ईरान-इजरायल जंग का असर, क्या डगमगाएगी दुनिया की अर्थव्यवस्था?

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Last Updated:March 01, 2026, 15:58 IST

पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते टकराव ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. खाड़ी देशों तक पहुंचे हमलों ने हालात को और गंभीर बना दिया है. तेल बाजार में उथल-पुथल के संकेत मिल रहे हैं, जिसका असर भारत समेत कई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है. सवाल यही है कि क्या यह संघर्ष क्षेत्रीय रहेगा या वैश्विक संकट में बदल जाएगा?

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ईरान जंग का दुनिया पर कितना पड़ेगा असर? (Image:AI)

नई दिल्ली. दुबई और दोहा में लगातार दूसरे दिन धमाकों की आवाजें सुनी गईं, जबकि ओमान पहली बार हमलों की चपेट में आया. अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के जवाब में खाड़ी देशों पर जवाबी कार्रवाई ने पूरे पश्चिम एशिया को अस्थिर कर दिया है. हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं और वैश्विक नेतृत्व गहरी चिंता में है. दुनिया इस संघर्ष को सिर्फ एक क्षेत्रीय युद्ध नहीं, बल्कि संभावित वैश्विक संकट के रूप में देख रही है.

तेहरान में सत्ता परिवर्तन की अटकलें तेज
इस संघर्ष का सबसे बड़ा सवाल ईरान में सत्ता परिवर्तन का है. ईरान के सर्वोच्च नेता अयतुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद इस्लामिक रिपब्लिक का भविष्य अनिश्चित हो गया है. कई विश्लेषकों का मानना है कि अगर शासन परिवर्तन की कोशिश खुलकर सामने आती है, तो हालात और विस्फोटक हो सकते हैं. एक ऐसा शासन जो खुद को अस्तित्व की लड़ाई में देखे, वह किसी भी हद तक जा सकता है. यही वजह है कि क्षेत्रीय अस्थिरता का खतरा पहले से ज्यादा बढ़ गया है.

रणनीतिक मकसद पर उठते सवाल
फाइनेंशियल एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेल्लानी ने सवाल उठाया है कि किसी भी सैन्य अभियान का साफ राजनीतिक मकसद होना चाहिए. उनका मानना है कि जब अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के खिलाफ कार्रवाई की, तो उन्होंने अधिकतम लक्ष्य यानी तेहरान में सत्ता परिवर्तन को अपनाया. दूसरी ओर अमेरिकी अर्थशास्त्री Jeffrey Sachs ने एक चर्चा में कहा कि यह संघर्ष सिर्फ परमाणु मुद्दे तक सीमित नहीं है, बल्कि पश्चिम एशिया में इजरायल के प्रभाव को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है. इन बयानों ने बहस को और गहरा कर दिया है.

क्या हमले से बदलेगा ईरान का शासन?
कैपिटलमार्केट विशेषज्ञ दीपक शेनॉय का मानना है कि इन हमलों से ईरान के भीतर सत्ता परिवर्तन की संभावना कम है. उनका कहना है कि बाहरी हमले अक्सर जनता को एकजुट कर देते हैं. ईरान में अमेरिका या इजरायल के प्रति पहले से ही नाराजगी है, ऐसे में आम नागरिक अपने शासन के पीछे खड़े हो सकते हैं. इसके अलावा ईरान ने वर्षों की तेल आय से अपनी सैन्य क्षमता मजबूत की है, जिससे उसकी मिसाइल और ड्रोन ताकत को कम समय में खत्म करना आसान नहीं होगा.

जमीन नहीं, मिसाइलों और ड्रोन की जंग
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान जैसे बड़े और मजबूत देश के खिलाफ जमीनी युद्ध की संभावना बेहद कम है. यह लड़ाई मिसाइलों, ड्रोन और तकनीकी हथियारों के जरिए लड़ी जाएगी. अमेरिकी सैन्य ठिकाने भी संभावित निशाने पर आ सकते हैं. ऐसे में संघर्ष लंबा खिंच सकता है और क्षेत्रीय संतुलन पूरी तरह बदल सकता है. हर नई रणनीति के साथ युद्ध का स्वरूप और जटिल होता जा रहा है.

तेल बाजार में उथल-पुथल, भारत की चिंता बढ़ी
इस जंग का सबसे सीधा असर कच्चे तेल पर पड़ सकता है. अगर होरमुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति प्रभावित होती है, तो जहाजों को अफ्रीका का चक्कर लगाना पड़ सकता है, जिससे लागत बढ़ेगी. भारत के लिए यह बड़ा झटका होगा क्योंकि तेल उसका सबसे बड़ा आयात है. हालांकि आंकड़े बताते हैं कि भारत ने हाल के महीनों में ईरान से बहुत कम तेल खरीदा है, इसलिए सप्लाई स्रोत बदलना संभव है. फिर भी अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उछाल का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.

महंगाई और ऊर्जा नीति की परीक्षा
अगर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं और खुदरा ईंधन दरों में इजाफा होता है, तो महंगाई बढ़ सकती है. हालांकि सरकार के पास कुछ समय तक कीमतों को स्थिर रखने की गुंजाइश है. घरेलू ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने की दिशा में प्रयास भी उम्मीद जगाते हैं. अंडमान तट के पास गैस खोज जैसी पहल अगर तेज की जाती है, तो आयात पर निर्भरता कुछ कम हो सकती है.

वैश्विक बाजारों पर सीमित लेकिन संवेदनशील असर
वैश्विक स्तर पर बाजारों ने हाल के भू-राजनीतिक तनावों को अपेक्षाकृत शांत तरीके से लिया है. लेकिन अगर कच्चे तेल में तेज उछाल आता है, तो अमेरिकी और यूरोपीय बाजारों में घबराहट देखी जा सकती है. अभी तक बड़े भू-राजनीतिक घटनाक्रमों ने बाजारों को स्थायी झटका नहीं दिया है. फिर भी अनिश्चितता बनी हुई है. विशेषज्ञ मानते हैं कि निवेशकों को जल्दबाजी में फैसले लेने से बचना चाहिए, क्योंकि बाजार अक्सर उम्मीद के विपरीत दिशा में भी जा सकते हैं.

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Rakesh Singh

Rakesh Singh is a chief sub editor with 14 years of experience in media and publication. affairs, Politics and agriculture are area of Interest. Many articles written by Rakesh Singh published in ...और पढ़ें

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New Delhi,Delhi

First Published :

March 01, 2026, 15:58 IST

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