ङाल ही में दिल्ली-एनसीआर में भारत टैक्सी सेवा आधिकारिक तौर पर लांच की गई. ये अभी मुख्य तौर पर दिल्ली में उपलब्ध है लेकिन धीरे धीरे इसका विस्तार दूसरे बड़े शहरों में भी किया जाएगा. क्या आपको मालूम है कि भारत में टैक्सी कब पहली बार चलनी शुरू हुईं थीं. किस शहर में सबसे पहले ये शुरू हुईं. इनके मालिक कौन होते थे और कौन लोग इससे चलते थे. इनके किस्से कुछ कम नहीं हैं. वैसे आपको बता दें कि भारत में टैक्सी चलते हुए 100 साल से ज्यादा हो चुके हैं.
तो कह सकते हैं कि भारत की टैक्सी की कहानी ज़्यादातर लोगों की सोच से कहीं ज़्यादा पुरानी और रंगीन है. भारत में टैक्सियां करीब 1911 – 1912 में बॉम्बे यानि मुंबई में शुरू हुईं. भारत यूरोप के बाहर सबसे पहले टैक्सी इस्तेमाल करने वाले देशों में एक बन गया. उस जमाने में ये बहुत बड़ी बात थी और इसे लेकर एक उत्सुकता भी रहती थी.
वैसे आपको बता दें कि भारत के शहरों में मोटर टैक्सियों के आने के पहले इक्का और तांगा चला करते थे. जब भारत में 1900 के दशक की शुरुआत में मोटरकार आईं तो बॉम्बे के अमीर पारसियों और ब्रिटिश अधिकारियों ने तुरंत इसमें बिज़नेस का एक मौका देखा. इसी वजह से भारत में जब बांबे में पहली बार सड़कों पर मोटर टैक्सियां उतरीं, तो उसके मालिक पारसी थे. दोराबजी टाटा कई टैक्सियों के मालिक थे. पारसी गैरेज मालिकों ने इंग्लैंड से कारें इम्पोर्ट कीं.
तब भारत में टैक्सी के तौर पर फिएट, हंबर, ऑस्टिन जैसी कारें चलती थीं. उन्हें घंटे के हिसाब से किराए पर चलती थीं. यूरोपीय अधिकारी, अमीर भारतीय व्यापारियों के साथ ताज महल और वॉटसन जैसे फाइव स्टार होटल इनकी सेवाएं लेते थे.
कैसे आया टैक्सी मीटर
शुरुआत में किराया बोलकर तय किया जाता था, जिससे अराजकता और धोखाधड़ी होती थी. इसलिए बांबे में 1912–1913 में टैक्सियों में मीटर पेश किए गए. ये मैकेनिकल टैक्सी मीटर ब्रिटेन से इम्पोर्ट किए गए. तब कई ड्राइवरों को मीटर पर भरोसा नहीं था. वे मानते थे कि वे धोखा देने वाली मशीनें हैं. ड्राइवर मीटर के लिए कहते थे, ये लोहे का डिब्बा पैसे खा जाता है. सवार सोचते थे, ड्राइवर इसमें छेड़छाड़ करता है.
तब कौन करते थे टैक्सियों का इस्तेमाल
इसमें कोई शक नहीं कि देश में सबसे पहले टैक्सियां मुंबई में आईं. इसके बाद कोलकाता में पहुंचीं. दिल्ली में इसके बाद. दिल्ली में इसका ज्यादा इस्तेमाल ब्रिटिश अधिकारी और राजनयिक किया करते थे. तब बड़ी अमेरिकी कारें टैक्सी के रूप में ज्यादा मशहूर थीं. जो काली पीली बांबे की टैक्सियां आप आज देखते हैं, वो 930-40 के दशक तक आइकॉनिक बन गईं.
शुरुआती टैक्सी ड्राइवर अक्सर कोंकण, यूपी और पंजाब से आए लोग होते थे. इनमें से बहुत से सेना में काम कर चुके मैकेनिक होते थे, जो वहां काम करते करते ये काम सीख जाते थे. हालांकि तब टैक्सी चलाने का मतलब था लंबे घंटों तक काम करना. अंग्रेजी सड़कों के नाम दिल से याद करना. आजादी के बाद फिएट की प्रीमियर पद्मिनी भारत की टैक्सी किंग बन गई. खासकर बंबई में. ये टैक्सियां वहां 30-40 सालों तक चलीं.
2000 के दशक में रेडियो टैक्सियां चलनीं शुरू हुईं. 2013 के बाद ओला और उबर ने सबकुछ बदल दिया. हालांकि आज भी मुंबई और कोलकाता में पुरानी स्टाइल वाली टैक्सियां जिंदा हैं. ।
कहां से आया टैक्सी शब्द
टैक्सी शब्द की उत्पत्ति फ्रांसीसी भाषा के शब्द टैक्सीमीटर से हुई, जिसका अर्थ है “किराया मीटर”. यह शब्द आगे लैटिन शब्द taxa से निकला, जिसका अर्थ है शुल्क या दर. 19वीं सदी के अंत में पेरिस में घोड़ागाड़ियों (हैक्नी कैरिज) के लिए टैक्सीमीटर का इस्तेमाल शुरू हुआ, जो दूरी के हिसाब से किराया मापता था.
जब लोग इस चलती मशीन से डरते थे
जब 1912 के आसपास बांबे में मोटर टैक्सियां सड़क पर उतरीं, तो कई भारतीय पैदल यात्री उनसे दूर भागते थे. अख़बारों में शिकायतें छपती थीं कि ये मशीन घोड़ों को पागल कर देती हैं. कुछ इलाक़ों में टैक्सी को केवल दिन में चलाने की अनुमति थी, रात में नहीं.
पारसी टैक्सी ड्राइवर और अंग्रेज़ अफ़सर
1910–30 के दशक में ज़्यादातर टैक्सियां पारसी मालिकों की थीं. ड्राइवरों को सख़्त हिदायत होती थी कि अंग्रेज़ अफ़सर से बहस नहीं. टोपी और कोट ठीक रखें. शराब पीकर ड्राइविंग नहीं होगी.
कोलकाता में घोड़ा बनाम टैक्सी की लड़ाई
जब कलकत्ता में टैक्सियां चलनी शुरू हुईं तो तांगा यूनियन ने इसका खुलकर विरोध किया. टैक्सी चालकों पर पत्थर फेंके गए. कुछ टैक्सियों के टायर काटे गए. नगर निगम को अलग से नियम बनाने पड़े कि कौन-सी सड़क पर कौन चलेगा.

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