'न्यायपालिका लहूलुहान...', CJI सूर्यकांत के आगे NCERT ने जोड़े हाथ, SC से तुषार मेहता बोले- हमें माफ करें हुजूर

2 hours ago

एनसीईआरटी की 8वीं क्लास वाली किताब पर विवाद बरकरार है. एनसीईआरटी की माफी के बाद भी आज यानी गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. सुप्रीम कोर्ट में नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) की आठवीं की किताब में जोड़े गए चैप्टर में न्यायपालिका को भ्रष्टाचार बताए जाने से सीजेआई सूर्यकांत काफी गुस्से में हैं. आज भी सुप्रीम कोर्ट में उनका गुस्सा दिखा. एनसीईआरटी किताब विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई यानी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और विपुल एम पंचोली की बेंच के सामने एनसीईआरटी ने कहा कि हम बिना शर्त माफी मांगते हैं. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का गुस्सा शांत नहीं हुआ.

दरअसल, एनसीईआरटी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एसजी तुषार मेहता पेश हुए थे. उन्होंने सुनवाई शुरू होते ही सीजेआई सूर्यकांत की बेंच के सामने कहा कि वह इस मामले में बिना शर्त माफी मांगते हैं. इसके बाद सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि हमने इस पर मीडिया में खबरें देखी हैं. सुप्रीम कोर्ट के सेकेट्री जनरल इस पर जांच करेंगे कि ये कैसे छपी? यह एक साज़िश भी हो सकती है. इतना ही नहीं, सीजेआई ने यहां तक कह दिया कि इस घटना से न्यायपालिका लहूलुहान है.

सीजेआई की टिप्पणी के बाद एसजी तुषार मेहता ने फिर कहा कि पुस्तक बाजार में छपकर गई थी, वो वापस ले ली गई है. इस पर सीजेआई ने कहा कि ये बड़ा कैलकुलेटेड मूव है जिसमें भारतीय न्यायपालिका को भ्रष्ट बताया गया. पूरा शिक्षक समाज इसे ट्रोल कर रहा है. वहीं, जस्टिस बागची ने कहा कि डिजिटल युग में एक किताब की हज़ारों प्रतियां बन गई होंगी. यह कैसे किया गया, यह जानना जरूरी है.

सीजेआई ने एनसीईआरटी को फटकार लगाते हुए कहा कि यह बहुत मामूली परिणाम है. उन्होंने गोली चलाई है, आज न्यायपालिका लहूलुहान है.’ इसके बाद एनसीईआरटी की कक्षा 8 की पुस्तक के विवादित अध्याय पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल (SG) ने कहा कि जिन व्यक्तियों की जिम्मेदारी बनती है, उन्हें आगे इस तरह के काम से नहीं जोड़ा जाएगा.

वहीं, सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने कहा कि उन्होंने कल एक पॉडकास्ट देखा, जिसमें एक पूर्व निदेशक इस अध्याय का बचाव कर रहे थे. इस पर CJI ने कहा, ‘यह बाजार में उपलब्ध है, मुझे भी स्रोतों से इसकी कॉपी मिली है.’

SG ने कोर्ट को बताया कि 32 किताबें बाजार में जा चुकी हैं और उन्हें वापस लिया जा रहा है. पूरे अध्याय की एक टीम द्वारा दोबारा समीक्षा की जाएगी.

उन्होंने यह भी कहा कि लंबित मामलों (pendency) पर एक हिस्सा है, जिसका शीर्षक ‘Justice delayed is justice denied’ है हम यह नहीं पढ़ा सकते कि न्याय से इनकार हो रहा है. इस पर सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि पूरे तंत्र की व्यापक समस्या का कोई जिक्र नहीं है, केवल एक व्यक्ति को चुन लिया गया है.

सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया कि इसमें राजनेताओं, नौकरशाही और मंत्रियों का क्या जिक्र है? उन्होंने कहा कि यह सामग्री पीडीएफ रूप में व्यापक रूप से प्रसारित हो चुकी है. इस पर जस्टिस जे. बागची ने कहा कि ये लेख और अंश सार्वजनिक डोमेन में हैं और सरकार को टेकडाउन आदेश जारी करने चाहिए. उन्होंने टिप्पणी की कि न्यायपालिका संविधान की संरक्षक है, लेकिन इस पहलू को कहीं रेखांकित नहीं किया गया.

इस पर SG तुषार मेहता ने कहा, ‘इसे हटाया जाना चाहिए, मैं नतमस्तक हूं.’ इसके बाद सीजेआई ने कहा कि हम यह कार्यवाही नहीं बंद कर रहे हैं. इसकी गहन जांच की ज़रूरत है, जो करायी जाएगी. वहीं, एसजी ने कहा कि बिल्कुल सही है जो किया गया है उसकी भरपाई आपके मुताबिक ही होनी चाहिए.

सीजेआई ने NCERT के डायरेक्टर को जवाब तलब किया कि ये कैलकुलेटेड मूव है या नहीं न्यायपालिका को बदनाम करने को लेकर.

सीजेआई ने कहा—

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक उप-विषय स्पष्ट रूप से शामिल है।

एक मूलभूत अभियान में इस विषय को शामिल करने से न्यायपालिका की संस्थागत स्थिति की गहन समीक्षा की आवश्यकता है।

अध्याय की सामग्री को पुनः प्रस्तुत करने में अनिच्छा है।

इसमें न्यायपालिका के खिलाफ प्राप्त सैकड़ों शिकायतों का उल्लेख है, जो स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि कोई कार्रवाई नहीं की गई, एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश के बयान से कुछ शब्दों का चयन करके यह सुझाव दिया गया है कि न्यायपालिका ने स्वयं संस्थागत भ्रष्टाचार को स्वीकार किया है।

SC आदेश से सम्बंधित प्रमुख प्वाइंट:

संविधान निर्माताओं ने तीनों स्तंभों की स्वायत्तता सुनिश्चित करने में बरती थी विशेष सावधानी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि— संविधान निर्माताओं ने गहरी सजगता और पर्याप्त सावधानी बरतते हुए यह सुनिश्चित किया था कि संवैधानिक प्रावधान इस तरह दर्ज हों कि शासन के तीनों स्तंभ लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर अपनी-अपनी स्वायत्तता के साथ काम कर सकें।

कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक रूप से निर्धारित सीमाओं को स्वीकार करते हुए भी वह उस समय हैरान रह गया, जब एक प्रमुख अखबार में एनसीईआरटी द्वारा प्रकाशित कक्षा 8 (भाग-2) की सामाजिक विज्ञान की किताब “Exploring Society: India and Beyond (First Edition)” के जारी होने संबंधी खबर प्रकाशित हुई।

अदालत ने नोट किया कि— उक्त प्रकाशन के अध्याय 4 का शीर्षक “The Role of Judiciary in Our Society” है, जिसने अदालत का ध्यान अपनी ओर खींचा।

CJI: it seems to us that there is a calculated move to undermine the institutional authority and demean the dignity of the judiciary. this, if allowed to go unchecked will erode the sanctity of judicial office in estimation of public at large and within impressionable minds of youth

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