Afghanistan Rules For Women: पाकिस्तान में मरियम सुपर लग्जरी जेट की सवारी कर रही हैं तो अफगानिस्तान में मरियम पति के हाथों मार खा रही हैं. अत्याचार झेल रही हैं और सबसे ज्यादा दुख की बात ये है कि इनपर जुल्म भी होगा और ये आवाज भी नहीं उठा सकतीं. जानते हैं, ऐसा क्यों? क्योंकि तालिबान ने अफगानिस्तान में महिलाओं को पीटना लीगल कर दिया है. स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि 'जिस तरह एक पक्षी एक पंख के सहारे नहीं उड़ सकता, उसी तरह दुनिया का कल्याण महिलाओं की स्थिति सुधारे बिना संभव नहीं है.' यही कारण है कि तमाम विकसित और विकासशील देशों में महिलाओं की भागीदारी हर क्षेत्र में बढ़ रही है, लेकिन अफगानिस्तान जैसा देश महिलाओं को अस्तित्व विहीन बनाने में जुटा है. वहां महिलाओं के खिलाफ ऐसे-ऐसे कायदे-कानून बनाए जा रहे हैं जो शर्मनाक भी है और दर्दनाक भी. तालिबान सरकार ने एक नया कानून बनाया है जिसके बाद वहां कोई भी पुरुष अपनी पत्नी या बेटी को जितना चाहे पीट सकता है. बशर्ते उस महिला की हड्डी नहीं टूटनी चाहिए और शरीर पर गहरा घाव नहीं होना चाहिए. नए कानून के मुताबिक अगर कोई महिला बिना पति से पूछे मायके चली जाएगी तो उसे जेल की सजा हो सकती है. तालिबान सरकार के नए कानून में ऐसे-ऐसे प्रावधान हैं जिसके बारे में आप कल्पना भी नहीं सकते हैं.
पीटने के नियम
नए कानून ना सिर्फ अफगानी महिलाओं के आत्मसम्मान पर चोट है बल्कि वैश्विक मानवाधिकार के लिए भी चुनौती है। इसलिए आज हम महिलाओं पर जुल्म को लीगल करने वाले तालिबान के क्रूर कानून का विश्लेषण करेंगे. तालिबान सरकार ने जो दंड संहिता बनाई है, उसमें 90 पन्नों का क्रिमिनल कोड है. तालिबान सरकार के नीति नियंताओं ने शरिया की व्याख्या अपने हिसाब से करके ये क्रिमिनल कोड तैयार किया है. इस दंड संहिता कानून के हर एक पैराग्राफ को कट्टरता की स्याही से लिखा गया है. इस नए कानून में कोई भी पुरुष अपनी पत्नी या बेटी को शारीरिक सजा दे सकता है. उसे महिलाओं को तब तक पीटने का अधिकार है, जब तक वो उसे पीटना चाहे. घरेलू हिंसा को सरकारी मान्यता देने वाले इस नए कानून में कहा गया है कि उस पिटाई से महिला की कोई हड्डी नहीं टूटनी चाहिए और जख्म इतना गहरा नहीं होना चाहिए जो खुले में दिखे. तालिबानी नीति नियंताओं ने महिलाओं के लिए एक और दरियादिली दिखाई है वो ये कि अगर किसी महिला की हड्डी टूट गई या फिर शरीर पर कोई बड़ा सा घाव हो गया तो इसके लिए पीटने वाले परुष को कानूनन सजा देने का प्रावधान है, लेकिन उस सजा के लिए भी कुछ शर्ते हैं. शर्त ये है कि पहले महिला को अदालत में ये साबित करना होगा कि घर में उसके साथ पिटाई हुई है. अपने साथ हिंसा को साबित करने के लिए उस महिलाओं को दो काम करने होंगे. पहला ये कि अदालत भी वो अपने पति या किसी पुरुष अभिभावक के साथ जाएगी. दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण ये कि महिला को पूरी तरह ढका हुआ रहकर जज को अपनी चोटें दिखानी होंगी और जब इतना कुछ करने के बाद महिला अपने साथ हुई क्रूरता का साबित कर पाएगी तो अदालत उसे पीटने वाले पुरूष को सजा देगी और वो सजा होगी 15 दिनों की जेल. ये बिल्कुल भी मजाक नहीं है. ये तालिबान के उस नये कानून का प्रावधान है, जो तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा के हस्ताक्षर से लागू हो चुका है.
