Last Updated:February 20, 2026, 07:36 IST
Karnataka Congress Politics: कांग्रेस के भीत बैलट पेपर से चुनाव कराने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. कर्नाटक में स्थानीय निकाय चुनाव बैलट पेपर से कराने के फैसले ने कांग्रेस के भीतर ही मदभेद पैदा कर दिया है. एत तरफ सिद्धारमैया सरकार ट्रांसपेरेंसी का दावा कर रही है. वहीं दूसरी तरफ पार्टी के कई नेता इसे वोटिंग सिस्टम को पीछे ले जाने वाला कदम बता रहे हैं. ईवीएम बनाम बैलट पेपर की बहस अब कांग्रेस के अंदरूनी टकराव में बदल गई है.

नई दिल्ली: देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस इन दिनों चुनाव प्रकिया पर लगातार सवाल उठा रही है. कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी लगातार चुनाव आयोग (EC) पर सवाल उठा रहे हैं. उन्होंने तो ‘वोट चोरी’ का कैंपेन ही अलग से चला रखा है. कांग्रेस के कई नेता फिर से बैलट पेपर से चुनाव कराने की मांग रखते रहे हैं. हालांकि टेकनोलॉजी की इस नई दौड़ में बैलट पेपर से चुनाव कराने को लेकर कई राजनेताओं ने कांग्रेस की आलोचना भी की है. इस बीच अब कांग्रेस के भीतर ही बैलट पेपर से चुनाव कराने को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं. देशभर में ईवीएम को लेकर सवाल उठाने वाली कांग्रेस अब अपने ही फैसले से घिरती नजर आ रही है. कर्नाटक में स्थानीय निकाय चुनाव बैलट पेपर से कराने के फैसले ने पार्टी के अंदर नई दरार पैदा कर दी है.
एक तरफ पार्टी नेतृत्व वोटिंग सिस्टम की विश्वसनीयता बढ़ाने का दावा कर रहा है, तो दूसरी ओर पार्टी के ही नेता इसे पीछे की ओर बढ़ने वाला कदम बता रहे हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार सिद्धारमैया सरकार के फैसले से कांग्रेस दो खेमों में बंटती दिख रही है. इससे विपक्ष को भी हमला करने का मौका मिल गया है और चुनावी राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है.
बैलट पेपर पर कांग्रेस में बढ़ी अंदरूनी खींचतान
कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार जिला और तालुक पंचायत चुनाव बैलट पेपर से कराने की तैयारी कर रही है. ग्रामीण विकास एवं पंचायत राज मंत्री प्रियांक खड़गे ने बताया कि इसके लिए कर्नाटक ग्राम स्वराज (संशोधन) विधेयक 2026 तैयार है और इसे 6 मार्च से शुरू होने वाले बजट सत्र में पेश किया जाएगा. सरकार का तर्क है कि बैलट पेपर से वोटिंग और काउंटिंग प्रक्रिया में ट्रांसपेरेंसी बढ़ेगी. उनका कहना है कि केंद्र सरकार ने ईवीएम को लेकर उठाए गए सवालों का समाधान नहीं किया, इसलिए राज्य को वैकल्पिक व्यवस्था अपनानी पड़ी. राज्य सरकार पहले ही ग्रेटर बेंगलुरु गवर्नेंस एक्ट में संशोधन कर स्थानीय चुनावों में बैलट पेपर की अनुमति दे चुकी है. हालांकि कांग्रेस के भीतर ही इस फैसले को लेकर असहजता है. डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के भाई और पूर्व सांसद डीके सुरेश ने खुलकर कहा कि बैलट पेपर सिस्टम अपनाना चुनावी प्रक्रिया को पीछे ले जाने जैसा होगा. कुछ विधायकों का मानना है कि इससे चुनावी हेरफेर की पुरानी बहस फिर शुरू हो सकती है.कर्नाटक सरकार बैलट पेपर क्यों लाना चाहती है?
सरकार का कहना है कि इससे चुनाव प्रक्रिया में भरोसा बढ़ेगा और मतगणना अधिक ट्रांसपेरेंसी होगी. कांग्रेस लंबे समय से ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती रही है. राज्य सरकार का दावा है कि जनता के बीच भरोसा मजबूत करने के लिए यह कदम जरूरी है. साथ ही राज्य चुनाव आयोग को विकल्प देने की नीति अपनाई जा रही है.
कांग्रेस के अंदर विरोध क्यों हो रहा है?
पार्टी के कुछ नेता मानते हैं कि तकनीकी दौर में बैलट पेपर पर लौटना गलत संदेश देगा. उनका तर्क है कि ईवीएम ने तेज और सटीक चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित की है. वे यह भी कह रहे हैं कि इससे चुनावी धांधली के पुराने आरोप फिर से चर्चा में आ सकते हैं.
क्या इससे राष्ट्रीय राजनीति पर असर पड़ेगा?
यह विवाद कांग्रेस की राष्ट्रीय रणनीति को प्रभावित कर सकता है. अगर पार्टी के भीतर ही मतभेद बढ़ते हैं तो विपक्षी दल इसे राजनीतिक मुद्दा बना सकते हैं. आने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में यह बहस बड़ा चुनावी नैरेटिव बन सकती है.
पुरानी मशीनें भी बनीं बहस की वजह
राज्य चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि मौजूदा ईवीएम मशीनें करीब 15 साल पुरानी हो चुकी हैं और उन्हें चरणबद्ध तरीके से हटाया जाना है. इसी वजह से बैलट पेपर विकल्प पर विचार किया जा रहा है. वहीं कांग्रेस के कुछ नेता मालूर विधानसभा सीट के मामले का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा मतगणना प्रक्रिया को सही ठहराया जाना ईवीएम की विश्वसनीयता साबित करता है.
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सुमित कुमार News18 हिंदी में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं. वे पिछले 3 साल से यहां सेंट्रल डेस्क टीम से जुड़े हुए हैं. उनके पास जर्नलिज्म में मास्टर डिग्री है. News18 हिंदी में काम करने से पहले, उन्ह...और पढ़ें
First Published :
February 20, 2026, 07:36 IST

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