भारत में दशकीय जनगणना इसी साल अप्रैल से शुरू हो जाएगी, दो चरणों में अगले साल तक इसका प्रोसेस चलेगा. क्या आपको मालूम है कि कुछ ऐसे समुदाय हैं, जिनके नाम जनगणना में कभी शामिल नहीं किए जाते. जानते हैं कौन हैं वो लोग और क्यों जनगणना में शामिल नहीं होते. हालांकि अब उन लोगों ने इसके खिलाफ आवाज उठानी शुरू की है.
भारत की दशकीय जनगणना का उद्देश्य देश में हर व्यक्ति और घर को गिनना है लेकिन असल में कुछ ऐसे लोग और समुदाय हैं जिनकी गिनती मुश्किल होती है या जो पारंपरिक रूप से पूरी तरह से इसमें शामिल नहीं हो पातीं. यह बात इस बार भी लागू रहेगी. द हिंदू समाचार पत्र में छपे एक इंटरव्यू की मानें तो डीएनटी यानि डिनोटिफाइड, नोमैडिक-सेमी नोमैडिक ट्राइव्स की गणना इस बार भी एक समस्या होगी. ये बात इंटरव्यू में वर्ष 2006 के डीएनटी पर तकनीकी सलाहकार समूह के अध्यक्ष लेखक और इतिहासकार डॉ. जीएन डेवी ने कही. जानते हैं सवाल जवाब के जरिए इस बारे में सबकुछ.
जनगणना में आमतौर पर किन्हें शामिल किया जाता है?
- सभी स्थायी निवासी लोग
– घरों, परिवारों में रहने वाले व्यक्ति
– शहरों और गांवों में हमेशा रहने वाले लोग
– संस्थागत जगहों पर रहने वाले लोग जैसे हॉस्टल, जेल आदि
किन लोगों की गिनती मुश्किल होती है या पारंपरिक तौर पर पूरी तरह शामिल नहीं होती?
- वो बेघर लोग, जिनका कोई स्थायी घर नहीं है – सड़क पर, फुटपाथ, रेलवे प्लेटफॉर्म आदि जगहों पर रहने वाले लोग.ऐसी आबादी को गिनना मुश्किल काम होता है. 2011 में भी इन्हेें गिनने की कोशिश की गई थी लेकिन ये हो पुख्ता तरीके से हो नहीं पाया.
बहुत दूरदराज और संपर्क से बाहर रह रहे आदिवासी और जनजातियों के लोग. देश में अब भी ऐसे समुदाय हैं, जैसे अंडमान और निकोबार के सेन्टिनेली जैसे जनजाति के लोग, जो बाहरी संपर्क से बचते हैं और उनकी गिनती मुश्किल होती है. ऐसे मामलों में अनुमान या अप्रत्यक्ष तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं या उन्हें पूरी तरह शामिल नहीं किया जाता है ताकि उनकी सुरक्षा बनी रहे.
क्या दुर्गम इलाकों में रहने वाले लोगों के गिनती भी मुश्किल हो जाती है?
- हां, ऐसा भी होता है. बर्फीले और दुर्गम इलाकों में रह रहे लोग अक्सर मौसम के हिसाब से अस्थायी तौर पर स्थान बदलते हैं. ऐसा लद्दाख से लेकर हिमाचल और उत्तराखंड के बर्फीले और दुर्गम इलाकों में रहने वाले लोग आमतौर पर करते रहते हैं. ऐसी जगहों पर पहुंचने में अधिकारी मुश्किल का सामना करते हैं. इन लोगों की गिनती चुनौतीपूर्ण रहती है.
क्या ऐसे लोगों में घूमंतू समुदाय के लोग भी आते हैं, उनकी जनगणना में गिनती कैसे होती है?
डिनोटिफाइड जनजातियां और घूमंतू और अर्ध घूमंतू समूह अक्सर पारंपरिक सूची में स्पष्ट रूप से नहीं दिखते. कई बार वे अलग-से पहचान या कॉलम मांगते हैं ताकि उनकी गिनती ठीक से हो सके. इन समुदायों ने अपने नाम और पहचान के लिए पिछले दशक से आवाज उठाई है. हालांकि सरकारी जनगणना का लक्ष्य यही है कि हर व्यक्ति गिना जाए, आधिकारिक तौर पर किसी को बाहर नहीं रखा जाता लेकिन ऊपर बताए गए समुदायों की गिनती अक्सर कम अंकित हो जाती है या विशेष प्रक्रियाओं के द्वारा अनुमानित की जाती है.
