Last Updated:January 14, 2026, 14:53 IST
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि पति की मौत सास-ससुर के पहले या बाद में हो, विधवा बहू को ससुराल की संपत्ति से भरण-पोषण का पूरा अधिकार है. तकनीकी आधार पर अधिकार छीनना असंवैधानिक है और सभी विधवा बहुओं पर यह लागू होगा. इस फैसले से पहले आधुनिक कानून में यह स्थिति इतनी स्पष्ट नहीं थी.
Image - AIपरिवार में संपत्ति और अधिकारों की बात आते ही कई बार कानूनी पेंच फंस जाते हैं. अगर बात हो विधवा बहू की, तो केस और पेचीदा हो जाता है. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है, जो ऐसी इस स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट करता है. सुप्रीम कोर्ट ने 13 जनवरी 2026 को एक केस में साफ-साफ कहा है कि अगर कोई बहू ससुर की मौत के बाद विधवा हो जाती है, तब भी उसे ससुर की संपत्ति से ‘मेंटेनेंस’ यानी गुजारा भत्ता मिलने का पूरा हक है.
इस फैसले का मतलब ये है कि ससुर की प्रॉपर्टी से बहू को खर्चा चलाने का अधिकार है, बशर्ते वह खुद कमाकर या पति की प्रॉपर्टी से अपना गुजारा न कर पा रही हो. यह फैसला हिंदू एडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट, 1956 के सेक्शन 21 और 22 पर आधारित है.
मनुस्मृति और नैतिक कर्तव्य का जिक्र
सेक्शन 21 में ‘डिपेंडेंट’ यानी आश्रितों की लिस्ट है, जिसमें ‘पुत्र की विधवा’ शामिल है. कोर्ट ने कहा कि इसमें कोई फर्क नहीं पड़ता कि पति की मौत ससुर के जीते-जी हुई या बाद में. दोनों ही मामलों में बहू को ससुर की एस्टेट (संपत्ति) से मदद मिल सकती है. कोर्ट ने मनुस्मृति का भी जिक्र किया, जहां लिखा है कि मां, पिता, पत्नी या बेटे को कभी छोड़ा नहीं जाना चाहिए. यह एक तरह का नैतिक कर्तव्य है. जस्टिस पंकज मित्तल और एसवीएन भट्टी की बेंच ने कहा कि अगर ऐसा नहीं किया गया तो विधवा बहू बेसहारा हो सकती है, जो गलत है.
यह फैसला कई केसों को एक साथ निपटाते हुए आया, जहां अपील करने वाले कह रहे थे कि ससुर की मौत के बाद विधवा होने पर कोई हक नहीं. लेकिन कोर्ट ने इसे मनमाना और गलत ठहराया.
इससे पहले क्या होता था?
पहले की बात करें तो कानून में काफी कन्फ्यूजन था. कुछ निचली अदालतों और हाई कोर्ट्स में यह तर्क दिया जाता था कि अगर बहू ससुर के जीते-जी विधवा हो जाती है, तभी उसे ससुर की प्रॉपर्टी से मेंटेनेंस मिल सकता है. ऐसा इसलिए, क्योंकि ससुर जीवित होता तो उसका कर्तव्य होता बहू का ख्याल रखना. लेकिन अगर ससुर पहले मर जाता और उसके बाद पति की भी मौत हो जाती है तो बहू को ‘डिपेंडेंट’ नहीं माना जाता. मतलब, टाइमिंग के आधार पर अधिकार कट जाता.
यह क्लासिफिकेशन यानी विभाजन को कई बार अनुचित कहा जाता था, क्योंकि इससे विधवा महिलाएं मुश्किल में पड़ जातीं. पुराने हिंदू कानून में भी मनुस्मृति जैसे ग्रंथों में परिवार की जिम्मेदारी का जिक्र है, लेकिन आधुनिक कानून में यह पेंच फंसता रहता था. अब सुप्रीम कोर्ट ने इस कन्फ्यूजन को खत्म कर दिया और कहा कि कानून की व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जो महिलाओं को मजबूत बनाए, न कि कमजोर.
कुछ टेक्निकल जानकारियां
मेंटेनेंस क्या है?
यह गुजारा भत्ता है, जो विधवा बहू को ससुर की प्रॉपर्टी से मिल सकता है. लेकिन ध्यान दें, यह पूरी प्रॉपर्टी पर कब्जा नहीं है. केवल उतना ही, जितना खर्चे के लिए जरूरी हो. अगर बहू के पास पति की प्रॉपर्टी या अपनी कमाई है, तो शायद कम मिले या फिर न मिले.
डिपेंडेंट कौन है?
कानून में लिस्ट है- जैसे विधवा बहू, नाबालिग बच्चे वगैरह. सेक्शन 22 कहता है कि ससुर की मौत के बाद उसके वारिसों (जैसे दूसरे बेटे) को यह जिम्मेदारी निभानी होगी.
शादी दोबारा करने पर?
अगर विधवा बहू दोबारा शादी कर लेती है, तो यह अधिकार खत्म हो जाता है.
क्या पूरी प्रॉपर्टी मिलती है?
नहीं, यह हिंदू सक्सेशन एक्ट से अलग है. वहां बेटियों को बराबर हिस्सा मिलता है, लेकिन बहू को सीधा हिस्सा नहीं, सिर्फ मेंटेनेंस की बात कही गई है. अगर ससुर की प्रॉपर्टी एंसेस्ट्रल (पूर्वजों की) है और पति को-पार्सनर था, तो अलग नियम लागू हो सकते हैं.
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मलखान सिंह पिछले 17 वर्षों से ख़बरों और कॉन्टेंट की दुनिया में हैं. प्रिंट मीडिया से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई नामी संस्थानों का नाम प्रोफाइल में जुड़ा है. लगभग 4 साल से News18Hindi के साथ काम कर रहे ...और पढ़ें
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First Published :
January 14, 2026, 12:00 IST

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