Last Updated:January 05, 2026, 12:07 IST
भारतीय रेलवे आज विश्व स्तर पर अलग पहचान बना रहा है.चाहे वंदे भारत ट्रेन की बात हो, चिनाब ब्रिज की या रेलवे लाइन की. आज आधुनिक मशीनों से रेलवे लाइन का निर्माण किया जा रहा है, लेकिन कभी यही काम आम लोगों की मदद से होता था और जरूरत पड़ने पर हाथियों का भी उपयोग ट्रैक निर्माण में किया जाता है.अगर आपको विश्वास नहीं हो रहा है तो यहां पर ब्लैक एंड फोटो में स्वयं ही देख लें.

पहले जब पटरियों के उठाने के लिए क्रेन या बढ़ी बढ़ी मशीनें नहीं थीं, तो इस तरह हाथियों के सहारे पटरियों हटाया जाता था.पहले केरल, असम में हाथियों द्वारा लकड़ी खींचने की पारंपरिक प्रथा बहुत आम थी. इसी तरह हाथियों की मदद लेकर पटरियों को बिछाने का काम किया जाता था.

देश में रेलवे पटरियां बिछाने में हाथियों के साथ साथ लोगों की भी मदद की जाती थी.पटरी को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए काफी संख्या में लोग लगते थे.इसमें काफी समय लगता था.इसी वजह से पहले ट्रैक का काम बहुत ही धीमे धीमे होता था.

इस तरह ट्रैक के निर्माण में कई बार मजदूरों को चोट तक लग जाती थी. उन्हें अस्पताल पहुंचाया जाता था.आज तमाम आधुनिक मशीनें आ गयी हैं, जिससे स्पीड से ट्रैक का निर्माण किया जाता है.
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इन फोटो में कोई मशीनरी नहीं दिख रही, जो उस समय की सामान्य स्थिति थी,खासकर ग्रामीण या छोटी लाइनों के निर्माण में इसी तरह इस तरह निर्माण किया जाता था.यहां पर मजदूर आसानी से मिल जाते थे.

बाद में क्रेन आयी लेकिन उसका इस्तेमाल ट्रेनों में लदे भारी भारी कंटेनर को उतारने में होता था.इस तस्वीर में क्रेन से कंट्रेनर को उतारा जा रहा है. इनका इस्तेमल वहीं किया जाता था,रेलवे के कंटेनर आते थे.

पटरियां बिछाने के लिए हाथियों का अधिक इस्तेमाल होता था. इसलिए जहां पर जरूरत होती थी,वहां पर हाथियों को ट्रेन द्वारा ले जाया जाता था. काम खत्म होने पर दूसरे स्थान पर भेजा जाता था.इस तरह खूब इस्तेमाल होता था.

पहले इस तरह के रेलवे सिग्लन होते थे.इनका निर्माण भी मैन्युअल ही किया जाता था. इस वजह से पटरियों और सिग्लनों के बनने में काफी समय लगता था. आज भारतीय ट्रेनों में कचव तकनीक का इस्तेमाल शुरू हो चुका है,जो पहले से अधिक सुरक्षित है.

इस तरह के ब्रिज का निर्माण लोगों और हाथियों की मदद से किया गया है.पहली बात तो पहले ऐसी आधुनिक मशीनें नहीं थी और जो मशीनें थी,उन्हें दुर्गम इलाकों में ले जाना आसान नहीं था.
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