145 किमी दूर जिस क्यूबा को ट्रंप ने धमकाया, वहां की तस्वीरों से ही तब सहम गया था अमेरिका

2 hours ago

वेनेजुएला के बाद ट्रंप जिस द्वीपीय देश क्यूबा को धमका रहे हैं, वे दोनों पिछले कई दशकों से दोस्त हैं. वजह समाजवादी विचारधारा होने के साथ-साथ तेल भी है. 1960 के दशक से ये दोनों देश एक दूसरे पर निर्भर हैं. अब डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि क्यूबा का पतन होने वाला है. क्या आप जानते हैं कि तेलंगाना राज्य के बराबर के इस देश की एक चाल से पावरफुल अमेरिका सहम गया था. इससे केवल 145 किमी पर अमेरिका की सीमा शुरू हो जाती है और तब क्यूबा के आसमान से जासूसी कर जो तस्वीरें व्हाइट हाउस पहुंचाई गईं तो राष्ट्रपति के भी कान खड़े हो गए थे. शुरू से शुरू करते हैं. 

1958-59 में वेनेजुएला और क्यूबा- दोनों देशों ने बड़ा राजनीतिक बदलाव देखा. वेनेजुएला में लोकतंत्र आया और क्यूबा में क्रांति के बाद फिदेल कास्त्रो सत्ता में आए. बाद में क्यूबा ने ही वेनेजुएला में सशस्त्र संघर्ष की जमीन तैयार की. 1998 में ह्यूगो शावेज के आने के बाद कास्त्रो से अच्छी डील हुई. क्यूबा के डॉक्टर, टीचर, टेक्नीशियन वेनेजुएला भेजे गए. अमेरिकी प्रतिबंधों से दबे क्यूबा को उबारने में वेनेजुएला ने मदद की और हजारों बैरल क्रूड ऑयल क्यूबा जाने लगा. इसके अलावा भी कई तरह की सेवाएं एक्सपोर्ट की गईं. सोवियत संघ के पतन के बाद क्यूबा की हालत काफी खराब हो गई थी, बाद में वेनेजुएला से उसे संजीवनी मिली. एक तरफ से तेल मिला तो दूसरी तरफ से सत्ता पर कंट्रोल का मॉडल.

हालांकि इस बीच, अक्टूबर 1962 में इस छोटे से देश ने अमेरिका की नाक में दम कर दिया. अमेरिका ने क्यूबा की सरकार को गिराने की कोशिशें शुरू कर दी थीं. क्रांति के लीडर के तौर पर फिदेल कास्त्रो 1959 में पीएम बन चुके थे. अमेरिका ने मान्यता दी लेकिन क्यूबा ने 1960-61 में तमाम अमेरिकी बिजनस का राष्ट्रीयकरण कर दिया. अमेरिका गुस्साया और प्रतिबंध लगा दिया. फिर कास्त्रो को सोवियत संघ के रूप में नया दोस्त मिला. 

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सीआईए के दस्तावेजों से पता चलता है कि उसने 1500 क्यूबाई लोगों को ही हमले के लिए प्रशिक्षित किया था, जो देश से बाहर रहने चले गए थे. 1961 में कास्त्रो ने क्यूबा के सोशलिस्ट देश बनने की घोषणा कर दी. यह वो दौर था जब अमेरिका और सोवियत संघ में शीत युद्ध चल रहा था. अक्तूबर 1962 में व्हाइट हाउस के बाद सीक्रेट जानकारी और तस्वीरें पहुंचती हैं. पता चलता है कि सोवियत संघ ने अपनी खतरनाक मिसाइलें क्यूबा में तैनात करनी शुरू कर दी हैं. अमेरिका पर परमाणु हमले का खतरा पैदा हो गया था. 

