ईरान जैसे बड़े देश में रेजिम चेंज (सरकार बदलना) एक जटिल ऑपरेशन है. मार्च 2026 में चल रहे US-Israel के हमलों में मुख्य रूप से एयर स्ट्राइक्स (हवाई हमले) हो रहे हैं. इनमें ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो चुकी है, और न्यूक्लियर साइट, मिसाइल बेस, कमांड स्ट्रक्चर्स पर हमले हो रहे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रेजिम चेंज का ऐलान किया है, लेकिन बिना ग्राउंड फोर्स (पैदल सेना) के मिलिट्री स्ट्रैटजी के हिसाब से, ये अप्रोच फेल हो सकती है क्योंकि एयर पावर से सिर्फ डैमेज होता है, लेकिन कंट्रोल और स्टेबिलिटी के लिए बूट्स ऑन द ग्राउंड (जमीन पर सैनिक) जरूरी हैं. इस लेख में हम मिलिट्री व्यू से समझेंगे कि ग्राउंड फोर्स क्यों जरूरी है, इतिहास के मिलिट्री उदाहरण क्या सिखाते हैं, और ईरान की करंट सिचुएशन में US-Israel के प्लान क्यों मुश्किल हैं.
मिलिट्री स्ट्रैटजी में ग्राउंड फोर्स का रोल: क्यों जरूरी है?
रेजिम चेंज का मतलब सिर्फ दुश्मन की क्षमता नष्ट करना नहीं, बल्कि सरकार को हटाकर नया सिस्टम स्थापित करना है. एयर स्ट्राइक्स और मिसाइल हमले टारगेट्स को नुकसान पहुँचा सकते हैं, लेकिन अकेले उनसे स्थायी नियंत्रण नहीं मिलता.
टेरिटरी कंट्रोल: एयर पावर से आप एरिया को कमजोर कर सकते हैं, लेकिन जमीन पर कब्जा करने के लिए इन्फैंट्री (पैदल सेना) चाहिए. बिना इनके, दुश्मन की फोर्सेस रीग्रुप (फिर से संगठित) हो सकती हैं. ग्राउंड फोर्सेस सिटी सेंटर्स, कमांड पोस्ट्स और सप्लाई लाइन्स पर कंट्रोल करती हैं, जो रेजिम को गिराने के लिए क्रिटिकल है.
इंसर्जेंसी और काउंटर-ऑपरेशंस: रेजिम गिरने के बाद अक्सर गुरिल्ला वॉरफेयर (छिपकर लड़ाई) शुरू होती है. पुरानी आर्मी के लॉयलिस्ट्स या मिलिशिया ग्रुप्स अटैक करते हैं. ग्राउंड ट्रूप्स इनको सर्च एंड डिस्ट्रॉय मिशन्स से दबाती हैं, लोकल इंटेलिजेंस गैदर करती हैं और पॉपुलेशन को सिक्योर करती हैं. बिना इनके, देश में अराजकता फैल जाता है.
पोस्ट-कॉन्फ्लिक्ट स्टेबिलाइजेशन: मिलिट्री व्यू से, रेजिम चेंज के बाद फेज-4 ऑपरेशंस (पीसकीपिंग और रिकंस्ट्रक्शन) आते हैं. ग्राउंड फोर्सेस नई सरकार को प्रोटेक्ट करती हैं, इलेक्शंस ऑर्गनाइज करती हैं और इंस्टीट्यूशंस को रीबिल्ड करती हैं. एयर स्ट्राइक्स से बॉम्ब डैमेज असेसमेंट (हमलों का असर चेक करना) भी मुश्किल होता है, क्योंकि ग्राउंड पर वेरिफिकेशन चाहिए. इतिहास दिखाता है कि बिना ग्राउंड फोर्स के रेजिम चेंज रेयरली सक्सेसफुल होता है. एयर सुपीरियरिटी जरूरी है, लेकिन विक्ट्री के लिए ग्राउंड कंपोनेंट अनिवार्य.
इतिहास के मिलिट्री उदाहरण: जहां ग्राउंड फोर्स के साथ रेजिम चेंज हुआ
मिलिट्री एनालिसिस से पता चलता है कि अमेरिका ने कई ऑपरेशंस में रेजिम चेंज ट्राई किया. जहां ग्राउंड इनवेजन (पैदल सेना का हमला) हुआ, वहां इनिशियल सक्सेस मिली, लेकिन जहां सिर्फ एयर कैम्पेन, वहां फेलियर, कुछ मुख्य केस:
इराक (2003): ऑपरेशन इराकी फ्रीडम में US ने सद्दाम हुसैन को टारगेट किया. लाखों ग्राउंड ट्रूप्स (जैसे 3rd इन्फैंट्री डिवीजन) ने बगदाद पर कब्जा किया. एयर स्ट्राइक्स ने सपोर्ट किया, लेकिन ग्राउंड फोर्सेस ने रेजिम को गिराया. हालांकि, पोस्ट-इनवेजन इंसर्जेंसी हुई, जिसमें ISIS जैसे ग्रुप्स उभरे. ग्राउंड फोर्सेस ने टेरिटरी कंट्रोल किया, लेकिन लॉन्ग-टर्म स्टेबिलिटी के लिए ज्यादा प्लानिंग चाहिए थी. कैजुअल्टीज हाई थे (4,400+ US सैनिक), लेकिन बिना इनके रेजिम चेंज इंपॉसिबल थी.
