Last Updated:February 09, 2026, 09:14 IST
Chandrayaan-4: इसरो (ISRO) के वैज्ञानिकों ने चांद पर ऐसा समतल इलाका खोज लिया है, जहां भारत पहली बार चंद्रमा से नमूने लाकर धरती पर लौटाने की प्लानिंग कर रहा है. यह संभावित लैंडिंग साइट मॉन्स माउटन (Mons Mouton) पर्वत के पास स्थित है, जिसे अब तक का सबसे सुरक्षित विकल्प माना जा रहा है.

भारत के महत्वाकांक्षी चंद्रयान-4 मिशन को लेकर बड़ी खबर सामने आई है. इसरो (ISRO) के वैज्ञानिकों ने चांद के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में एक ऐसा सुरक्षित और समतल इलाका खोज लिया है, जहां भारत पहली बार चंद्रमा से नमूने लाकर धरती पर लौटाने की प्लानिंग कर रहा है. यह संभावित लैंडिंग साइट मॉन्स माउटन (Mons Mouton) पर्वत के पास स्थित है, जिसे अब तक का सबसे सुरक्षित विकल्प माना जा रहा है.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इस अहम अध्ययन को इसरो के स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर (SAC) के वैज्ञानिकों ने अंजाम दिया है. चंद्रयान-2 ऑर्बिटर पर लगे हाई रेजोल्यूशन कैमरा (OHRC) से ली गई बेहद साफ और बारीक तस्वीरों के आधार पर यह विश्लेषण किया गया. वैज्ञानिकों ने करीब एक वर्ग किलोमीटर के इलाके को लैंडिंग के लिए सबसे उपयुक्त पाया है.
क्यों खास है यह जगह?
चंद्रयान-4 इसरो का अब तक का सबसे जटिल चंद्र मिशन माना जा रहा है. इस मिशन में प्रोपल्शन मॉड्यूल, डिसेंडर, असेंडर, ट्रांसफर मॉड्यूल और री-एंट्री मॉड्यूल शामिल होंगे. पहले विक्रम लैंडर को चांद की सतह पर सुरक्षित उतरना होगा, फिर प्रज्ञान जैसे रोबोटिक सिस्टम की मदद से सैंपल जुटाए जाएंगे. इसके बाद असेंडर मॉड्यूल उन नमूनों को चांद की कक्षा तक ले जाएगा, जहां से उन्हें पृथ्वी पर वापस भेजा जाएगा.
ऐसे में लैंडिंग साइट का चयन सबसे अहम चुनौती होती है. इसरो के इंजीनियरों के मुताबिक, लैंडिंग के लिए जमीन का ढलान 10 डिग्री से कम, बड़े पत्थरों की संख्या बेहद सीमित और लगातार 11–12 दिनों तक सूर्य की रोशनी मिलना जरूरी है. इसके अलावा पृथ्वी से सीधा रेडियो संपर्क और कम से कम गड्ढे भी अनिवार्य शर्तों में शामिल हैं.
मॉन्स माउटन के पास क्यों बनी बात?
पहले के अध्ययनों में साउथ पोल पर कई संभावित इलाके चिन्हित किए गए थे, लेकिन नए अध्ययन में मॉन्स माउटन के आसपास पांच क्षेत्रों का गहराई से विश्लेषण किया गया. इनमें से एक क्षेत्र हमेशा अंधेरे में रहने की वजह से खारिज कर दिया गया.
इसके बाद बचे चार इलाकों MM-1, MM-3, MM-4 और MM-5 की तुलना की गई. वैज्ञानिकों ने 32 सेंटीमीटर के बेहद बारीक रिजोल्यूशन पर डिजिटल एलिवेशन मॉडल तैयार किए और जमीन की ऊंचाई, ढलान, रोशनी और खतरों का आकलन किया.
MM-4 बना सबसे मजबूत दावेदार
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया में MM-4 क्षेत्र सबसे सुरक्षित और संतुलित पाया गया. यह इलाका 84.289° दक्षिण अक्षांश और 32.808° पूर्व देशांतर पर स्थित है. यहां औसत ढलान करीब 5 डिग्री है, जो लैंडिंग के लिए आदर्श माना जाता है. सबसे अहम बात यह रही कि इस क्षेत्र में खतरे का स्तर सिर्फ 9.89% पाया गया और यहां 568 सुरक्षित लैंडिंग ग्रिड उपलब्ध हैं. आसपास की पहाड़ियों से पड़ने वाली परछाइयां भी सीमित हैं, जिससे सोलर पैनलों को पर्याप्त रोशनी मिल सकेगी.
अन्य क्षेत्रों में जोखिम ज्यादा पाया गया. MM-1 और MM-3 में खतरे का स्तर 12% से ऊपर रहा, जबकि MM-5 में सुरक्षित ग्रिड की संख्या बेहद कम थी.
चंद्रयान-4 से क्या बदलेगा?
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अध्ययन दिखाता है कि हाई-रेजोल्यूशन इमेजिंग किस तरह बेहद सटीक लैंडिंग फैसलों में मदद कर सकती है. अगर लैंडिंग साइट चयन समिति से मंजूरी मिल जाती है, तो यही इलाका भारत के पहले लूनर सैंपल रिटर्न मिशन की गवाह बनेगा.
चंद्रयान-4 की सफलता भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा कर देगी, जिन्होंने चांद या किसी अन्य खगोलीय पिंड से नमूने लाकर पृथ्वी पर लौटाए हैं. यह न सिर्फ भारत की अंतरिक्ष क्षमता को नई ऊंचाई देगा, बल्कि चांद के दक्षिणी ध्रुव में मौजूद पानी और खनिज संसाधनों की समझ को भी और गहरा करेगा.
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An accomplished digital Journalist with more than 13 years of experience in Journalism. Done Post Graduate in Journalism from Indian Institute of Mass Comunication, Delhi. After Working with PTI, NDTV and Aaj T...और पढ़ें
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New Delhi,Delhi
First Published :
February 09, 2026, 07:39 IST

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