इसी को क्यूबा मिसाइल संकट कहा जाता है. बताते हैं कि इस समय दोनों महाशक्तियां परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ी थीं. इस तनाव की वजह दोनों पक्षों के बीच गलत अनुमान, गुप्त संचार और गलतफहमियां भी थीं. अमेरिका एक और ऑपरेशन की तैयारी में था तभी जुलाई 1962 में सोवियत के नेता ख्रुश्चेव ने क्यूबा के पीएम फिदेल कास्त्रो के साथ सीक्रेट डील की जिससे भविष्य में किसी भी हमले की कोशिश को रोकने के लिए क्यूबा में सोवियत परमाणु मिसाइलें तैनात की जा सकें. 

गर्मियों के आखिर में कई मिसाइल साइटों का निर्माण शुरू हो गया. अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को जासूसी उड़ानों के दौरान क्यूबा में सोवियत हथियारों के बड़े पैमाने पर जमावड़े दिखने लगे. इसमें सोवियत IL-28 बॉम्बर भी था. 4 सितंबर 1962 को राष्ट्रपति कैनेडी ने क्यूबा में हमलावर हथियारों की तैनाती के खिलाफ सार्वजनिक चेतावनी जारी की. फिर भी क्यूबा में मध्यम दूरी और इंटरमीडिएट-रेंज की बैलिस्टिक परमाणु मिसाइलों की साइटें बनती रहीं. तस्वीरें व्हाइट हाउस की टेंशन बढ़ा रही थीं. 

कैनेडी ने अपने सलाहकारों को बुलाया. अमेरिका को अगला कदम उठाना था जिससे इस संकट का हल निकाला जा सके. कुछ ने मिसाइलों को नष्ट करने के लिए हवाई हमले की बात कही. कुछ ने क्यूबा और सोवियत संघ को कड़ी चेतावनी देने का समर्थन किया. राष्ट्रपति ने बीच का रास्ता निकाला. 22 अक्टूबर को उन्होंने क्यूबा का नौसैनिक 'क्वारंटाइन' का आदेश दिया. यह एक तरह की नाकेबंदी ही थी. हालांकि क्वारंटाइन का इस्तेमाल युद्ध से बचने के लिए किया गया. 

उसी दिन कैनेडी ने ख्रुश्चेव को एक लेटर भेजा जिसमें घोषणा की गई कि अमेरिका क्यूबा में हमलावर हथियारों को पहुंचाने की अनुमति नहीं देगा. उन्होंने मांग की कि सोवियत संघ पहले से बन रहे या पूरे हो चुके मिसाइल अड्डों को खत्म करे और सभी हमलावर हथियारों को USSR वापस भेज दे. उस शाम राष्ट्रपति नेशनल टेलीविजन पर भी गए और क्यूबा में हो रहे घटनाक्रम के बारे में बताया. उन्होंने यह भी कहा कि अगर संकट बढ़ता है तो आगे क्या हो सकता है. 

राष्ट्रपति की बातों का लहजा सख्त था. संदेश साफ था कि क्यूबा से पश्चिमी गोलार्ध के किसी भी देश पर लॉन्च की गई किसी भी न्यूक्लियर मिसाइल को सोवियत संघ की ओर से अमेरिका पर हमला माना जाएगा, जिसके लिए सोवियत संघ पर सख्त जवाबी कार्रवाई की जाएगी. सेना ने युद्ध की तैयारी शुरू कर दी. क्यूबा पर मिलिट्री हमले की योजना बनने लगी. 

24 अक्टूबर को ख्रुश्चेव ने केनेडी के संदेश का जवाब दिया. उन्होंने कहा कि अमेरिकी नाकेबंदी एक आक्रामक कार्रवाई है. क्यूबा जाने वाले सोवियत जहाज नहीं रुकेंगे. फिर भी 24 और 25 अक्टूबर के दौरान कुछ जहाज क्वारंटाइन लाइन से वापस लौट गए. दूसरों को अमेरिकी नौसेना बलों ने रोका, लेकिन उनमें कोई हमलावर हथियार नहीं थे और इसलिए उन्हें आगे बढ़ने दिया गया.

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