इस बार की जनगणना में डिनोटिफाइड या घूमंतू समुदायों के लिए अलग कॉलम की मांग अभी जारी है, अगर सरकार इसे आधिकारिक तौर पर शामिल कर देती है तो उनकी गिनती बेहतर हो सकती है. /ans]
क्या ये सही है कि वर्ष 1931 के बाद से डीएनटी की उचित तरीके से जनगणना नहीं हुई?
- अगर तथ्यों की बात करें तो ये सही है. हर बार जनगणना के समय उनके अलग कॉलम बनाकर उन्हें सूची में दर्ज करने की मांग की गई लेकिन हकीकत यही है कि खानाबदोश या अर्ध-खानाबदोश लोगों से संबंधित सवाल कभी जनगणना अनुसूचियों में शामिल नहीं किए गए. इनकी संख्या करीब 10 करोड़ के आसपास है. सबसे बड़ी समस्या ये है कि इन्हें अलग अलग करके इनकी गिनती बहुत मुश्किल है. हालांकि बेघर लोगों की जनगणना में एक सामान्य श्रेणी तो होती है लेकिन खानाबदोश समुदायों (डीएनटी) की नहीं.
सरकार यह कैसे सुनिश्चित कर सकती है कि जनगणना में वास्तव में डीएनटी शामिल हों?
- सबसे पहले, जनगणना में यह घोषित किया जाना चाहिए कि डीएनटी की गणना की जाएगी. यह संदेश देश भर के समुदायों तक पहुंचेगा. ऐसे लोगों के लिए एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसके तहत वे किसी कार्यालय में जाकर अपनी डीएनटी स्थिति की घोषणा कर सकें. वैसे ऐतिहासिक रूप से पंचायतों ने भी डीएनटी लोगों को जन्म प्रमाण पत्र जारी करने से इनकार कर दिया है.
इस बार डीएनटी या खानाबदोश समुदाय जनगणना में खुद को शामिल करने के लिए क्या कर रहे हैं?
- देश भर में गैर-अधिसूचित, खानाबदोश और अर्ध-खानाबदोश जनजातियाँ (डीएनटी) 2027 की जनगणना के प्रपत्रों में अपने लिए एक “अलग कॉलम” की मांग को लेकर एकजुट हो रही हैं.
वैसे हमारे देश में घूमंतू समुदाय के लोगों का रिकॉर्ड क्या कहीं होता है. इनका नाम कैसे जनगणना क्या वाकई आ पाता है?
घूमंतू, अर्ध-घूमंतू और डिनोटिफ़ाइड समुदायों का कोई एक “राष्ट्रीय, भरोसेमंद और पूरा” रिकॉर्ड भारत में आज भी मौजूद नहीं है. इसी वजह से जनगणना में इनके नाम अक्सर ठीक से आ ही नहीं पाते.
केंद्र सरकार के स्तर पर इनका कोई सेंट्रल रजिस्टर नहीं है जिसमें सभी घूमंतू और डिनोटिफ़ाइड समुदायों के नाम, संख्या और ठिकाने दर्ज हों. आज़ादी के बाद 1952 में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट खत्म हुआ, लेकिन उसके बाद भी ये लोग कौन हैं, कितने हैं, कहां रहते हैं, इसका व्यवस्थित लेखा-जोखा कभी नहीं बना.
राज्य सरकारों के स्तर पर कुछ राज्यों महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक ने राज्य-स्तरीय सूचियां बनाई हैं. लेकिन राज्यों के हिसाब से इनका दर्जा बदल जाता है. एक ही समुदाय कहीं ओबीसी है, कहीं एससी, कहीं एसटी और कहीं कुछ भी नहीं. कई जगह उन्हें केवल घूमंतू कह दिया जाता है, जाति के तौर पर दर्ज ही नहीं किया जाता.
जनगणना में इनका नाम क्यों छूट जाता है?
- यह असली समस्या है. जनगणना घर से जुड़ी होती है. भारत की जनगणना का बेसिक यूनिट घर है. घूमंतू लोग डेरों में रहते हैं या तंबू, और अस्थायी झोपड़ी में. ये लोग मौसम के हिसाब से जगह बदलते हैं. गणनाकार जब गांव या वार्ड में पहुंचता है, तब वे वहां होते ही नहीं, कहीं और जा चुके होते हैं. वैसे ये लोग नाम और पहचान बताने में भी हिचकते हैं, क्योंकि ब्रिटिश काल में इन्हें अपराधी जनजाति कहा गया. पुलिस, प्रशासन से उनका अविश्वास आज भी बना हुआ है.

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