DNA Analysis: आज आपको समझना चाहिए कि तीसरे विश्वयुद्ध के 2 गुट कौन-कौन से होंगे और इनमें किसका पलड़ा भारी होगा. ट्रंप ने कहा था कि वेनेजुएला के बाद खलीफा यानी ईरान का नंबर है. इसी ईरान को लेकर दुनिया के एक हिस्से में किस तरह लामबंदी की जा रही है. सबसे पहले आपको ये गौर से समझना चाहिए. अब से ठीक 3 दिन बाद यानी 9 जनवरी से दक्षिण अफ्रीका में अमेरिका विरोधी खेमा एक बड़ा नौसैनिक युद्धाभ्यास शुरु करने जा रहा है. इस नौसैनिक युद्धाभ्यास में ईरान समेत चीन, रूस, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया और इथोपिया हिस्सा ले रहे हैं. यानी इस वॉर एक्सरसाइज में शामिल सभी देश ब्रिक्स गठबंधन का हिस्सा हैं. 9 से 16 जनवरी तक चलने वाली इस मिलिट्री एक्सरसाइज में सभी देशों ने अपने जहाज भेजे हैं लेकिन ईरान ने अपनी नेवी के दो बेड़े भेजे हैं. ईरान ने दो लंबे चौड़े बेड़े भेजकर ये साफ कर दिया है कि वो ट्रंप की चेतावनी को गंभीरता से ले रहा है और इस चेतावनी से निपटने के लिए फौजी तैयारी भी कर रहा है.
लेकिन इस मिलिट्री एक्सरसाइज के आकार से ज्यादा ध्यान खींच रहा है युद्धाभ्यास का MOTTO यानी ध्येय वाक्य. दक्षिण अफ्रीका में हो रहे इस सैन्य अभ्यास का MOTTO है . INJURY TO ONE IS INJURY TO ALL इस वाक्य का मतलब है किसी भी एक सहयोगी देश को दिया गया जख्म पूरे गुट का जख्म माना जाएगा. यानी बहुत हद तक ट्रंप को ये संदेश दिया जा रहा है कि जिस तरह अमेरिका और यूरोपीय देशों ने नाटो का सामरिक गठबंधन बनाया है. ठीक उसी तर्ज पर पश्चिम विरोधी देश भी अपना सैन्य गठबंधन खड़ा कर सकते हैं. अफ्रीका, एशिया और मध्य एशिया के इस प्रस्तावित नाटो की शक्ल और दायरा कैसा हो सकता है. इस मुद्दे से जुड़ी जानकारी भी हम आपको देंगे. उससे पहले आपको दक्षिण अफ्रीका में होने वाले युद्धाभ्यास के ध्येय वाक्य यानी MOTTO का इतिहास देखना चाहिए ताकि आपको पता चल सके आखिर क्यों युद्धाभ्यास के लिए इसी वाक्य को चुना गया है.
मजदूरों की लड़ाई का प्रतीक
19वीं सदी की शुरुआत में मजदूर यूनियन और मजदूर अधिकारों की बात करने वाले गुटों ने इस नारे को अपनाया था. ये नारा शोषण करने वाले मालिकों के खिलाफ मजदूरों की लड़ाई का प्रतीक बन गया था. आज भी जब जब मजदूर अधिकारों की बात होती है तो प्रदर्शनों में ये नारा सुनाई देता है. इस ध्येय वाक्य को अपनाकर अमेरिका और पश्चिम विरोधी खेमे ने ये संदेश दिया है कि ताकत के बलबूते छोटे देशों को डराना धमकाना ठीक उसी तरह का शोषण है जो किसी समय में मालिक या उद्योगपति मजदूरों का करते थे. यानी एक तरह से इस गठबंधन ने खुद को न्याय का समर्थक और इंसाफ के लिए लड़ाई लड़ने वाले की तरह पेश किया है.
ब्रिक्स सदस्य मिलिट्री ड्रिल
अब लौटते हैं उस मुद्दे पर जो तीसरे विश्वयुद्ध की आशंका को हवा दे रहा है. यानी अमेरिका के विरोध में ब्रिक्स सदस्यों का सामरिक गठबंधन. हालांकि ब्रिक्स हमेशा से खुद को एक राजनीतिक और आर्थिक गुट कहता रहा है लेकिन पिछली कुछ बैठकों में ब्रिक्स सदस्यों के बीच सामरिक सहयोग पर लगातार जोर दिया गया है. अब हम आपको ब्रिक्स सदस्यों के इसी सामरिक सहयोग की जानकारी देने जा रहे हैं. ब्रिक्स सदस्यों ने साझा युद्धाभ्यासों की तादाद बढ़ाई है. दक्षिण अफ्रीका में होने वाला युद्धाभ्यास भी इसी सहमति का एक हिस्सा है. इसके साथ ही साथ रूस में ब्रिक्स सदस्य एक बहु सदस्यीय मिलिट्री ड्रिल करते हैं जिसे ZAPAD कहा जाता है.भारत और रूस जैसे सदस्य कुछ BILATERAL यानी द्विपक्षीय सैन्य ड्रिल भी करते हैं. ब्रिक्स सदस्यों के सामरिक बर्ताव में इसी बदलाव की वजह से माना जा रहा है कि दुनिया में बढ़ती अमेरिकी दादागीरी के खिलाफ ब्रिक्स भी नाटो जैसा सैन्य गठबंधन बना सकता है. अगर ये गठबंधन बना तो इसकी ताकत कितनी होगी. अब हम आपको इसके बारे में बताने जा रहे हैं. चूंकि भारत हमेशा गुट-निरपेक्ष रहा है तो हमने इस आकलन में भारत की सैन्य शक्ति को शामिल नहीं किया है.