महिलाओं पर पाबंदी
इसी कानून में ये भी प्रावधान है कि अगर कोई महिला बिना पति के इजाजत से मायके चली जाती है या किसी रिश्तेदार से मिलती है तो उस महिला को तीन महीने जेल की सजा होगी. अगर किसी महिला का किसी गैर मर्द से स्पर्श भी हो जाए तो एक साल तक की सजा होगी. लेकिन एक पुरुष अगर उसी महिला को हड्डी तोड़कर पीटता है तो भी उसे सिर्फ 15 दिनों की सजा मिलेगी. बिना पूछे मायके चली गई तो 90 दिनों की सजा होगी, लेकिन उसी अफगानिस्तान में किसी जानवर को लड़वाने या मारने पर 150 दिनों की सजा है. सोचिए ये 21वीं सदी के अफगानिस्तान का स्याह सच है. जहां जानवरों को नुकसान पहुंचाने की सजा भी एक महिला को पीटने की सजा से ज्यादा है. मतलब एक महिला को किसी जानवर से भी कम दर्जा दिया गया है. ये उस देश की कड़वी सच्चाई है जहां आज से 60 साल पहले महिलाएं स्कर्ट, दुपट्टा या पश्चिमी कपड़े पहनती थीं. बेफिक्र-बेपरवाह और मॉडर्न अंदाज में रहती थीं, लेकिन कट्टपरंथियों की आंखों में महिलाओं की आजादी चुभती है. तालिबान को बर्दाश्त नहीं है कि कोई महिला पुरुष के बराबर में बैठे. काम-काज या फिर बोल-चाल में उसकी बराबरी करे. इसी आत्मकुंठा ने महिलाओं को सामाजिक कैदी बना दिया है. नेल्सन मंडेला ने कहा था कि 'जब तक महिलाओं को हर तरह के भेदभाव से मुक्त नहीं किया जाता, तब तक सच्ची स्वतंत्रता की बात करना बेमानी है.' तालिबान सार्वजनिक तौर पर ये बेइमानी तब कर रहा है, जब उसने लंबे समय तक अमेरिका से अफगानिस्तान को आजाद कराने की लड़ाई लड़ी है. अब जब लगभग पांच सालों से अफगानिस्तान पर तालिबान का पूर्ण नियंत्रण है और अफगानिस्तान आजाद है तो तालिबान ने महिलाओं की आजादी छीनने के लिए पूरी शक्ति लगा दी है.
गुलामी का पर्याय बनीं महिलाएं
पिछले 5 सालों में अफगानी स्त्रियों को तालिबान ने कैसे गुलामी का पर्याय बना दिया है. नए कानून का अनुच्छेद 9 अफगान समाज को चार हिस्सों में बांटता है. मौलवी-मौलाना और उलेमा जैसे धार्मिक विद्वान शीर्ष श्रेणी पर है. दूसरा है उच्च वर्ग यानी अशरफ. इसके अलावा कुछ लोगों को मध्यम वर्ग में रखा गया है और बाकी को निम्न वर्ग में. इस व्यवस्था में अब किसी अपराध की सजा उसके अपराध की गंभीरता से नहीं, बल्कि आरोपी की सामाजिक हैसियत से तय होती है. तालिबानी नीति नियंताओं के बनाए नए कानून के अनुसार इस्लामी धार्मिक विद्वान अपराध करता है तो उसे सिर्फ नसीहत दी जाएगी. अफगानिस्तान में मौलवी-मौलाना-उलेमा को अपराध करने की छूट होगी. अगर अपराधी उच्च वर्ग से है तो उसे अदालत बुलाया जाएगा और उसे अदालत बुलाकर नसीहत दी जाएगी. मध्यम वर्ग के व्यक्ति को उसी अपराध के लिए जेल होगी, लेकिन निचले वर्ग के व्यक्ति को जेल के साथ-साथ शारीरिक सजा भी दी जाएगी. जेल की सजा तो अदालत देगी लेकिन शारीरिक सजा देने का अधिकार उसी मौलवी-मौलाना-उलेमा के पास होगा जो खुद किसी अपराध के लिए सजामुक्त है. ये है तालिबान का कानून और इस कानून पर अफगानिस्तान में किसी तरह चर्चा ना हो इसके लिए भी वहां की अखुंजादा सरकार ने फरमान जारी कर दिया है. अगर किसी ने इस कानून पर चर्चा की तो वो अपराधी माना जाएगा. जो मध्यकाल में होता था..वो आज अफगानिस्तान में हो रहा है, जिसके बारे में सोचने भर से आत्मा कांप जाती है उस स्याह सच का सामना हर पल अफगानी महिलाएं कर रही हैं.
