Last Updated:February 28, 2026, 14:36 IST
अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमला कर दिया है. इस युद्ध का असर भारत पर भी होगा. अमेरिकी प्रतिबंधों, लगातार बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और अन्य वैश्विक कारकों के चलते भारत-ईरान के बीच प्रत्यक्ष व्यापार तो अब बहुत कम हो गया है, लेकिन कच्चे तेल की कीमतें बढने से इंडिया को नुकसान होगा.

नई दिल्ली. वाशिंगटन और तेहरान के बीच बढ़ता तनाव अब एक पूर्ण सैन्य संघर्ष में बदल चुका है. अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए हमले ने न केवल मध्य पूर्व को अस्थिर कर दिया है, बल्कि इसका असर कई देशों पर होगा, जिनमें भारत भी शामिल है. भौगोलिक रूप से ईरान भारत का पड़ोसी क्षेत्र है और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भारत की ‘लाइफलाइन’ इसी रास्ते से होकर गुजरती है. ऐसे में यह युद्ध भारत के लिए अच्छा-खासा आर्थिक संकट लेकर आया है. युद्ध से ईरानी कच्चे तेल की वैश्विक आपूर्ति बाधित होने की आशंका है. ऐसा होने पर क्रूड की कीमतें बढेंगी और इसका खामियाजा भारत को भुगताना होगा क्योंकि इंडिया अपनी तेल की 85 फीसदी जरूरत आयात से ही पूरा करता है. क्रूड के दाम में एक डॉलर की बढोतरी ही भारत का बिल 9000 करोड़ रुपये सालाना बढा देगा. बासमती सहित कई कृषि जिंसों का निर्यात भी प्रभावित होगा.
अमेरिकी प्रतिबंधों, लगातार बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और अन्य वैश्विक कारकों के कारण दोनों देशों के बीच होने वाले व्यापार की मात्रा में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है. वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच कुल व्यापार लगभग 1.68 अरब अमेरिकी डॉलर तक सीमित रह गया है. इस व्यापारिक समीकरण का एक सकारात्मक पहलू भारत का मजबूत निर्यात पक्ष है. कुल व्यापार में से भारत ने ईरान को लगभग 1.24 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं का निर्यात किया है, जबकि ईरान से भारत का आयात काफी कम यानी लगभग 0.44 अरब डॉलर व्यापार के इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारत वर्तमान में ईरान के साथ एक मजबूत स्थिति में है और उसे लगभग 0.80 अरब डॉलर का ट्रेड सरप्लस प्राप्त हुआ है.
91 डॉलर तक जा सकता है कच्चा तेल
वैश्विक तेल उत्पादन में ईरान की हिस्सेदारी लगभग 4-5% है. हालांकि, भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान से सीधे तेल खरीदना बंद कर दिया है, लेकिन वैश्विक बाजार में सप्लाई घटने से कीमतों में जो उछाल आएगा, वह भारत को अधिक कीमत चुकाने पर मजबूर कर देगा. इससे देश का राजकोषीय घाटा बढ़ेगा और भारतीय रुपये की वैल्यू पर भी दबाव पड़ेगा. अभी तेल की कीमतें 71 डॉलर के आसपास हैं. कुछ दिन पहले ही ब्लूमबर्ग आशंका जताई थी कि अगर ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध होता है तो 2026 की अंतिम तिमाही तक तेल की कीमतें 91 डॉलर बैरल तक पहुंच सकती हैं. वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने 161 अरब डॉलर (करीब 14.64 लाख करोड़ रुपये) का तेल विभिन्न देशों से खरीदा था.
महंगाई का होगा चौतरफा हमला
कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने का मतलब केवल पेट्रोल-डीजल का महंगा होना नहीं है. तेल की कीमतों में उछाल का असर उन सभी उद्योगों पर पड़ता है जो पेट्रोकेमिकल्स का इस्तेमाल करते हैं. इससे पेंट और केमिकल्स बनाने की लागत बढ जाएगी. पॉलिएस्टर और सिंथेटिक कपड़ों के निर्माण में कच्चे तेल के उप-उत्पादों का इस्तेमाल होता है. तेल के दाम बढने से ये महंगे हो सकते हैं. डीजल महंगा होने से माल ढुलाई की लागत बढ़ेगी, जिससे फल, सब्जी और अनाज जैसे कृषि उत्पादों के दाम बढ़ जाएंगे.
होर्मुज जलडमरूमध्य रूका तो और संकट
रणनीतिक मोर्चे पर सबसे बड़ी चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर है. भारत अपने कुल कच्चे तेल और एलएनजी (LNG) का लगभग आधा हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से आयात करता है. युद्ध की स्थिति में यदि यह रास्ता बाधित होता है, तो भारत के लिए ऊर्जा का गंभीर संकट पैदा हो जाएगा. इस रास्ते में किसी भी तरह की रुकावट भारत की आर्थिक सेहत के लिए बहुत खतरनाक होगी.
बासमती किसानों को हो सकता है घाटा
भारत ईरान को मुख्य रूप से खाद्यान्न और जीवन रक्षक दवाओं का निर्यात करता है. वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी वर्ष 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय बासमती चावल ईरान के बाजार में सबसे अधिक मांग वाला उत्पाद बना हुआ है. लगभग 698 मिलियन डॉलर के मूल्य के साथ बासमती चावल भारत के कुल निर्यात का एक बहुत बड़ा हिस्सा कवर करता है. इसलिए अगर अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण निर्यात रुकता है तो भारतीय बासमती किसानों को नुकसान हो सकता है.
Location :
New Delhi,New Delhi,Delhi
First Published :
February 28, 2026, 14:36 IST

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