाइकल करना सीखें।

3. स्वदेशी 2.0 : अपने शहर के लोकल कारीगरों, बुनकरों और छोटे दुकानदारों से चीजें खरीदें। जब आप लोकल चीजें खरीदते हैं तो ट्रांसपोर्टेशन में खर्च होने वाला ईंधन बचता है (कार्बन एमिशन कम होता है) और आपके अपने लोगों को रोजगार मिलता है। बापू के 'स्वदेशी मूवमेंट' का यही असली मतलब था।

4. रिसोर्सेज की रिस्पेक्ट करें: चाहे वह आपकी प्लेट में रखा खाना हो, बहता हुआ पानी हो या बिजली हो किसी भी चीज को बर्बाद न करें। जितना खा सकें उतना ही प्लेट में लें। यह छोटी सी आदत पर्यावरण को बचाने में बहुत बड़ा रोल प्ले कर सकती है।

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