ईरान में दो हफ्ते से इस्लामिक सरकार के खिलाफ प्रोटेस्ट हो रहे हैं. लोगों की जानें भी जा रही हैं. इस बीच, समाचार एजेंस रॉयटर्स ने खबर दी है कि अगले 24 घंटे में ईरान पर अमेरिकी स्ट्राइक हो सकती है. इस उथल-पुथल के माहौल में तेहरान से एक फोन कॉल दिल्ली आया. ईरान के विदेश मंत्री कुछ घंटे पहले अपने भारतीय समकक्ष एस. जयशंकर से मौजूदा तनावपूर्ण घटनाक्रम पर बात की है. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि ईरान में जो कुछ हो रहा है, वह भारत के लिए ठीक नहीं है. इसका फायदा चीन और पाकिस्तान को जरूर हो सकता है. कैसे?
ईरान के हालात पर भारत फिलहाल खामोश है. भारत की चिंता अंदरूनी मामला नहीं बल्कि यह है कि आगे ईरान कमजोर होता है तो भारत पर उसका क्या असर होगा? वैसे भी, ईरान के साथ भारत के संबंध कभी भी विचारधारा पर आधारित नहीं रहे. दिल्ली और तेहरान के रिश्ते तो भूगोल, आने-जाने और संतुलन से तय होते हैं. पाकिस्तान के अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने के लिए जमीनी रास्ता बंद करने के बाद, ईरान ने ही भारत को रास्ता दिया. ईरान क्षेत्र में पाकिस्तानी प्रभाव के मुकाबले संतुलन बनाने वाले और भारत की पश्चिम एशिया नीति में एक स्थिर पिलर के रूप में भी काम आया.
ईरानी सरकार के आगे कमजोर होने या गिरने से चीजें आसान नहीं होंगी. न तो आसानी से परिवर्तन ही होगा. ऐसे में अनिश्चितता पैदा होगी. भारत के लिहाज से सोचें तो इस समय वैसे भी अच्छी स्थिति नहीं है. बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या हो रही है, पाकिस्तान की बदमाशी थमी नहीं है, चीन पूरे इलाके में अपना दबदबा बढ़ा रहा है और ट्रंप दुनिया को एक के बाद एक संकट में धकेल रहे हैं.
ऐसे में ईरान में उथल-पुथल मचती है तो व्यापार रूट, राजनयिक संबंध और सुरक्षा समीकरण सब बदल जाएंगे जिसे भारत ने दशकों से मैनेज किया है. पूर्व वरिष्ठ राजनयिक निरुपमा राव का कहना है कि अगर ईरान लंबे समय तक अस्थिरता का शिकार होता है तो इसके नतीजे सीमित नहीं रहेंगे. पश्चिम एशिया में अनिश्चितता बढ़ने से एनर्जी मार्केट, शिपिंग रूट, प्रवासी लोगों पर संकट और आतंकवाद और क्रिमिनल नेटवर्क अपना दायरा बढ़ा सकता है. दक्षिण एशिया इससे अछूता नहीं रहेगा इसलिए भारत को सावधानी से आगे बढ़ना होगा और सतर्कता के साथ अपना आकलन जारी रखना होगा. तेजी से बदल रहे घटनाक्रम पर जल्दी निष्कर्ष भी निकालने से बचना होगा.
ईरान भारत के लिए इतना जरूरी क्यों?
- मध्य एशिया के लिए भारत के लिए अहम रास्ता
- ईरान दशकों से अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए भारत का सबसे भरोसेमंद जमीनी रूट देता रहा है.
- चाबहार बंदरगाह भारतीय मदद से विकसित हो रहा है. इसका मकसद है कि भारत पाकिस्तान को पूरी तरह से साइडलाइन कर सके और सड़क, रेल नेटवर्क के जरिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया से कनेक्ट हो सके.
- भारत के लिए चाबहार सिर्फ एक कमर्शियल पोर्ट नहीं है, यह एक रणनीतिक केंद्र है.
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक जेएनयू के प्रोफेसर राजन कुमार ने कहा कि अफगानिस्तान में तालिबान का राज आने के बाद भी चाबहार का महत्व खत्म नहीं हुआ है. सत्ता को लेकर उथल-पुथल मचती है तो ईरान में भारत के कई प्रोजेक्ट अटक सकते हैं. ट्रेड की बात करें तो 2025 में भारत ने 1018 मिलियन डॉलर का निर्यात किया तो 323 मिलियन डॉलर का आयात किया गया है.
मुस्लिम बहुल देश होने के बावजूद तेहरान ने कभी भी खुद को पाकिस्तान के भारत-विरोधी नजरिये से खुद को नहीं जोड़ा. ईरान ने खुलकर सुन्नी आतंकी समूहों का विरोध किया है. सुन्नी आतंकी शिया आबादी को धमकी देते रहते हैं. ये वहीं आतंकी नेटवर्क है जो भारत में हमला करता रहा है. तालिबान के पिछले शासनकाल में जब पाकिस्तान ने तालिबान का समर्थन किया तो ईरान भारत के साथ खड़ा दिखा. कुमार कहते हैं कि अगर ईरान कमजोर होता है तो पाकिस्तान को सीधा फायदा होगा. कुमार कहते हैं कि ईरान ने कश्मीर पर पाकिस्तान के एजेंडे को कभी नहीं माना.
शिया फैक्टर भी है
हां, ईरान दुनिया की सबसे बड़ी शिया बहुसंख्यक ताकत है. पश्चिम एशिया में सऊदी अरब जैसे देश सुन्नी-बहुल हैं. अगर शिया धार्मिक व्यवस्था का पतन होता है या अमेरिका से जुड़ी सपोर्टिव सरकार बनती है तो पूरे क्षेत्र में समीकरण बदलेंगे. तालिबान और आईएसआईएस शिया समुदाय और ईरानी फोर्स पर हमला करते रहे हैं. अब तक ईरान इनसे निपटता रहा है लेकिन अगर ईरानी सरकार सुन्नी समर्थक आती है तो भारत के लिए चुनौती बढ़ सकती है. नई सरकार अगर चीन के करीब जाती है तो भारत की भूमिका कमजोर हो सकती है.

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