अजित पवार की असामयिक मौत ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा कर दिया है. बारामती के पास हुए प्लेन क्रैश में उनकी मौत की पुष्टि हो चुकी है. ये हादसा ऐसे समय में हुआ है जब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में दो गुटों के बीच एकीकरण की चर्चाएं चल रही थीं. कुल मिलाकर शरद पवार के कमजोर होने के बाद फिलहाल अजित पवार ही महाराष्ट्र में एनसीपी के चेहरा बनकर उभर चुके थे. ये बात उन्होंने् महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में साबित भी कर दिया. लेकिन अब वही सवाल है कि कौन पार्टी की कमान संभालेगा. क्या ये पार्टी वापस शरद पवार की ओर लौटेगी.
अजित पवार को ‘दादा’ कहा जाता था, जो उनकी मजबूत छवि को दर्शाता है. वे एक मास लीडर थे, जो राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं मानते थे. अजित ने एनसीपी को ग्रामीण महाराष्ट्र, खासकर पश्चिमी महाराष्ट्र में मजबूत बनाया. जब एनसीपी में दोफाड़ हुई तो उन्होंने ज्यादातर विधायकों को अपने साथ कर लिया, जिससे उनका गुट सत्ता में आया. महायुति गठबंधन में वे महत्वपूर्ण थे. एनडीए के लिए एक मजबूत सहयोगी. बारामती उनका गढ़ था, जहां से वे कई बार विधायक बने.
उनकी मृत्यु ने खुद उनकी पार्टी को इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां ये सवाल होगा कि ये पार्टी अब किधर जाएगी. कौन अब इसकी बागडोर संभालेगा. पिछले कुछ समय से एनसीपी के दोनों धड़ों की जो एकीकरण की चर्चाएं चल रही थीं, वो अब कैसे सिरे चढेंगी. उनकी मौत ने उनके गुट को भी असमंजस में डाल दिया है, क्योंकि वे ही गुट के मुख्य चेहरा थे.
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2023 में एनसीपी में दोफाड़ हुआ
एनसीपी की स्थापना 1999 में शरद पवार ने की थी, जो मूल रूप से कांग्रेस से अलग होकर बनी. 2023 में पार्टी में बड़ा विभाजन हुआ, जब अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार से बगावत कर दी. एनसीपी के बड़े हिस्से को अपने साथ ले लिया. उन्होंने चुनाव आयोग से एनसीपी का नाम और सिंबल हासिल कर लिया, जबकि शरद पवार के गुट को एनसीपी (शरदचंद्र पवार) या एनसीपी-एसपी कहा जाने लगा.
हालांकि अजित पवार ने पार्टी मुख्यमंत्री बनने की अपनी सियासी महत्वाकांक्षाओं के कारण तोड़ी, जो पूरी नहीं हो सकी. वह उप मुख्यमंत्री ही रहे. 2019 में उन्होंने देवेंद्र फडणवीस के साथ मिलकर 80 घंटे की सरकार बनाई थी, जो असफल रही. 2023 में उन्होंने बीजेपी-शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) के साथ महायुति गठबंधन में शामिल होकर डिप्टी सीएम का पद हासिल किया.
चाचा शरद पवार से बढ़ने लगीं थीं मुलाकातें
फिलहाल महाराष्ट्र विधानसभा में अजित गुट के पास 40 से ज्यादा विधायक हैं. शरद गुट के पास केवल 13-14. हालांकि पिछले कुछ समय से अजित पवार की चाचा शरद पवार से मेल मुलाकातें बढ़ीं थीं. एकीकरण की चर्चाएं मजबूत होने लगी थीं. इस बीच ये हादसा हो गया.
महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम और एनसीपी नेता का विमान क्रैश हो गया है.
पवार परिवार में हुई फूट परिवारिक स्तर पर भी थी. शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले शरद गुट में रहीं, जबकि अजित की पत्नी सुनेत्रा पवार ने 2024 लोकसभा चुनाव में सुप्रिया के खिलाफ बारामती से चुनाव लड़ा और हारीं. हालांकि इसके बाद वह राज्यसभा सदस्य बनीं.
दोनों गुट अब साथ आ रहे थे
इस फूट ने एनसीपी को कमजोर किया. 2024 लोकसभा चुनावों में अजित गुट को केवल 1 सीट मिली, जबकि शरद गुट को 8 लेकिन विधानसभा चुनावों में अजित गुट ने महायुति के साथ मजबूती दिखाई. हाल ही में जनवरी 2026 में नगर निगम चुनावों के लिए दोनों गुटों ने पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ में गठबंधन किया, जो एकीकरण की दिशा में पहला कदम था.
फूट ने शरद को कमजोर किया
रिपोर्ट्स थीं कि अजित पवार महाराष्ट्र में पार्टी लीड करेंगे जबकि सुप्रिया सुले दिल्ली में. उन्हें मोदी कैबिनेट में जगह मिल सकती थी. ऐसा लगता है कि अंदरखाने साथ आने की बातचीत पूरी तरह पक चुकी थी.
अब सवाल है कि पार्टी की अगुवाई कौन करेगा. शरद पवार अब 85 साल के हैं. स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं. 2023 की फूट ने उन्हें कमजोर किया. उनके गुट के पास कम विधायक और संसाधन थे, जिससे वे विपक्ष में सिमट गए. अजित की बगावत ने शरद पवार की छवि को धक्का पहुंचाया, क्योंकि वे परिवारवाद के प्रतीक थे.
