झूठे मामलों में क्या होता है? कोई दोषी कैसे तय करता है? UGC के नए नियमों पर क्यों उठ रहे सवाल

2 hours ago

नई दिल्ली. शिवसेना (यूबीटी) सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026 पर कड़ी आपत्ति जताई है. उन्होंने इसके दायरे, स्पष्टता और चुनिंदा तरीके से लागू किए जाने पर सवाल उठाए हैं और चेतावनी दी है कि खराब तरीके से बनाए गए नियम यूनिवर्सिटी कैंपस में तनाव बढ़ा सकते हैं.

यूजीसी के जनवरी 2026 के नोटिफिकेशन पर प्रतिक्रिया देते हुए, सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर असमान कानूनी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई. उन्होंने लिखा, “हालांकि कैंपस में किसी भी तरह का जातिगत भेदभाव गलत है, भारत ने देखा है कि छात्रों को इसके नतीजे भुगतने पड़ते हैं. क्या कानून को सबको शामिल करने वाला और सभी को सुरक्षा की गारंटी देने वाला नहीं होना चाहिए? कानून लागू करने में यह भेदभाव क्यों?”

उन्होंने दुरुपयोग के खिलाफ सुरक्षा उपायों की कमी पर भी सवाल उठाया, और पूछा, “झूठे मामलों में क्या होता है? कोई दोषी कैसे तय करता है? भेदभाव को कैसे परिभाषित किया जाता है — शब्दों, कामों या सोच से?” उन्होंने कहा, “कानून का लागू होना सभी के लिए साफ, सटीक और समान होना चाहिए. इसलिए, कैंपस में खराब माहौल बनाने के बजाय, मैं आग्रह करूंगी कि यूजीसी नोटिफिकेशन को या तो वापस लिया जाए या उसमें सुधार किया जाए.”

यूजीसी के प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026 का मकसद उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव विरोधी तंत्र को मजबूत करना है. ये नियम कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में इक्विटी कमेटियों, समान अवसर केंद्रों, हेल्पलाइन और मॉनिटरिंग स्क्वॉड के गठन को अनिवार्य बनाते हैं.

उन्होंने कहा कि ये भेदभाव को बड़े पैमाने पर परिभाषित करते हैं, जिसमें साफ तौर पर किए गए काम के साथ-साथ अप्रत्यक्ष पूर्वाग्रह और सिस्टमैटिक बहिष्कार भी शामिल हैं.

यूजीसी के अनुसार, ये नियम 2019 और 2023 के बीच भेदभाव की शिकायतों में 118 प्रतिशत की बढ़ोतरी की रिपोर्ट के जवाब में बनाए गए थे, जिसमें खास तौर पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की सुरक्षा पर ध्यान दिया गया था.

हालांकि, इस नोटिफिकेशन पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आई हैं. सामान्य वर्ग के लोगों ने इन नियमों की आलोचना करते हुए इन्हें एकतरफा ढांचा बताया है और तर्क दिया है कि आरोपियों के लिए सुरक्षा अपर्याप्त है और ऊंची जाति के छात्रों को गलत तरीके से निशाना बनाया जा सकता है.

दूसरी ओर, इन नियमों के समर्थकों ने ऐतिहासिक हाशिए पर धकेलने की समस्या को दूर करने के लिए इन्हें ज़रूरी सुधारात्मक उपाय बताया है, और जोर देकर कहा है कि ये नियम रिवर्स भेदभाव नहीं हैं. ये नियम संस्थागत जवाबदेही लाने की भी कोशिश करते हैं, जिसमें संस्थानों के प्रमुखों पर उत्पीड़न की शिकायतों को दूर करने और नियमित निगरानी के जरिए नियमों का पालन सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी डाली गई है.

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