Saudi Arabia Vs UAE: यमन को लेकर दो इस्लामिक मुल्क यानी सऊदी अरब और UAE में जंग बढ़ती जा रही है. यमन के पूर्वी हिस्से में सऊदी अरब और UAE समर्थित गुटों के बीच दोबारा टकराव शुरु हो गया है. दोनों गुटों के बीच यमन के हेद्रामोट जिले में गोलाबारी हुई है जो सऊदी अरब के बॉर्डर के बेहद करीब है. इस टकराव के साथ ही साथ UAE समर्थित मिलिशिया ने ये भी ऐलान कर दिया है कि वो दो साल के अंदर यमन में रेफरेंडम कराएंगे और अपने कंट्रोल वाले इलाकों को स्वतंत्र देश घोषित करेंगे. UAE समर्थित STC ने कहा है कि नए देश को दक्षिणी अरबिया कहा जाएगा.
यमन और सऊदी अरब के बॉर्डर पर जहां नए टकराव हुए हैं. ये वही जगह है जहां 1 और 2 जनवरी के दरमियान सऊदी एयरफोर्स ने बमबारी की थी. सऊदी अरब का कहना था कि ये बमबारी बागियों को सऊदी अरब की सीमा से दूर रखने के लिए की गई है. बमबारी के बाद UAE ने भी यमन से अपनी फौज वापस हटा ली थी. लेकिन दोबारा टकराव और स्वतंत्र राष्ट्र के ऐलान ने ये बता दिया है कि जिस शांति की बात UAE कर रहा था वो सिर्फ छलावा था. असल में UAE समर्थित बागी गुट सऊदी समर्थित गुट को पीछे धकेलने में लगा हुआ है.
UAE और सऊदी अरब के बीच तेज हई इस अदावत के बीच दुनिया की नजरें अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप पर टिक गई हैं. लंबे वक्त से अरब जगत में अमेरिका का प्रभाव रहा है और दोनों ही देशों के साथ ट्रंप के संबंध काफी अच्छे रहे हैं. ऐसे में सामरिक दुनिया के जानकार पूछ रहे हैं कि अपने दो मित्रों को लड़ने से रोकने के लिए ट्रंप क्या करेंगे. इन संबंधों और समीकरणों को समझने के लिए आपको सऊदी अरब और UAE से ट्रंप की हालिया डील्स को ध्यान से देखना चाहिए.
सऊदी अरब के साथ ट्रंप ने 600 बिलियन डॉलर की डील की है. जबकि UAE के साथ ट्रंप ने 200 बिलियन डॉलर का आर्थिक समझौता किया है. सऊदी अरब में अमेरिका ऊर्जा और उत्पादन के क्षेत्र में निवेश कर चुका है जबकि UAE के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में सहयोग किया जा रहा है.
भले ही ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति हों लेकिन उनके अंदर का बिजनेसमैन आज भी जिंदा है. एक ऐसा बिजनेसमैन जो हमेशा नफा और नुकसान देखकर चलता है. इसी वजह से यमन में सऊदी और UAE समर्थित गुटों की लड़ाई पर अमेरिका ने कोई अधिकारिक बयान नहीं दिया है. ट्रंप इस वक्त वेट एंड वॉच की नीति अपना रहे हैं...और जितना वक्त बीतता जा रहा है वो हालात को ट्रंप की तरफ झुका रहा है. हम ऐसा क्यों कह रहे हैं ये समझने के लिए आपको इस टकराव में ट्रंप को खुश करने की कोशिशों को गौर से समझना चाहिए.
टकराव के बाद से ही सऊदी अरब के प्रतिनिधि वॉशिंगटन में मौजूद हैं और वो ट्रंप के करीबियों को लगातार लामबंद कर रहे हैं ताकि ट्रंप की सरपरस्ती हासिल हो सके. दूसरी तरफ UAE समर्थित गुट ने कह दिया है कि वो अब्राहम अकॉर्ड का हिस्सा बनेगा. इसका मतलब है कि एक और इस्लामिक पक्ष ट्रंप के दोस्त इजरायल को मान्यता देगा. अगर ऐसा हुआ तब भी दुनिया की राजनीति में ट्रंप का कद कई गुना बढ़ जाएगा.
सब यही सोच रहे हैं कि UAE और सऊदी अरब की अदावत में ट्रंप किसका साथ देंगे और किससे किनारा करेंगे लेकिन एक पहलू पर किसी का गौर नहीं जा रहा. ये पहलू भी ट्रंप के मुनाफे से ही जुड़ा है और इसकी बुनियाद में है हथियारों की बिक्री. सऊदी अरब और UAE के साथ ट्रंप पहले ही F-35 फाइटर जेट की डील कर चुके हैं जिसकी कीमत अरबों डॉलर में है. अगर हालात युद्ध की तरफ बढ़े तो दोनों देश ज्यादा हथियार खरीदने पर मजबूर होंगे और उनके पास ट्रंप के अलावा कोई और विकल्प नहीं होगा. युद्ध के डर से मुनाफा कमाने का इंतजाम भी ट्रंप पहले ही कर चुके हैं. यहां आपको बिजनेसमैन ट्रंप के एक और प्लान पर गौर से समझना चाहिए.
सऊदी अरब और ट्रंप प्रशासन के बीच थाड और पेट्रियट जैसे आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम की डील पर बातचीत जारी है. दूसरी तरफ UAE के साथ अमेरिका घातक रीपर ड्रोंस की डील पर बात आगे बढ़ा रहा है. सऊदी अरब को ट्रंप सरकार ने 300 मेन बैटल टैंक बेचने का ऑफर दिया है तो UAE के सामने आधुनिक मिसाइल सिस्टम देने का प्रस्ताव पेश किया गया है. ये तथ्य साफ बताते हैं कि युद्ध नहीं हुआ तो ट्रंप शांतिदूत कहलाएंगे और अगर युद्ध हो गया तो ट्रंप मालामाल हो जाएंगे.

1 day ago
