LIVE: उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुना रहा फैसला

1 day ago

2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े कथित बड़ी साजिश के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सात आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर फैसला सुनाना शुरू कर दिया है. इन आरोपियों में उमर खालिद और शरजील इमाम भी शामिल हैं.

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच शरजील इमाम और उमर खालिद के अलावा गुलफिशा फ़ातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद की जमानत याचिकाओं पर भी फैसला सुनाना शुरू किया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता लंबे समय से हिरासत में हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 10 दिसंबर को दिल्ली पुलिस की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू, वहीं आरोपियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, अभिषेक सिंघवी, सिद्धार्थ दवे, सलमान खुर्शीद और सिद्धार्थ लूथरा की दलीलें सुनने के बाद आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.

उमर खालिद और शरजील इमाम पर क्या आरोप?

उमर, शरजील और अन्य पर फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों का ‘मुख्य साजिशकर्ता’ होने का आरोप है. उनके खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और भारतीय न्याय संहिता (IPC) के विभिन्न प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था.

ज़मानत की मांग करते हुए आरोपियों की ओर से पेश वकीलों ने मुख्य रूप से ट्रायल में हो रही देरी और इसके जल्द शुरू होने की संभावना न होने का मुद्दा उठाया. अदालत को बताया गया कि आरोपी पिछले पांच वर्षों से अधिक समय से जेल में बंद हैं, जबकि अब तक ट्रायल शुरू नहीं हो पाया है. बचाव पक्ष का यह भी कहना था कि पांच साल बीत जाने के बावजूद ऐसा कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपियों ने हिंसा भड़काई या दंगों को अंजाम देने में प्रत्यक्ष भूमिका निभाई.

जमानत के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने क्या दी दलील?

वहीं, दिल्ली पुलिस ने जमानत याचिकाओं का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि यह मामला राज्य को अस्थिर करने की एक सोची-समझी साज़िश से जुड़ा है. पुलिस का कहना था कि ये विरोध प्रदर्शन अचानक नहीं हुए थे, बल्कि यह एक सुनियोजित और संगठित ‘पैन इंडिया’ साज़िश थी, जिसका उद्देश्य ‘सरकार बदलना’ और ‘आर्थिक रूप से देश को कमजोर करना’ था.

दिल्ली पुलिस ने यह भी दलील दी कि कथित साज़िश को उस समय अंजाम दिया गया, जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति भारत दौरे पर थे, ताकि अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान आकर्षित किया जा सके और नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के मुद्दे को वैश्विक स्तर पर उठाया जा सके. पुलिस के अनुसार, सीएए को जानबूझकर एक ‘कट्टरपंथी उत्प्रेरक’ के रूप में चुना गया और इसे ‘शांतिपूर्ण विरोध’ के आवरण में पेश किया गया.

दिल्ली पुलिस ने यह भी कहा कि ट्रायल में हो रही देरी के लिए खुद आरोपी जिम्मेदार हैं और यदि वे सहयोग करें, तो मुकदमे को दो वर्षों के भीतर पूरा किया जा सकता है.

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़क उठी थी. इन दंगों में 53 लोग मारे गए थे और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे.

दिल्ली हाईकोर्ट ने शरजील इमाम, उमर ख़ालिद और अन्य सात आरोपियों मोहम्मद सलीम खान, शिफा-उर-रहमान, अथर खान, मीरान हैदर, शादाब अहमद, अब्दुल ख़ालिद सैफ़ी और गुलफिशा फ़ातिमा की ज़मानत याचिकाएं 2 सितंबर को खारिज कर दी थीं. इसी दिन एक अन्य आरोपी तसलीम अहमद की ज़मानत याचिका भी हाईकोर्ट की एक अलग पीठ ने खारिज की थी.

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि पहली शरजील इमाम और उमर ख़ालिद की भूमिका गंभीर प्रतीत होती है और उन पर सांप्रदायिक आधार पर भड़काऊ भाषण देकर मुस्लिम समुदाय के लोगों को बड़े पैमाने पर मोबिलाइज़ करने का आरोप है. इसके बाद आरोपियों ने उस फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया था.

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