Last Updated:January 12, 2026, 07:33 IST
इसरो कुछ ही देर में इस सैटेलाइट का प्रक्षेपण करने जा रहा है.PSLV C62/ EOS N1 Live Update: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) आज इतिहास रचने जा रहा है. पीएसएलवी-सी62 मिशन के सफल प्रक्षेपण के साथ भारत न केवल अपने 2026 के अंतरिक्ष कैलेंडर की शानदार शुरुआत करेगा, बल्कि अंतरिक्ष में सैटेलाइट रिफ्यूलिंग तकनीक हासिल करने वाला दुनिया का दूसरा देश बन जाएगा. इस क्षेत्र में अभी तक केवल चीन ने ही सफल प्रदर्शन किया है, जबकि अमेरिका और यूरोप जैसे महाशक्तियां अभी भी इस तकनीक को अंतरिक्ष में साबित नहीं कर पाई हैं. इसरो ने सोमवार सुबह 10 बजकर 17 मिनट पर श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से पीएसएलवी-सी62 का प्रक्षेपण करेगा.
यह पीएसएलवी की 64वीं उड़ान होगी, जिसमें मुख्य पेलोड के रूप में पृथ्वी अवलोकन उपग्रह ‘ईओएस-एन1’ शामिल है. यह उपग्रह थाईलैंड और ब्रिटेन की संयुक्त तकनीक से तैयार किया गया है. इसके अलावा न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) के जरिए 14 अन्य उपग्रह (देशी और विदेशी ग्राहकों के) भी लॉन्च किए जाएंगे. प्रक्षेपण के लगभग 17 मिनट बाद सभी उपग्रहों को सूर्य की समकालिक कक्षा में स्थापित किया जाएगा. पूरा मिशन दो घंटे से अधिक समय तक चलेगा. प्रक्षेपण यान और उपग्रहों का एकीकरण पूरा हो चुका है और प्रक्षेपण से पहले की जांच अंतिम चरण में है.
उलटी गिनती शुरू
25 घंटे की उलटी गिनती 11 जनवरी को शुरू हो चुकी है. पीएसएलवी का यह मिशन इसरो की विश्वसनीयता का एक और प्रमाण होगा, जिसने पहले ही चंद्रयान-1, मंगल ऑर्बिटर मिशन (मॉम) और आदित्य-एल1 जैसे महत्वाकांक्षी अभियानों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है. अब तक पीएसएलवी 63 उड़ानें पूरी कर चुका है. लेकिन इस मिशन की असली खासियत है बेंगलुरु की स्टार्टअप ऑर्बिटएड का 25 किलोग्राम वजनी आयुलसैट.
यह उपग्रह पीएसएलवी-सी62 के साथ ही अंतरिक्ष में जाएगा और लॉन्च के चार घंटे के अंदर ही अंतरिक्ष में पहली बार आंतरिक रिफ्यूलिंग (internal refuelling) का प्रदर्शन करेगा. आयुलसैट एक टारगेट सैटेलाइट के रूप में काम करेगा, जो माइक्रोग्रैविटी में तरल पदार्थों (फ्यूल) के व्यवहार का अध्ययन करेगा. यह पूर्ण ऑन-ऑर्बिट रिफ्यूलिंग नहीं है, लेकिन एक महत्वपूर्ण पहला कदम है, जो भविष्य में दो अलग-अलग स्पेसक्राफ्ट के बीच फ्यूल ट्रांसफर की राह खोजेगा.
चीन ने बीते साल किया था परीक्षण
चीन ने पिछले साल इस तकनीक का प्रदर्शन किया था, लेकिन उसकी जानकारी सीमित और आधिकारिक तौर पर कम ही जारी की गई. अमेरिका में एस्ट्रोस्केल जैसी कंपनियां इस दिशा में काम कर रही हैं, पर अभी तक कोई सफल अंतरिक्ष प्रदर्शन नहीं हुआ है. ऐसे में इसरो और ऑर्बिटएड का यह प्रयास भारत को अंतरिक्ष में सैटेलाइट सर्विसिंग और रिफ्यूलिंग के क्षेत्र में वैश्विक पटल पर दूसरे स्थान पर ला खड़ा करेगा.
यह उपलब्धि न सिर्फ तकनीकी रूप से क्रांतिकारी है, बल्कि भारत की निजी अंतरिक्ष कंपनियों और इसरो के सहयोग का भी शानदार उदाहरण है. जब पूरी दुनिया अभी इस जटिल तकनीक से जूझ रही है, तब भारत आज एक बार फिर साबित कर रहा है कि वह अंतरिक्ष की नई ऊंचाइयों को छूने के लिए तैयार है.
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न्यूज18 हिंदी में बतौर एसोसिएट एडिटर कार्यरत. मीडिया में करीब दो दशक का अनुभव. दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, आईएएनएस, बीबीसी, अमर उजाला, जी समूह सहित कई अन्य संस्थानों में कार्य करने का मौका मिला. माखनलाल यूनिवर्स...और पढ़ें
First Published :
January 12, 2026, 07:33 IST

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