Last Updated:January 13, 2026, 13:46 IST
Upendra Dwivedi on Shaksgam Valley: शक्सगाम घाटी पर चीन के दावे को भारत ने खारिज किया है. शक्सगाम वैली पर भाररतीय सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि 1963 का चीन-पाकिस्तान का समझौता गैरकानूनी है. यहां भारत को कोई गतिविधि मंजूर नहीं है.
'1963 का पाकिस्तान-चीन समझौता गैर-कानूनी': भारत ने शक्सगाम घाटी पर बीजिंग के दावे को खारिज कियाUpendra Dwivedi on Shaksgam Valley: भारत ने मंगलवार को शक्सगाम घाटी पर चीन के नए दावों को खारिज कर दिया. शक्सगाम वैली पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने पाकिस्तान और चीन के बीच 1963 के सीमा समझौते को अवैध बताया और दोहराया कि नई दिल्ली इस क्षेत्र में की गई किसी भी गतिविधि को मान्यता नहीं देती है. इस मुद्दे पर बोलते हुए, जनरल द्विवेदी ने कहा कि भारत 1963 के समझौते को अमान्य मानता है, जिसके तहत पाकिस्तान ने शक्सगाम घाटी में कुछ इलाका चीन को सौंप दिया था. विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को दोहराया था कि वह इस इलाके में अपने हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने का अधिकार रखता है.
सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि शक्सगाम वैली को लेकर कहा कि भारत पाकिस्तान और चीन के बीच 1963 के समझौते को गैरकानूनी मानता है. आर्मी चीफ ने कहा, ‘हम वहां किसी भी गतिविधि को स्वीकार नहीं करते हैं. जहां तक चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर की बात है, हम इसे स्वीकार नहीं करते हैं और इसे दोनों देशों द्वारा किया जा रहा एक गैर-कानूनी काम मानते हैं.’
आर्मी चीफ की यह टिप्पणी सोमवार को चीन की ओर से जम्मू और कश्मीर की शक्सगाम घाटी पर अपने क्षेत्रीय दावों की पुष्टि करने और उस क्षेत्र में अपने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का बचाव करने के बाद आई है. भारत की आपत्तियों पर जवाब देते हुए चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा था कि यह क्षेत्र चीन का है और बीजिंग को वहां विकास गतिविधियां करने का अधिकार है.
विदेश मंत्रालय ने क्या कहा था?
इससे पहले भारत के विदेश मंत्रालय (एमईए) ने साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में स्पष्ट किया कि भारत 1963 के तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को स्वीकार नहीं करता है, जिसके जरिए पाकिस्तान ने अवैध तरीके से ये क्षेत्र चीन को सौंपने की कोशिश की है. जायसवाल ने कहा, ;हमने 1963 के तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी है. हमने लगातार कहा है कि यह समझौता गैर-कानूनी और अमान्य है. हम तथाकथित चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) को भी मान्यता नहीं देते हैं, जो भारतीय इलाके से होकर गुजरता है, जिस पर पाकिस्तान ने जबरदस्ती और गैर-कानूनी तरीके से कब्जा कर रखा है.’
उन्होंने आगे कहा, ‘जम्मू और कश्मीर और लद्दाख के पूरे केंद्र शासित प्रदेश भारत का एक अभिन्न और अटूट हिस्सा हैं. यह बात पाकिस्तानी और चीनी अधिकारियों को कई बार साफ तौर पर बता दी गई है. हमने शक्सगाम घाटी में जमीनी हकीकत को बदलने की कोशिशों के खिलाफ चीनी पक्ष के सामने लगातार विरोध दर्ज किया है. हम अपने हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने का अधिकार भी रखते हैं.’
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जुलाई 2025 में संसद में विपक्ष की आलोचनाओं के जवाब में कहा था कि छह दशकों से इस्लामाबाद और बीजिंग के बीच सैन्य, आर्थिक और रणनीतिक तालमेल का पैटर्न भारत के लिए “दो-मोर्चे पर खतरे” का सबब रहा है. ये वर्तमान तनाव का नतीजा नहीं है और इसे भारतीय डिप्लोमेसी और डिफेंस को अब पूरी तरह से समझना होगा. मंत्री की बातों का मकसद न केवल संसद में विपक्ष की आलोचना का जवाब देना था, बल्कि भारत के मुख्य दुश्मनों के बीच भू-राजनीतिक गठजोड़ की एक क्रोनोलॉजी समझाना भी था. उन्होंने तर्क दिया कि यह मौजूदा सरकार से बहुत पहले का है और इस पर पार्टी लाइन से परे गंभीरता से सोचने की जरूरत है.
जयशंकर ने 1963 में पाकिस्तान के शक्सगाम घाटी को चीन को सौंपने से लेकर 1976 में भुट्टो के न्यूक्लियर सहयोग की शुरुआत और 2013 में ग्वादर के ट्रांसफर और उसके बाद चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) के औपचारिक लॉन्च जैसे अहम घटनाक्रमों का जिक्र किया था. विदेश मंत्रालय ने नियमित रूप से चीन से विरोध दर्ज कराया है. शक्सगाम घाटी रणनीतिक महत्व की है और चीन की गतिविधियां भारत की सीमा को पार कर सकती हैं. भारत ने कहा कि वह स्थिति पर नजर रखेगा और जरूरी कार्रवाई करेगा.
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First Published :
January 13, 2026, 13:46 IST

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