ब्रिक्स सुपर पावर
ब्रिक्स के सिर्फ तीन सदस्य यानी रूस, चीन और ईरान मिलकर दुनिया की 50 प्रतिशत मिसाइल पावर पर अधिकार रखते हैं. अकेले रूस और चीन के पास 6 हजार परमाणु हथियार हैं जबकि नाटो गठबंधन के पास तकरीबन 4300 परमाणु हथियार हैं. अगर सैनिकों की तादाद की बात की जाए तो भारत के बिना भी ब्रिक्स सदस्यों के पास दुनिया के 26 प्रतिशत सैनिक हैं. अगर नाटो को इसी कसौटी पर कसा जाए तो ये आंकड़ा होता है तकरीबन 13 प्रतिशत. यानी ब्रिक्स सदस्यों के मुकाबले आधा. वायुसेना की बात की जाए तो ब्रिक्स गठबंधन के पास दुनिया के 26 प्रतिशत फाइटर जेट हैं. जबकि नाटो के पास तकरीबन 30 प्रतिशत फाइटर जेट हैं. हमने बहुत आसान भाषा में इस आकलन को तैयार किया है ताकि आप ताकत के इस तराजू पर ब्रिक्स और नाटो को आसानी से तौल पाएं. ये आंकड़े बताते हैं अगर ब्रिक्स ने अपना सामरिक गठबंधन बनाया तो आधी दुनिया से नाटो का प्रभाव शून्य हो जाएगा और ब्रिक्स के गठबंधन के आगे नाटो कमजोर ही साबित होगा.
ट्रंप के लिए अंतरराष्ट्रीय नियम-कायदे
ब्रिक्स की किसी भी मीटिंग में या किसी भी एजेंडा में कभी भी कोई नया सैन्य गुट खड़ा करने की बात नहीं कही गई थी लेकिन जिस तरह ट्रंप ने पारंपरिक प्रतिद्वंदी चीन के खिलाफ सख्त कदम उठाए. गुट निरपेक्ष भारत पर बेवजह सख्त टैरिफ लगाए और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति को अपमानित किया. इन सबके बाद अगर ब्रिक्स का सैन्य गठबंधन बना तो उसकी वजह खुद डॉनल्ड ट्रंप ही होंगे. ट्रंप ने वेनेजुएला के निकोलस मादुरो को जिस तरह किडनैप कराया, उसने ब्रिक्स सदस्यों को ये क्लियर कट मैसेज दे दिया कि ट्रंप के लिए अंतरराष्ट्रीय नियम-कायदे मायने नहीं रखते. वो कभी भी कुछ भी कर सकते हैं और किसी के भी खिलाफ कर सकते हैं.
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डोनाल्ड ट्रंप नोबल पीस प्राइज
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन ने एक बार कहा था, जब अत्याचार को कानून की परिभाषा दे दी जाए तो उसका विरोध करना कर्तव्य बन जाता है. ये कथन आज डॉनल्ड ट्रंप पर बिल्कुल फिट बैठता है. अपनी मनमानी को पूरा करने के लिए ट्रंप किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हैं. इसी वजह से ट्रंप के विरोध में पूरी दुनिया में आवाज उठ रही हैं. जिस वक्त ब्रिक्स देश ट्रंप की शक्ति को जवाब देने के लिए सैन्य तैयारी कर रहे हैं. उसी वक्त वेनेजुएला से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने सबको चौंका दिया है. इस खबर की बुनियाद में हैं वेनेजुएला में मादुरो की बड़ी आलोचक और नोबल पुरस्कार विजेता मारिया कोरिना. एक मीडिया इंटरव्यू के दौरान मारिया ने कहा है कि वो डॉनल्ड ट्रंप को नोबल पुरस्कार मिलते देखना चाहती हैं. मारिया ने कहा है कि ट्रंप ने जो कहा था वो करके दिखाया है. ट्रंप ने एक अत्याचारी के चंगुल से वेनेजुएला को निकाला है. इसी वजह से उन्हें नोबल पुरस्कार मिलना ही चाहिए.
अमेरिका ने वेनेजुएला पर हमला किया
हैरान करने वाली बात है ना जिन डॉनल्ड ट्रंप ने रातों रात वेनेजुएला पर बम बरसा दिए. जिन डॉनल्ड ट्रंप ने गैरकानूनी तरीके से वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अगवा कर लिया. उनके लिए वेनेजुएला की नोबल पुरस्कार विजेता नोबल पीस प्राइज मांग रही हैं. यहां आपको जानना चाहिए कि मारिया को नोबल पुरस्कार लोकतांत्रिक हितों के लिए संघर्ष के लिए मिला था. अब मारिया लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाने की कोशिश करते ट्रंप के लिए नोबल की हिमायत कर रही हैं. आपको याद होगा 3 जनवरी को यानी जिस दिन अमेरिका ने वेनेजुएला पर हमला किया था. तब हमने आपको इस हमले का एक विश्लेषण दिखाया था जिसमें हमने आपको बताया था कि ट्रंप की कार्रवाई कोई बहादुरी नहीं बल्कि वेनेजुएला की सेना और सिस्टम के साथ एक सहमति या यूं कहें कि फिक्सिंग है. लोकतंत्र की कथित वकालत करने वाली मारिया कोरिना ने आज इस फिक्सिंग से जुड़ा एक और सबूत पेश कर दिया.

1 day ago
