कोटा: राजस्थान के कोटा जिले के शिवपुरी धाम के संचालक संत सनातनपुरी का देवलोकगमन हो गया है। उन्होंने रविवार देर रात करीब 11.30 बजे अपने शिवपुरी धाम में ही अंतिम सांस ली। संत पिछले कुछ समय से बीमार चले रहे थे. उनके सहयोगी जयपुर के एक प्राइवेट अस्पताल में उनका इलाज करा रहे थे.
डॉक्टरों ने चेकअप के बाद बताया था कि उन्हें सीरियस निमोनिया की शिकायत है. हालत गंभीर होने के चलते डॉक्टर उन्हें कई दिनों से वेंटिलेटर पर रखे हुए थे. रविवार को डॉक्टरों ने कहा कि अब सनातनपुरी के स्वास्थ्य में सुधार की गुंजाइश नहीं है.
इसके बाद रविवार देर शाम उनके सहयोगी उन्हें लेकर कोटा अपने आश्रम में लेकर आ गए. शिवपुरी धाम पहुंचने के बाद उन्होंने रात को करीब साढ़े ग्यारह बजे अंतिम सांस ली. आश्रम के लोगों ने बताया कि सोमवार को दिन में संत की समाधि प्रोसेस संपन्न कराया जाएगा.
ख्याति प्राप्त संत कैसे बने संत सनातनपुरी
संत सनातनपुरी महाराज नागा साधु संत राणारामपुरी महाराज के शिष्य रहे. उन्हें गुरु से आदेश मिला था कि वह देश दुनिया में भगवान भोलेनाथ की ख्याति का विस्तार करें. इसके लिए उन्होंने शिवलिंग स्थापना का कार्य शुरू किया. गुरु के आदेश का पालन करने के लिए संत सनातनपुरी ने शिवपुरी धाम में संकल्प मानकर 525 शिवलिंगों की स्थापना की. उनकी यह उपलब्धि देश दुनिया में जानी जाती है.
एक निजी चैनल को दिए इंटरव्यू में संत सनातनपुरी ने कहा था उनका जन्म स्थान पंजाब था. वह 1982 से संत की शरण में आए. वह कहा करते थे, भगवान कण-कण में हैं. यहां तक कि शरीर के किसी भी हिस्से में सूई चुभाने पर भगवान की अनुभूति हो सकती है. उनका मानना था कि संन्यासी का मतलब होता है जिसने सारी इच्छाओं का मार दिया हो. वह काम, मोह, लाभ, क्रोध से ऊपर उठ चुका हो. संतो के बीच में कहा जाता है पापी का मन पाप में जोगी का मन राग में होता है.
33 साल तक फलाहार पर रहे बाबा सनातनपुरी
वह खुद को हठयोगी बताते थे. उन्होंने बताया था कि उनके गुरु 1985 में नेपाल गए थे. महाशिवरात्रि के दिन काठमांडू गए थे. वह सुबह-सुबह स्नान ध्यान करके तमाम फल-फूल और हलवाई से पकवान बनवाकर, इत्र आदि लेकर मंदिर में पहुंचे थे. वहां भक्तों की बहुत ज्यादा भीड़ होने के चलते सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें ठीक से भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन नहीं करने दिए. इसके बाद उन्होंने वहां ही संकल्प लिया कि वह कोटा में 525 शिवलिंग स्थापित करेंगे. जहां आकर भक्त आसानी से अपने भगवान के साथ ज्योत से ज्योत जला पाएंगे. गुरुजी ने अपने जीवनकाल में 12 शिवलिंग स्थापित करने के बाद 1987 में देवलोक चले गए. दुनिया से जाते हुए उन्होंने अपना अधूरा काम उन्हें सौंपा था, जिसे उन्होंने पूरा किया है. गुरु के आदेश को मानते हुए संत सनातनपुरी ने संकल्प लिया कि जब तक वह इस धाम में 525 शिवलिंग स्थापित नहीं कर देते तब तक अन्न नहीं खाएंगे.
गुरु के आदेश पर कोटा में स्थापित कराया 525 शिवलिंग
साल 2007 में महायज्ञ कराया गया, जिसमें 21 कुंड, 525 यजमान थे. इस तरह सभी संतो और भक्तों ने मिलकर 525 शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा संपन्न कराया. उस दिन घास की चार पत्तियां खाकर प्रण को तोड़ा. फिर उसी दिन एक और संकल्प लिया कि जब तक वह भगवान भोले को सर्दी, गर्मी से बचाने के लिए मंदिर की स्थापना नहीं कर लेते तब तक अन्न नहीं खाएंगे. 33 साल तक संकल्प को पूरा करता रहा और बिना अन्न खाए मंदिर स्थापना कराया. इस दौरान दोनों समय स्नान करता, एक ही वस्त्र में तमाम मौसम का सामना करता. मौसम की मार झेलने के लिए पूरे शरीर में स्नान के बाद भभूत लगा लेता. सारे संकल्प पूरे करते हुए उम्र हो गई, शरीर ने साथ देना कम कर दिया.
बाबा सनातपुरी को ऐसा टूटा हठयोग
सेहत खराब होने पर डॉक्टरों ने भभूत की जगह शरीर में नारियल का तेल लगा दिया, और भोजन में दाल का पानी पीला दिया. तब वहां जाकर हठयोग टूटा. भगवान हठयोग के बाद मानते ही नहीं हैं. इस दौरान सुख और दुख दोनों आते हैं. आज शिक्षा नगरी कोटा में पढ़ने के लिए आने वाले बच्चों के मां-पिता आकर पूजा पाठ करते हैं. उन्होंने यह शिवपुरी धाम बिना किसी सरकारी मदद से पूरी हुई है.
संत सनातपुरी ने बताया कि उनके गुरु राणारामपुरी महाराज ने बताया था- ‘हरेक जीवित चीज है श्वास, नाक से जीवन शरीर के अंदर जाती है, ऑक्सीजन को जब हम रोकते हैं तो वह कार्बनडाइऑक्साइड बाहर निकलता है. इसलिए कहते हैं कि सांस आना बंद होने पर हम कहते हैं कि इंसान मर गया. संत इसी के जरिए सूक्ष्म दसवां द्वार खोलते हैं और परमात्मा को प्राप्त करते हैं.’ वह कहते हैं कि दुनिया में दो ही शक्ति है, एक नाद और दूसरा बिंद. बिंद से सबकी उत्पत्ति हुई है और नाद मोक्ष है. आज नाद की तरफ कोई नहीं जाना चाहता है. उसका हठयोग एक साधन है.

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