दाल-बाटी-चूरमा... राजस्थान का वो हिंदू समुदाय, जिसने तब नहीं छोड़ा बांग्लादेश तो अब क्यों डर रहा?

2 hours ago

वो अपने मारवाड़ी हैं ना, उनकी दुकान से... शायद आपने भी कभी शॉपिंग को लेकर ऐसा सुना हो. राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र से निकले ये लोग पूरी दुनिया में फैल गए. ये घी खूब खाते हैं, मसालों की अपनी जुगलबंदी है. दाल-बाटी-चूरमा तो वर्ल्ड फेमस है. सबसे खास बात इनकी व्यापार कुशलता है जो इन्हें अलग पहचान देती है. भारत के कई बड़े औद्योगिक घराने मारवाड़ी मूल के ही हैं. यह समुदाय बंटवारे के समय पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश बनने पर भी वहीं रहा. ये मुख्य रूप से ढाका में रहते हैं लेकिन पिछले एक साल में कट्टरपंथियों ने जिस तरह से हिंदुओं पर जुल्म किए हैं उसे देखकर अब इन्हें डर लगने लगा है. 

ये लोग बताते हैं कि राजस्थान के चुरू जिले से इनके पूर्वज ताल्लुक रखते हैं. कई पीढ़ियों पहले वे ढाका में आकर बस गए. तब यह अविभाजित बंगाल था और मारवाड़ी व्यापार करने लगे. 1947 में भारत का बंटवारा हुआ तब भी इन लोगों ने सोचा कि अपना घरबार, संपत्ति, व्यापार छोड़कर कहां जाएंगे? बांग्लादेश बना तब भी इन्होंने एक खुशहाल जीवन का सपना देखा था लेकिन अब पड़ोसी मुल्क हिंदुओं के लिए सेफ नहीं रहा. 

ना घर के ना घाट के

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आज के समय आलम यह है कि मारवाड़ी बांग्लादेश के नागरिक तो हैं लेकिन अब भी समुदाय के बहुत से लोगों को लगता है कि वे देश के मुख्य समाज में पूरी तरह से मिल नहीं पाए हैं. एक इंटरव्यू में एक मारवाड़ी अपनी स्थिति समझाने के लिए कहते हैं- ना घर के ना घाट के. 

हुंडी का काम करते थे मारवाड़ी

उस समय राजस्थान छोड़ने की मुख्य वजह कारोबार की नई संभावनाएं तलाशना था. 19वीं और 20 सदी की शुरुआत में यह समुदाय वित्त और व्यापार में तेजी से उभरा. खासकर ढाका, चटगांव, खुलना और मैमनसिंह जैसे शहरों में ये फंड हस्तांतरण (हुंडी फाइनेंस), कपड़ा, जूट और दूसरे कारोबार किया करते थे. 

बांग्लादेश के बंगाली मुस्लिम समाज में इस छोटे समुदाय का राजनीतिक प्रभाव सीमित है. बरसों से ये हैं लेकिन सामाजिक रूप से खुद को हाशिये पर महसूस करते हैं. इन्हें 'बाहरी' समझा जाता है. 1971 में बड़ी संख्या में मारवाड़ी समुदाय हिंसा से प्रभावित रहा था. अब एक बार फिर ये असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. एक अनुमान के मुताबिक बांग्लादेश में मारवाड़ी आबादी 1,000 के आसपास हो सकती है. 

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