क्या दोनों गुटों में समझौते के करीब थे
हालिया संकेत बताते हैं कि वो अब पार्टी दोनों गुटों की एकता और भतीजे से समझौते के लिए तैयार थे. हालांकि, शरद पवार की रणनीतिक क्षमता अभी बरकरार है. सुप्रिया सुले उनकी उत्तराधिकारी के रूप में उभर रही हैं. तो कौन होगा अब अजित गुट का उत्तराधिकारी या एनसीपी के एकीकरण की सूरत में पार्टी का मुख्य चेहरा.
कौन हैं एनसीपी के दूसरे दमदार नेता
अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं, 2024 में लोकसभा चुनाव लड़ीं हालांकि हार गईं. परिवारिक विरासत के कारण वे मजबूत दावेदार हैं, लेकिन उनकी अजित जैसी जन अपील नहीं है. बेटा पार्थ युवा हैं, 2019 में लोकसभा चुनाव हार चुके हैं. अनुभव के लिहाज से कम हैं.
इसके बाद पार्टी में प्रफुल पटेल (केंद्रीय मंत्री), छगन भुजबल (ओबीसी नेता), सुनील तटकरे (पार्टी अध्यक्ष) और धनंजय मुंडे जैसे मजबूत नेता हैं, लेकिन कोई अजित जैसा करिश्माई नहीं. कुल मिलाकर गुट में कोई एकल ताकतवर नेता नहीं है जो अजित की जगह ले सके. इससे गुट कमजोर पड़ सकता है. कुछ प्रतिक्रियाओं में कहा गया है कि बीजेपी गुट को हाईजैक कर सकती है.
ऐसे में ये कयास भी लग रहे हैं कि अजित पवार गुट फिर शरद पवार की ओर लौट सकता है. शरद अनुभवी हैं. सुप्रिया सुले राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय. अगर एकीकरण होता तो शरद गुट मजबूत हो सकता है, क्योंकि अजित गुट बिना लीडर के बिखर सकता है. हालांकि ये सवाल भी हैं कि अजित पवार की पार्टी के नेता क्या चाहते हैं. ये भी तय है कि ये गुट अलग एकीकरण नहीं करता और अलग रहता है तो एनसीपी पूरी तरह से कमजोर हो सकती है.
बहुत हद तक ये सब विधायकों की वफादारी और परिवारिक फैसलों पर निर्भर करेगा. अजित पवार खुद पार्टी के चेहरा, संगठनात्मक ताकत और महायुति गठबंधन में मुख्य पावर ब्रोकर थे. उनकी जगह लेने वाला कोई दूसरा नेता उनके जैसा करिश्मा, जनसंपर्क और विधायकों पर पकड़ वाला नहीं दिखता. ये चेहरे अजित गुट के एनसीपी की कमान को संभालने के दावेदार हो सकते हैं
सुनेत्रा पवार – वह अजित पवार की पत्नी हैं. राज्यसभा सदस्य हैं लेकिन सियासी तौर पर उनकी कोई खास पहचान नहीं हैं. उन्हें आमतौर पर अजित पवार की पत्नी के तौर पर ही ज्यादा जाना जाता है.
प्रफुल पटेल – एनसीपी के वर्किंग प्रेसिडेंट हैं. अजित गुट के सबसे वरिष्ठ केंद्रीय स्तर के नेता. वह केंद्र में मंत्री रह चुके हैं. अजित पवार के करीबी थे. सियासत में लंबे समय से हैं. उनकी संगठनात्मक क्षमता मजबूत है तो दिल्ली की राजनीति में दखल भी रखते हैं लेकिन उनकी जमीनी नेता के तौर पर वैसी पकड़ और करिश्मा नहीं. पार्टी को स्थिर रखना हो तो वे अंतरिम या सहायक भूमिका में आ सकते हैं लेकिन मुख्य चेहरा बनना मुश्किल.
छगन भुजबल – ओबीसी नेता के रूप में मजबूत पकड़, खासकर नासिक और उत्तर महाराष्ट्र में. अजित गुट के साथ 2023 पार्टी के बंटवार में शामिल हुए और मंत्री हैं. जातीय समीकरण और अनुभव के कारण महत्वपूर्ण, लेकिन उनकी उम्र 75 साल से ऊपर है और विवादास्पद छवि भी.
सुनील तटकरे और धनंजय मुंडे – तटकरे पार्टी के अध्यक्ष हैं और रायगढ़-कोकण क्षेत्र में प्रभावशाली नेता हैं. मुंडे ओबीसी-मराठा समीकरण में मजबूत हैं. दोनों अजित के करीबी थे, लेकिन इन दोनों में कोई भी अकेले पार्टी को एकजुट रखने या महायुति में वजन देने लायक नहीं दिखता.
फिलहाल तो एनसीपी का नेता सुनेत्रा पवार या प्रफुल पटेल को बनाया जा सकता है. लेकिन एनसीपी को अपनी पहचान बनाए रखने के लिए शरद पवार गुट के साथ एकीकरण करना पड़ेगा. तब शरद पवार एक बार पार्टी का मुख्य चेहरा बन सकते हैं.

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