Last Updated:January 28, 2026, 23:07 IST
सीपीआईएम नेता मोहम्मद सलीम के साथ बैठक और ओवैसी से संपर्क का दावा यह बताता है कि हुमायूं कबीर आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं. अगर यह गठबंधन धरातल पर उतरता है, तो 2026 के चुनाव में ममता बनर्जी के लिए सत्ता की राह बेहद पथरीली हो सकती है.
हुमायूं कबीर अब वामदलों से हाथ मिलाने जा रहे. (File Photo)कोमोलिका सेनगुप्ता
कोलकाता. पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज एक बड़ी हलचल देखने को मिली, जिसने सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी होंगी. टीएमसी के बागी विधायक और मुर्शिदाबाद के कद्दावर नेता हुमायूं कबीर ने वामपंथी दलों के साथ एक सीक्रेट मीटिंग की है. इस बैठक ने नए सियासी समीकरणों को हवा दे दी है. क्या हुमायूं कबीर वामदलों के साथ हाथ मिलाने जा रहे हैं? ममता को मात देने के लिए आखिर ये कौन सा चक्रव्यूह रचा जा रहा?
कोलकाता में हुमायूं कबीर ने सीपीआई(एम) के राज्य सचिव और दिग्गज नेता मोहम्मद सलीम के साथ लंबी बैठक की. बैठक के तुरंत बाद कबीर ने जो बयान दिया, उसने साफ कर दिया कि वे ममता बनर्जी के खिलाफ एक बड़ा ‘चक्रव्यूह’ रच रहे हैं. उन्होंने ऐलान किया कि वे टीएमसी और बीजेपी को हराने के लिए सभी विपक्षी दलों को एक मंच पर लाएंगे. इतना ही नहीं, कबीर ने यह भी दावा किया कि उनकी बात असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM से भी चल रही है.
अगर दोनों ने हाथ मिला लिया तो बंगाल में क्या बदल जाएगा?
अल्पसंख्यक वोट बैंक में बड़ी सेंधमारी: ममता बनर्जी की जीत का सबसे बड़ा आधार राज्य का 30% अल्पसंख्यक वोट बैंक रहा है. हुमायूं कबीर की मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों में मुसलमानों के बीच अच्छी पकड़ है. अगर वे वामदलों और ओवैसी के साथ आते हैं, तो टीएमसी के इस ‘कोर वोट बैंक’ में बड़ा बिखराव होगा. यह सीधा नुकसान ममता को और फायदा बीजेपी को पहुंचा सकता है. मुर्शिदाबाद का किला ढहेगा : मुर्शिदाबाद जिले में सबसे ज्यादा विधानसभा सीटें हैं और यह टीएमसी का गढ़ माना जाता है. हुमायूं कबीर इसी इलाके से आते हैं. अगर वे लेफ्ट के कैडर और अपनी लोकप्रियता को मिला देते हैं, तो इस जिले में टीएमसी का सफाया हो सकता है. तीसरे मोर्चे का उदय: अब तक बंगाल में लड़ाई टीएमसी बनाम बीजेपी की दिख रही थी. लेकिन इस गठबंधन से एक मजबूत ‘तीसरा मोर्चा’ खड़ा हो सकता है, जो उन वोटरों को अपनी ओर खींच सकता है जो ममता और मोदी, दोनों से नाराज हैं.क्या हुमायूं कबीर के सहारे वामपंथी दल फिर खड़े हो पाएंगे?
बंगाल में शून्य पर सिमट चुकी सीपीआई(एम) और वामदलों के लिए हुमायूं कबीर एक ‘संजीवनी’ साबित हो सकते हैं. क्योंकि वामदलों के पास संगठन तो है, लेकिन जमीनी स्तर पर भीड़ जुटाने वाला कोई ‘मास लीडर’ नहीं बचा है. हुमायूं कबीर एक आक्रामक नेता हैं और भीड़ खींचना जानते हैं. लेफ्ट को जिस ‘फायरब्रांड’ चेहरे की जरूरत है, कबीर उसकी कमी पूरी कर सकते हैं.
वामदलों का पारंपरिक वोट बैंक गरीब और अल्पसंख्यक पिछले एक दशक में टीएमसी की ओर खिसक गया था. हुमायूं कबीर के जरिए वामदल उस अल्पसंख्यक वोटर को यह संदेश देने में कामयाब हो सकते हैं कि उनके पास अब टीएमसी का एक मजबूत विकल्प मौजूद है. इससे पहले लेफ्ट ने नौशाद सिद्दीकी की पार्टी ISF के साथ गठबंधन किया था, जिसका उन्हें फायदा भी मिला था. अब हुमायूं कबीर के साथ मिलकर वे उसी फॉर्मूले को बड़े पैमाने पर लागू करना चाहते हैं.
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Mr. Gyanendra Kumar Mishra is associated with hindi.news18.com. working on home page. He has 20 yrs of rich experience in journalism. He Started his career with Amar Ujala then worked for 'Hindustan Times Group...और पढ़ें
Location :
Kolkata,West Bengal
First Published :
January 28, 2026, 23:07 IST

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