Last Updated:January 05, 2026, 14:08 IST
सीजेआई सूर्यकांत ने अजमेर शरीफ दरगाह को लेकर आई एक याचिका को क्यों खारिज की?Supreme Court On Rajasthan’s Ajmer Dargah Case: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम फैसले में अजमेर स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह से जुड़ी एक जनहित याचिका (PIL) को सिरे से खारिज कर दिया है. यह याचिका विश्व वैदिक सनातन संघ की ओर से दायर की गई थी, जिसमें प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) की ओर से हर साल दरगाह पर चढ़ाई जाने वाली ‘चादर’ की परंपरा पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई थी. जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए इसे विचार योग्य नहीं माना और याचिकाकर्ता को बैरंग लौटा दिया.
दरअसल, इस याचिका को विश्व वैदिक सनातन संघ के प्रमुख जितेंद्र सिंह और विष्णु गुप्ता द्वारा दायर की गई थी. याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई थी कि अजमेर दरगाह पर प्रधानमंत्री की ओर से चादर चढ़ाने की जो परंपरा वर्षों से चली आ रही है, उसे रोका जाना चाहिए. उनका तर्क था कि सरकारी तंत्र या देश के प्रधानमंत्री की ओर से किसी विशिष्ट धार्मिक स्थल पर इस तरह की परंपरा का निर्वहन नहीं होना चाहिए.
क्या थी दलील
याचिका कर्ता की ओर से पेश वकील बरुण सिन्हा ने कहा कि यह धार्मिक स्थल नहीं, चिश्तिया संप्रदाय का इलाका है. साथ ही उन्होंने अदालत के सामने जोरदार दलीलें रखीं. उन्होंने कोर्ट को बताया कि इस मुद्दे से जुड़ा उनका एक मुकदमा पहले से ही दीवानी अदालत (Civil Court) में लंबित है. वकील बरुण सिन्हा ने 1961 के एक पुराने अदालती फैसले का हवाला देते हुए दावा किया कि कोर्ट ने उस समय यह माना था कि अजमेर दरगाह तकनीकी रूप से कोई ‘धार्मिक स्थल’ नहीं है, बल्कि यह ‘चिश्तिया संप्रदाय’ का एक क्षेत्र है. इसी आधार पर उन्होंने तर्क दिया कि जब स्थान की प्रकृति को लेकर ही विवाद है और मामला निचली अदालत में है, तो पीएमओ की ओर से चादर चढ़ाने की परंपरा पर रोक लगनी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने वकील की दलीलों को सुनने के बाद याचिका में कोई मेरिट नहीं पाई. जस्टिस सूर्य कांत ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा, ‘यह विचारणीय मुद्दा नहीं है (This is not a matter for consideration).’ इसके साथ ही उन्होंने रिट याचिका को खारिज कर दिया. हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की एक चिंता का समाधान जरूर किया. जब वकील ने कहा कि उनकी सिविल सूट (दीवानी मुकदमा) निचली अदालत में लंबित है, तो सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि आज याचिका खारिज होने का असर उस मुकदमे पर नहीं पड़ेगा. CJI ने आदेश में लिखवाया, ‘इस आदेश का लंबित दीवानी मुकदमे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.’
क्या है परंपरा?
गौरतलब है कि अजमेर शरीफ में सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का उर्स हर साल बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. इस मौके पर सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक के रूप में भारत के प्रधानमंत्री की ओर से हर साल एक विशेष ‘चादर’ भेजी जाती है, जिसे दरगाह पर अकीदत के साथ पेश किया जाता है.
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दीप राज दीपक 2022 में न्यूज़18 से जुड़े. वर्तमान में होम पेज पर कार्यरत. राजनीति और समसामयिक मामलों, सामाजिक, विज्ञान, शोध और वायरल खबरों में रुचि. क्रिकेट और मनोरंजन जगत की खबरों में भी दिलचस्पी. बनारस हिंदू व...और पढ़ें
First Published :
January 05, 2026, 13:50 IST

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