Piyush Goyal on India EU FTA Deal: बीस साल, जी हां, पूरे दो दशक, इतनी लंबी अवधि तक भारत-यूरोपीय संघ (EU) की फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) बातचीत फाइलों में दबी रही. सरकारें बदलीं, दौर बदले, लेकिन डील आगे नहीं बढ़ी. हर बार कहा गया टैरिफ कम नहीं कर सकते किसान नाराज होंगे, ऑटो सेक्टर को नुकसान होगा, वाइन और फलों से घरेलू बाजार भर जाएगा. लेकिन 2024 से 25 में तस्वीर बदली. मोदी सरकार ने वही किया, जिसे पहले ‘नामुमकिन’ बताया जा रहा था. EU के साथ ऐतिहासिक समझौता हुआ. सवाल उठा जो 20 साल में नहीं हो पाया, वो अब कैसे हो गया? क्या भारत ने समझौता किया या रणनीति बदली? इसी सवाल का जवाब खुद वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने दिया.
टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) को दिए गए इंटरव्यू में पीयूष गोयल ने साफ कहा कि यह डील ‘किसी जल्दबाजी या दबाव’ का नतीजा नहीं, बल्कि भारत के बदले हुए आत्मविश्वास और संतुलित सोच का परिणाम है. उन्होंने पिछली यूपीए सरकारों पर परोक्ष हमला करते हुए कहा कि गलत नीतियों और बेवजह के डर की वजह से भारत एक बड़े मौके से वंचित रहा. अब हालात अलग हैं, भारत अलग है और दुनिया भारत को अलग नजर से देख रही है.
बीस साल की हिचक को तोड़कर मोदी सरकार ने EU डील को हकीकत बनाया. (फाइल फोटो)
EU FTA 20 साल तक क्यों अटकी रही और मोदी सरकार में कैसे आगे बढ़ी?
पीयूष गोयल के मुताबिक पहले की सरकारें वैश्विक व्यापार को खतरे की नजर से देखती थीं. टैरिफ घटाने को ‘समर्पण’ माना जाता था. EU के साथ बातचीत 20 साल पहले शुरू हुई, लेकिन हर बार राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी आड़े आई. मोदी सरकार ने इसे ‘विकसित भारत’ के रोडमैप से जोड़ा. यह माना गया कि कोई भी देश अलग-थलग रहकर विकसित नहीं बन सकता. बाजार खोलने से निवेश आता है और नौकरियां बनती हैं. इसी सोच ने डील को आगे बढ़ाया.
क्या भारत ने ऑटोमोबाइल, वाइन और फलों पर समझौता किया है?
पीयूष गोयल का कहना है समझौता नहीं, संतुलन. ऑटो सेक्टर में भारत ने 25 से 30 लाख रुपए तक की गाड़ियों को सुरक्षित रखा है. आयात की अनुमति सीमित कोटा में है और वह भी 14 साल की लंबी अवधि में. सेब और नाशपाती जैसे फलों पर EU को न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) और ड्यूटी के साथ एंट्री दी गई है. इसका मतलब है कि भारतीय किसानों को तत्काल झटका नहीं लगेगा. बाजार धीरे-धीरे खुलेगा.
किसानों और घरेलू उद्योगों को कैसे सुरक्षित रखा गया?
कृषि भारत की रेड लाइन रही है. पीयूष गोयल ने साफ कहा कि अनाज, दालें, डेयरी और GM फूड जैसे संवेदनशील सेक्टर FTAs में ‘नो-गो एरिया’ रहेंगे. EU डील में भी यही रणनीति अपनाई गई. भारत ने यह सुनिश्चित किया कि सस्ते आयात से किसानों की कमर न टूटे. इसके साथ ही घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को प्रतिस्पर्धी बनने का समय दिया गया.
CBAM और पर्यावरण टैक्स से भारत को नुकसान होगा?
यूरोप का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) भारत के लिए चिंता का विषय था. लेकिन पीयूष गोयल के अनुसार भारत ने इसमें भी अपने हित सुरक्षित किए हैं. भारत को ‘मोस्ट-फेवर्ड नेशन’ जैसा दर्जा मिला है. भारतीय वेरिफायर्स को मान्यता दी जाएगी. भारत में चुकाए गए टैक्स को यूरोप स्वीकार करेगा. यानी भारतीय कंपनियों पर दोहरी मार नहीं पड़ेगी.
क्या यह डील यूरोप के सभी देशों से आसानी से पास हो जाएगी?
पीयूष गोयल का दावा है कि EU के सभी 27 सदस्य देशों ने इस समझौते का स्वागत किया है. यह डील हर राष्ट्रीय संसद में अलग-अलग रैटिफिकेशन की मोहताज नहीं है, जिससे प्रक्रिया आसान हो जाती है. यही वजह है कि सरकार इसे ‘फ्लॉलेस डील’ बता रही है.
क्या यह रणनीति बाकी FTAs में भी अपनाई जाएगी?
मंत्री ने कहा कि हर समझौता अलग होता है. जापान, कोरिया, ASEAN, US सबके साथ बातचीत अलग शर्तों पर होगी. लेकिन मूल मंत्र वही रहेगा जो भारत के हित में हो, वही होगा. न दबाव में डील, न बेवजह की जिद.
US और अन्य देशों के साथ बातचीत की रफ्तार धीमी क्यों है?
पीयूष गोयल के अनुसार हर देश अपना हित देखता है. अमेरिका के साथ बातचीत ‘दोस्ताना माहौल’ में चल रही है. कोई निराशा नहीं है. जब सही सौदा मिलेगा तभी हस्ताक्षर होंगे. जल्दबाजी भारत के हित में नहीं.
इस डील का जमीनी फायदा क्या होगा?
FTA सिर्फ टैरिफ का खेल नहीं होता. यह भरोसे का समझौता होता है. गोयल ने जर्मनी की एक कंपनी का उदाहरण दिया, जिसने भारत में $1.5 बिलियन का निवेश किया. R&D सेंटर, केमिकल जोन, नए GCC ये सब इसी भरोसे का नतीजा हैं. EU डील से भारत ग्लोबल सप्लाई चेन का बड़ा हब बन सकता है.
रिलक्टेंस से रियलिटी तक
बीस साल की हिचक को तोड़कर मोदी सरकार ने EU डील को हकीकत बनाया. यह सिर्फ एक व्यापार समझौता नहीं, बल्कि भारत की बदली सोच का संकेत है. जहां पहले डर था, अब आत्मविश्वास है. जहां पहले रुकावट थी, अब रोडमैप है. पीयूष गोयल के शब्दों में यह भारत के लिए ‘डिफाइनिंग मोमेंट’ है.

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