Last Updated:January 27, 2026, 17:01 IST
सोनिया गांधी के आवास पर बुलाई गई मीटिंग में शशि थरूर का न पहुंचना, बहुत कुछ कहता है. अब तक कांग्रेस नेता अध्यक्ष से अलग सुर रखते रहे हैं, कई बार सवाल भी उठाए हैं, लेकिन कोई भी बड़ा नेता गांधी परिवार की बात को ठुकराता नहीं है. लेकिन थरूर की दूरी काफी कुछ कह रही है.
शशि थरूर सोनिया गांधी के आवास पर बुलाई गई मीटिंग में भी नहीं पहुंचे.शशि थरूर ने क्या वाकई कांग्रेस से दूर रहने का मन बना लिया है? संसद का बजट सत्र सिर पर है. विपक्ष सरकार को घेरने की रणनीति बनाने में जुटा है. इसी गहमागहमी के बीच सोनिया गांधी ने अपने आवास 10 जनपथ पर पार्टी के शीर्ष नेताओं की मीटिंग बुलाई थी ताकि सदन के भीतर और बाहर की रणनीति तय की जा सके. लेकिन, सूत्रों के मुताबिक- इस ‘हाई प्रोफाइल’ मीटिंग से भी शशि थरूर गायब रहे.
हालांकि, शशि थरूर के ऑफिस की ओर से कहा गया कि ‘थरूर देश से बाहर हैं, उनका आना तय था लेकिन दुर्भाग्यवश वे नहीं आ सके. हमने इस बारे में पार्टी को पहले ही सूचित कर दिया है.’ शशि थरूर का सोनिया गांधी के घर बुलाई गई बैठक से नदारद रहना सामान्य घटना नहीं है. सियासी गलियारों में इसे महज ‘व्यस्तता’ नहीं, बल्कि ‘बगावत’ की आहट माना जा रहा है. खबरें पहले से थीं कि थरूर पार्टी की कार्यशैली से नाराज हैं, लेकिन सोनिया गांधी के बुलावे को अनसुना करना यह बताता है कि बात अब ‘नाराजगी’ से आगे निकल चुकी है.
10 जनपथ की बैठक और थरूर की गैरमौजूदगी
मंगलवार को सोनिया गांधी के आवास पर हुई बैठक का एजेंडा बेहद स्पष्ट था. बजट सत्र में सरकार को महंगाई, बेरोजगारी और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर घेरना. बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत पार्टी के कई वरिष्ठ रणनीतिकार मौजूद थे.
शशि थरूर अक्सर ऐसी रणनीतिक बैठकों का अहम हिस्सा होते हैं. संसद में बहस की शुरुआत करनी हो या सरकार के बयानों का तार्किक जवाब देना हो, थरूर कांग्रेस की पहली पंक्ति के योद्धा माने जाते रहे हैं. ऐसे में, जब ‘हाईकमान’ (सोनिया गांधी) खुद बैठक ले रही हों, तब उनका न पहुंचना कई सवाल खड़े करता है. सूत्रों के मुताबिक, थरूर को इस बैठक के लिए विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था, लेकिन वे नहीं आए.
नाराजगी का पुराना सिलसिला
यह पहली बार नहीं है जब शशि थरूर ने पार्टी की गतिविधियों से दूरी बनाई है. पिछले कुछ महीनों के घटनाक्रम पर नजर डालें तो एक पैटर्न साफ दिखाई देता है. थरूर ने हाल ही में पार्टी की कई अहम बैठकों से खुद को दूर रखा है. चाहे वह केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी की बैठकें हों या दिल्ली में आयोजित एआईसीसी (AICC) के कार्यक्रम, थरूर की उपस्थिति लगातार कम होती जा रही है.
लेकिन अब तक यह माना जा रहा था कि उनकी नाराजगी स्थानीय नेतृत्व या पार्टी अध्यक्ष की कार्यशैली को लेकर हो सकती है. कांग्रेस में यह परंपरा रही है कि नेता अध्यक्ष से नाराज हो सकते हैं, लेकिन गांधी परिवार खासकर सोनिया गांधी के प्रति वफादारी पर आंच नहीं आने देते. थरूर ने 10 जनपथ की बैठक में न जाकर उस ‘लक्ष्मण रेखा’ को पार कर दिया है, जिसे कांग्रेस में अनुशासन का अंतिम पैमाना माना जाता है.
आखिर क्यों खफा हैं थरूर?
साइडलाइन किए जाने का दर्द: कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव लड़ने के बाद से ही थरूर खेमे को लग रहा है कि उन्हें पार्टी की मुख्यधारा से धीरे-धीरे काटा जा रहा है. हालांकि, चुनाव के बाद उन्होंने खड़गे के साथ काम करने की बात कही थी, लेकिन संगठन में उन्हें वह तवज्जो नहीं मिली जिसकी वे उम्मीद कर रहे थे.
केरल की गुटबाजी: थरूर का केरल कांग्रेस के अन्य बड़े नेताओं के साथ छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है. के.सी. वेणुगोपाल और प्रदेश नेतृत्व के साथ उनकी तनातनी अक्सर खबरों में रहती है. थरूर को लगता है कि केंद्रीय नेतृत्व (हाईकमान) इस मामले में हस्तक्षेप करने के बजाय चुप्पी साधे हुए है, जो परोक्ष रूप से उनके विरोधियों का समर्थन है.
संसदीय भूमिका: चर्चा यह भी है कि संसद में पार्टी द्वारा दी जाने वाली जिम्मेदारियों से भी वे खुश नहीं हैं. एक वरिष्ठ सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री होने के नाते वे नीति निर्माण में बड़ी भूमिका चाहते थे, जो शायद उन्हें नहीं मिल रही.
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Delhi,Delhi,Delhi
First Published :
January 27, 2026, 17:01 IST

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