सुप्रीम कोर्ट कई बार भारत की जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करके कई ऐसे आदेश पारित कर देती है, जिसका सामाजिक ताने-बाने पर प्रतिकूल असर पड़ता है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट बेंच ने शुक्रवार को यह बात भारतीय न्याय संहिता (BNS) में राजद्रोह की धारा और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की अनुमति देने वाली धारा की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान कही.
दरअसल सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को भारतीय न्याय संहिता (BNS) में देशद्रोह से जुड़े प्रावधान और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के उस प्रावधान पर बहस हुई, जिसमें एफआईआर दर्ज करने से पहले पुलिस को प्रारंभिक जांच की अनुमति दी गई है. वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने दलील दी कि एफआईआर से पहले जांच की अनुमति 2014 के लालिता कुमारी फैसले के खिलाफ है, जिसमें कहा गया था कि संज्ञेय अपराध का खुलासा होने पर पुलिस को तुरंत एफआईआर दर्ज करनी होगी, हालांकि कुछ सीमित मामलों में प्रारंभिक जांच की छूट दी गई थी.
इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि किसी नए कानून की वैधता परखने के लिए उसके लागू होने के बाद कुछ समय तक उसके कामकाज को देखना जरूरी है. अगर व्यवहार में खामियां सामने आती हैं, तब उन्हें अदालत में चुनौती दी जा सकती है.
‘ललिता कुमारी केस के नाम पर फर्जी मुकदमे’
सीजेआई सूर्यकांत ने सवाल उठाया, ‘क्या आप जानते हैं कि ललिता कुमारी के फैसले का किस तरह दुरुपयोग होता है? किस तरह तुच्छ और भावनात्मक शिकायतों पर एफआईआर दर्ज कराने की कोशिश की जाती है?’ उन्होंने कहा, ‘कई बार हम मौलिक अधिकारों की रक्षा के नाम पर ऐसे व्यापक आदेश दे देते हैं, मानो हम आइवरी टॉवर (हाथीदांत के मीनार) में बैठे हों, जबकि जमीनी सच्चाई कुछ और होती है.’
सीजेआई ने आगे कहा कि ग्रामीण इलाकों में गुस्से या क्षणिक भावनाओं में की गई शिकायतें जब सीधे एफआईआर में बदल जाती हैं, तो वे समाज में गहरी दुश्मनी और तनाव पैदा कर सकती हैं. उन्होंने चेताया, ‘इस तरह के आदेश सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचा सकते हैं.’
पुलिस सत्यापन नहीं करेगी तो कौन करेगा?
इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने तर्क दिया कि एफआईआर के समय शिकायत की सत्यता परखने का अधिकार पुलिस को कैसे दिया जा सकता है. इस पर पीठ ने तीखा सवाल किया, ‘अगर पुलिस शिकायत की सत्यता नहीं परखेगी, तो फिर कौन परखेगा?’
वहीं जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि लालिता कुमारी फैसले में ही कुछ श्रेणियों (जैसे वैवाहिक विवाद) में प्रारंभिक जांच की अनुमति दी गई थी. विधायिका ने अपराध की गंभीरता और सजा की प्रकृति को देखते हुए इसी पहलू को कानून में शामिल किया है. उन्होंने कहा, ‘ऐसा प्रावधान लालिता कुमारी फैसले के खिलाफ नहीं कहा जा सकता.’
संसद बनाम सरकार का हलफनामा
देशद्रोह प्रावधान को लेकर गुरुस्वामी ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भरोसा दिलाया था कि वह ऐसा प्रावधान नहीं लाएगी, इसके बावजूद इसे BNS में शामिल किया गया. इस पर पीठ ने स्पष्ट किया, ‘केंद्र सरकार ऐसा आश्वासन दे सकती है, लेकिन संसद उस आश्वासन से बंधी नहीं होती.’
इस तरह सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को न्यायपालिका के भीतर आत्मावलोकन के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें अदालत ने खुद स्वीकार किया कि कानून की व्याख्या और मौलिक अधिकारों की रक्षा करते समय सामाजिक यथार्थ को नजरअंदाज करना दूरगामी परिणाम पैदा कर सकता है.
ललिता कुमारी केस में क्या हुआ था?
ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने को लेकर एक अहम और ऐतिहासिक फैसला दिया था. यह मामला तब सामने आया, जब ललिता कुमारी के पिता ने बेटी के अपहरण की शिकायत पुलिस में दी, लेकिन पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी शिकायत से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो पुलिस के लिए एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है और वह अपनी मर्जी से जांच टाल नहीं सकती. यह फैसला आम नागरिकों को पुलिस की लापरवाही से बचाने और न्याय प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए दिया गया.
हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि हर मामले में तुरंत एफआईआर दर्ज करना व्यावहारिक नहीं हो सकता. इसलिए कुछ सीमित श्रेणियों- जैसे वैवाहिक विवाद, व्यावसायिक लेन-देन, चिकित्सकीय लापरवाही, भ्रष्टाचार या अत्यधिक देरी से की गई शिकायतों में पुलिस को एफआईआर से पहले प्रारंभिक जांच करने की छूट दी गई. यह जांच तय समय-सीमा में पूरी करनी होगी और एफआईआर से इनकार करने पर कारण लिखित रूप में बताना अनिवार्य होगा. इस तरह, फैसले ने एक ओर पीड़ित के अधिकारों की रक्षा की, तो दूसरी ओर कानून के संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए संतुलन भी बनाया.

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