मजहबी वायरस से संक्रमित अफ्गानिस्तान
अफगानिस्तान की महिलाएं गाना नहीं गा सकतीं. दूसरी महिलाओं के सामने कुरान की आयातें भी नहीं पढ़ सकती हैं. प्राइमरी स्कूल के बाद पढ़ाई पर पूर्ण प्रतिबंध है. यहां तक कि मेडिकल स्कूलों से बेटियों को निकाल दिया गया. नर्स और मेडिकल की पढ़ाई भी अफगानी महिला नहीं कर सकती हैं. महिलाएं डॉक्टर बन नहीं सकतीं और वहां के परुष गैर महिला को छू नहीं सकते इलाज नहीं हो सकता है. तालिबान ने अफगानिस्तान में गर्भनिरोधक दवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है. इस प्रतिबंध के कारण 80% महिलाएं कुपोषण, एनीमिया और रक्तचाप जैसी समस्याओं से जूझ रही हैं. त्रासदी ये है कि ऐसे खौफनाक नियम कायदे बनाते हुए तालिबान धर्म का सहारा लेता है. तालिबान कहता है कि यही शरीयत है, लेकिन इस्लाम के जानकार और तमाम मुस्लिम संगठन कहते हैं कि जिस तरह का प्रतिबंध तालिबान महिलाओं पर लगा रहा है. उसका मजहब से कोई संबंध नहीं है. इस्लाम के पवित्र ग्रंथ कुरान के सूरह अल-अहजाब में कहा गया है कि अल्लाह की नजर में स्त्री और पुरुष दोनों समान हैं. यही कारण है कि जितने भी मुस्लिम देश हैं. वहां पर धीरे-धीरे महिलाओं की स्वतंत्रता बढ़ रही है. जिस सऊदी अरब को इस्लाम का केंद्र कहा जाता है वहां पर महिलाओं को पूर्ण शिक्षा का अधिकार है. महिलाएं खुद यात्रा कर सकती है. हिजाब पहनने पर भी ढील है. अफगानिस्तान का पड़ोसी पाकिस्तान, जिसकी नींव कट्टरता और मजहब के नाम पर पड़ी. वहां महिलाओं को शिक्षा का पूर्ण अधिकार है. हिजाब वैकल्पिक है और वहां तो प्रधानमंत्री भी महिला बन चुकी हैं, लेकिन अफगानिस्तान में जो कट्टर सोच के संवाहक हैं, वो मजहबी वायरस से इतना ज्यादा संक्रमित हो चुके हैं. उन्हें आस-पड़ोस कुछ नहीं दिखता. वो अपनी कबायली संस्कृति की परिधि से बाहर निकल ही नहीं पा रहे हैं. पुरुषवादी सोच उनपर इतना अधिक हावी है कि उनकी नजर में एक महिला का अधिकार उसका अत्मसम्मान दो कौड़ी का भी नहीं है. यही कारण है कि वहां पर अत्याचार को भी कानूनी कवच पहना दिया गया है. संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ भी इसे अंतरराष्ट्रीय कानून में अपराध घोषित करने की मांग कर चुके हैं, लेकिन इससे तालिबान को रत्तीभर भी फर्क नहीं पड़ता. सोचिए, जिस आदमी को अपनी पत्नी और बेटी से संवेदना ना हो उसे दुनिया से क्या ही फर्क पड़ेगा.यही अफगानिस्तान में हो रहा है.

1 hour ago
