Last Updated:January 21, 2026, 07:29 IST
Silent Warriors on Kartavya Path: गणतंत्र दिवस परेड 2026 में भारतीय सेना पहली बार अपने 'मूक योद्धाओं' को कर्तव्य पथ पर उतारेगी. शिकारी पक्षी 'बाज', सेना के कुत्ते, बैक्ट्रियन ऊंट और जांस्कर पोनी. इसमें खास हैं बाज करन-अर्जुन. जो दुश्मनों के लिए चेतावनी हैं. ये मेरठ में प्रशिक्षित योद्धा भारत की सीमाओं की असली ताकत हैं.

गणतंत्र दिवस परेड 2026 में कर्तव्य पथ पर उतरने जा रहे भारतीय सेना के 'मूक योद्धा'. इन दोनों मूक योद्धाओं का नाम है करन-अर्जुन. आकाश से जमीन तक. बर्फ से रेगिस्तान तक. इनसे छिपना मुश्किल नहीं, नामुमकिन है. सीधे कहें तो दुश्मनों के लिए ये सीधी चेतावनी हैं. 26 जनवरी को कर्तव्य पथ सिर्फ सैनिकों की परेड नहीं देखेगा. वह भारत की उस ताकत का गवाह बनेगा, जो बिना बोले युद्ध जीतती है.

पहली बार भारतीय सेना अपने 'एनिमल कंटिंजेंट' को परेड में उतार रही है. शिकारी पक्षी ‘बाज’, सेना के कुत्ते, बैक्ट्रियन ऊंट और जांस्कर पोनी. ये सभी युद्ध के असली हीरो हैं. ये सिर्फ परंपरा नहीं, रणनीति हैं. इन्हें उत्तर प्रदेश के मेरठ में सेना की विशेष यूनिट ने तैयार किया है. ये भारत की सीमाओं पर दुश्मन की हर चाल को पहले ही भांप लेते हैं.

परेड में शामिल चार शिकारी पक्षी, जिन्हें 'बाज' कहा जाता है, भारतीय सेना की आंखें हैं. ये रैप्टर्स आसमान से हर हलचल पर नजर रखते हैं. ड्रोन, घुसपैठ और बर्ड-स्ट्राइक जैसी चुनौतियों से निपटने में इनकी भूमिका अहम है. इनकी नजर इतनी तेज होती है कि कई किलोमीटर दूर की हलचल पकड़ लेते हैं. मेरठ में इन्हें खास ट्रेनिंग दी गई है. ये प्राकृतिक सर्विलांस सिस्टम हैं. बिना बैटरी. बिना नेटवर्क. कार्तव्य पथ पर उड़ते ये बाज साफ संदेश देंगे भारत का आकाश अब पूरी तरह सुरक्षित है. ये करन-अर्जुन की तरह अडिग हैं. थकते नहीं. रुकते नहीं.
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सेना के कुत्ते 'साइलेंट वॉरियर्स' कहलाते हैं. इस परेड में 16 कुत्ते शामिल होंगे. इनमें 10 भारतीय नस्लें और 6 मिलिट्री डॉग्स हैं. ये विस्फोटक खोजने, आतंकी ट्रैकिंग और सर्च ऑपरेशन में माहिर हैं. मुधोल हाउंड, रमपुर हाउंड और चिप्पीपराई जैसे कुत्ते आत्मनिर्भर भारत की पहचान बन चुके हैं. कई ऑपरेशनों में इन्होंने सैनिकों की जान बचाई है. अंधेरे में भी दुश्मन की गंध पकड़ लेते हैं. ये जमीन पर करन-अर्जुन की तरह लड़ते हैं. बिना शोर. बिना चूक.

दो बैक्ट्रियन ऊंट भी पहली बार परेड का हिस्सा बनेंगे. ये ऊंट ठंडे रेगिस्तान के लिए बने हैं. 15,000 फीट की ऊंचाई पर भी काम करते हैं. 250 किलो तक वजन उठाते हैं. लद्दाख की LAC पर लॉजिस्टिक्स में इनकी भूमिका निर्णायक है. कम पानी और सीमित संसाधनों में भी ये लंबी दूरी तय करते हैं. दुश्मन चाहे जहां छिपे, सेना वहां पहुंचेगी. इन ऊंटों के दम पर.

चार जांस्कर पोनी भी परेड में होंगी. ये लद्दाख की देसी नस्ल हैं. माइनस 40 डिग्री तापमान में भी काम करती हैं. सियाचिन जैसे इलाकों में जहां मशीनें फेल हो जाती हैं, ये पोनी सेना का सहारा बनती हैं. 40 से 60 किलो वजन ढोती हैं. एक दिन में 70 किलोमीटर तक चलती हैं. 2020 के बाद इन्हें सेना में शामिल किया गया. ये भारत की ऊंची सीमाओं की ढाल हैं. दुश्मन समझ ले, पहाड़ भी अब अभेद्य हैं.

यह पूरा दस्ता रेमाउंट एंड वेटरनरी कोर का है. मेरठ में इन्हें वर्षों की ट्रेनिंग दी गई है. ये सिर्फ जानवर नहीं हैं. ये सैनिक हैं. इन्होंने भी सीमाओं पर सेवा दी है. परेड में इनकी मौजूदगी भारत की विविध ताकत दिखाएगी. आकाश, जमीन, बर्फ और रेगिस्ता हर मोर्चे पर भारत तैयार है. 26 जनवरी 2026 को दुनिया देखेगी कि भारत के करन-अर्जुन अब कई रूपों में खड़े हैं. दुश्मनों के लिए एक ही संदेश है बचना संभव नहीं, असंभव है.
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1 hour ago