अफगानिस्तान (2001): ऑपरेशन एंड्यूरिंग फ्रीडम में US ने तालिबान को हटाने के लिए स्पेशल फोर्सेस और ग्राउंड ट्रूप्स डिप्लॉय किए. ऑपरेशन एनाकोंडा जैसे ग्राउंड असॉल्ट्स ने तालिबान को डिग्रेड किया. मिलिट्री व्यू: ग्राउंड प्रेजेंस ने इंसर्जेंसी को दबाया, लेकिन 20 साल बाद तालिबान रिटर्न हुआ क्योंकि US ने ट्रूप्स विड्रॉ किया. ग्राउंड फोर्सेस जरूरी हैं, लेकिन कमिटमेंट लॉन्ग-टर्म होना चाहिए.
लीबिया (2011): NATO का ऑपरेशन यूनिफाइड प्रोटेक्टर सिर्फ एयर स्ट्राइक्स पर बेस्ड था, कोई ग्राउंड ट्रूप्स नहीं. मुम्मर गद्दाफी गिर गए, लेकिन देश में सिविल वॉर छिड़ गई. बिना ग्राउंड फोर्सेस के, कोई स्टेबिलाइजेशन नहीं हुआ, जिससे अस्थिरता फैली. ये ईरान जैसे केस के लिए वार्निंग है.
पनामा (1989): ऑपरेशन जस्ट कॉज में US ने जनरल नोरिएगा को हटाने के लिए ग्राउंड इनवेजन किया. छोटा देश होने से सक्सेसफुल रहा, लेकिन बड़े देशों जैसे ईरान (93 मिलियन पॉपुलेशन) में स्केल-अप मुश्किल है. मिलिट्री थिंक टैंक्स जैसे CFR कहते हैं कि रेजिम चेंज के 80% सफल केसेस में ग्राउंड फोर्सेस इनवॉल्व थे. बिना इनके, रिस्क ऑफ फेलियर हाई है.
ईरान की करंट मिलिट्री सिचुएशन: US-Israel के प्लान और फेलियर के रिस्क्स
मार्च 2026 में कथित तौर पर US का “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” और Israel का “ऑपरेशन लायन रोअर” एयर-सेंट्रिक कैम्पेन के रूप में चल रहा है. हमलों में शीर्ष नेतृत्व, न्यूक्लियर फैसिलिटीज और मिसाइल इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान की खबरें हैं, लेकिन ग्राउंड ट्रूप्स की अनुपस्थिति इस रणनीति की सबसे बड़ी सीमा है.
एयर स्ट्राइक्स बनाम ग्राउंड कंट्रोल: Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) बड़ी, संगठित और लॉयल फोर्स मानी जाती है. एयर डिफेंस डिग्रेड हो सकता है, पर ग्राउंड होल्ड के बिना IRGC रीग्रुप कर सकता है. रेजिम-चेंज आम तौर पर तभी संभव होता है जब सुरक्षा बलों में बगावत या अंदरूनी टूट हो—जिसके संकेत फिलहाल कमजोर हैं.
काउंटर-स्ट्राइक और प्रॉक्सी रिस्क: ईरान लंबी दूरी की मिसाइलों और प्रॉक्सी नेटवर्क (जैसे Hezbollah) के जरिए जवाब दे सकता है. इससे क्षेत्रीय एस्केलेशन, शिपिंग/एनर्जी रूट्स पर खतरा और US बेस पर हमलों का जोखिम बढ़ता है. बिना ग्राउंड फोर्स के, US-Israel को लॉन्ग-रेंज ऑपरेशंस पर निर्भर रहना होगा—जो समय, लागत और कैजुअल्टी रिस्क बढ़ा सकता है.
पॉलिटिकल और ऑपरेशनल लिमिट्स: बड़े इनवेजन के लिए भारी ट्रूप लेवल (10–20 हजार+) और लंबे ऑक्यूपेशन की जरूरत पड़ सकती है—जो घरेलू समर्थन, कैजुअल्टी और पॉलिटिकल बैकलैश के कारण कठिन है. एयर कैम्पेन रेजिम को कमजोर कर सकता है, लेकिन गिराने के लिए या तो ग्राउंड ऑक्यूपेशन या व्यापक अंदरूनी विद्रोह चाहिए—जो फिलहाल स्पष्ट नहीं.
एयर-पावर से इन्फ्रास्ट्रक्चर को नुकसान संभव है, पर डिसाइसिव आउटकम के लिए ग्राउंड कंट्रोल या सिक्योरिटी फोर्सेस में दरार जरूरी होती है. इनके बिना, लंबा गतिरोध, प्रॉक्सी एस्केलेशन और सिविल-वार/अनकंट्रोल्ड ब्रेकडाउन का जोखिम बढ़ा रहता है.
ईरान में रेजिम चेंज बिना ग्राउंड फोर्स के इंपॉसिबल लगता है. इतिहास के ऑपरेशंस दिखाते हैं कि एयर पावर सपोर्टिव है, लेकिन डिसाइसिव नहीं. US-Israel के हमले ईरान की कैपेबिलिटीज को डिग्रेड कर सकते हैं, लेकिन फुल चेंज के लिए ज्यादा कमिटमेंट चाहिए – जो फिलहाल नहीं दिख रहा. ये कंफ्लिक्ट लंबा चल सकता है, जिसमें हाई कैजुअल्टीज, इकोनॉमिक डैमेज (आयल प्राइस राइज) और रिजनल इंस्टेबिलिटी होगी. बेहतर होगा कि डिप्लोमेसी से हल निकले, लेकिन बिना ग्राउंड सपोर्ट के रेजिम चेंज एक गैंबल है जो फेल हो सकता है. ईरान के लोग चेंज चाहते हैं, लेकिन मिलिट्री स्ट्रैटजी के बिना ये मुश्किल, दुनिया को देखना है कि ये ऑपरेशन कैसे इवॉल्व करता है.

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