विश्लेषण: ट्रंप ईरान पर क्यों रुके? क्या इसमें जोखिम ज्यादा, फायदा जीरो

1 hour ago

ऊपर से देखने पर लगता है कि अमेरिका आसानी से ईरान पर हमला कर सकता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे कहीं ज़्यादा जटिल है. ईरान के पास सीधे युद्ध के अलावा प्रॉक्सी ताक़तें, मिसाइल क्षमता और Strait of Hormuz जैसे रणनीतिक हथियार हैं. किसी भी हमले की स्थिति में तेल की कीमतें तेज़ी से बढ़ सकती हैं, मिडिल ईस्ट में तैनात अमेरिकी सैनिक सीधे निशाने पर आ सकते हैं और संघर्ष पूरे क्षेत्र में फैल सकता है. इसी आशंका ने अमेरिका को बार-बार कदम पीछे खींचने पर मजबूर किया है. इसी मुख्य बिंदु पर न्यूज़ 18 की खास चर्चा में मेजर जनरल शशि अस्थाना (सेवानिवृत्त) ने बेहद सटीक और व्यावहारिक विश्लेषण पेश किया.

ईरान में सत्ता बदलना अमेरिका के बस्का नहीं
मेजर जनरल शशि अस्थाना का मानना है कि असल में अमेरिका के दिमाग में एक बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है, अगर ईरान पर हमला हुआ और उसके बाद भी वहाँ सत्ता नहीं बदली, तो यह अमेरिका के लिए रणनीतिक तबाही साबित होगी. 2025 में जो सीमित हमला हुआ था, वह सिर्फ बची-खुची न्यूक्लियर फैसिलिटीज़ को टारगेट किया गया था. इसी वजह से ईरान ने भी अपनी पूरी सैन्य क्षमता का इस्तेमाल नहीं किया. उसके पास जितनी मिसाइलें और विकल्प थे, उनका बहुत छोटा हिस्सा ही प्रयोग में लाया गया.

लेकिन अब जिस हमले पर चर्चा चल रही है, वह सत्ता परिवर्तन को ध्यान में रखकर होना था, यही वह बिंदु था जहाँ से जोखिम कई गुना बढ़ गया है. ईरान में यह व्यापक रूप से माना जाता है कि अगर खामेनेई या इस्लामिक रेजीम के अस्तित्व पर सीधा हमला होता है, तो यह उनके लिए “Survival War” बन जाएगा. ऐसी स्थिति में ईरान अपनी पूरी ताकत से जवाब देगा. उस हालात में मध्य-पूर्व के अलग-अलग देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने सुरक्षित नहीं रहेंगे. ईरान की मिसाइलें वहाँ तक पहुँचने में सक्षम हैं, और इससे भारी अमेरिकी जान-माल का नुक्सान होने की संभावना बनती है. अमेरिका ऐसा जोखिम तभी ले सकता था जब उसे यह भरोसा होता कि 100% सत्ता परिवर्तन सफल होगा. लेकिन ज़मीनी हालात ने यह भरोसा नहीं दे सकते.

ईरानी रेजीम ने यह साबित कर दिया कि वह आंतरिक विरोध को कुचलने की पूरी क्षमता और इच्छाशक्ति रखती है. चाहे लाठी-डंडों से या गोलियों के ज़रिये—प्रोटेस्ट्स पर नियंत्रण स्थापित कर लिया गया है. इससे यह संदेश गया कि सत्ता अभी भी मज़बूती से काबिज़ है.

दूसरा, शाह के बेटे और क्राउन प्रिंस रज़ा पहलवी की लोकप्रियता इतनी व्यापक नहीं है कि वे देश के भीतर किसी बड़े जनांदोलन को नेतृत्व दे सकें. ईरान में कोई ऐसा विश्वसनीय और संगठित विपक्षी नेता मौजूद नहीं है जो सत्ता के विकल्प के रूप में उभर सके. सबसे निर्णायक पहलू यह है कि— ईरानी जनता भले ही खराब अर्थव्यवस्था और धार्मिक सत्ता से नाराज़ हो, लेकिन अमेरिका और इज़राइल के प्रति नफरत उससे कहीं ज़्यादा गहरी है. ऐसे में किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को लोग “मुक्ति” नहीं बल्कि “आक्रमण” के रूप में देखते हैं.

इसी नैरेटिव को मज़बूत करते हुए ईरानी रेजीम यह दावा करती रही है कि वे आम नागरिकों को नहीं, बल्कि जासूसों, ट्रेटर्स और देशद्रोहियों को निशाना बना रही है—जिससे उसने अपने दमन को भी एक तरह की वैधता देने की कोशिश की. इस पूरे समीकरण में एक और बड़ा मोड़ तब आया जब इज़राइल ने खुद अमेरिका को संकेत दिया कि वह इस स्तर के युद्ध के लिए तैयार नहीं है.

ईरान अगर पूरी क्षमता से जवाब देता है—खासकर बैलिस्टिक और संभावित हाइपरसोनिक मिसाइलों के ज़रिये—तो छोटा और घनी आबादी वाला इज़राइल भारी नुकसान झेल सकता है. पहले ही यह देखा जा चुका है कि कुछ मौकों पर आयरन डोम सभी मिसाइलों को रोक पाने में असफल रहा. इन सभी कारणों को देखते हुए अमेरिका ने फिलहाल कदम पीछे खींचा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ईरान पूरी तरह सुरक्षित हो गया है.

ईरान पर हमला करना अमेरिका के हक़ में नहीं है. ईरान कोई साधारण देश नहीं है—उसके पास मिसाइलों और ड्रोन का विशाल शस्त्रागार है और उसकी भौगोलिक स्थिति उसे रणनीतिक रूप से बेहद प्रभावशाली बनाती है. चाहे वह सऊदी तेल ढांचे को नुकसान पहुँचाने की क्षमता हो या क्षेत्रीय अस्थिरता फैलाने की—ईरान के पास विकल्पों की कमी नहीं है.

ईरान में बांग्लादेश दोहराने की कोशिश फ़ैल हुई
अमेरिका की कोशिश यह थी कि अंदरूनी असंतोष को इतना भड़काया जाए कि रेजीम अपने ही बोझ से गिर जाए, और फिर उसमें थोड़ी-सी “बाहरी चिंगारी” डालकर सत्ता परिवर्तन करा दिया जाए. एक तरह से यह “बांग्लादेश मॉडल” को दोहराने की कोशिश थी.

बांग्लादेश में सेना शेख हसीना के साथ थी, लेकिन उसने ज्यादा मदद नहीं की, जिससे परिवर्तन संभव हुआ. वहीं ईरान में स्थिति बिल्कुल अलग है. इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) सुप्रीम लीडर खामेनेई के साथ पूरी तरह खड़ा है. वे रेजीम की रक्षा के लिए किसी भी कीमत पर लड़ने को तैयार हैं. मेजर जनरल अस्थाना के अनुसार, यदि सत्ता परिवर्तन का प्रयास होता है, तो IRGC सभी मिसाइलों और संसाधनों का इस्तेमाल करेगा, जिससे अमेरिका को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.

अमेरिका के लिए सबसे बड़ा खतरा अमेरिकी सैनिकों और नागरिकों की भारी मौतें हैं. यदि हमले में ज्यादा कैजुअल्टी होती हैं, तो ट्रंप को कोई माफ नहीं करेगा—खासकर नवंबर 2026 में होने वाले मिड-टर्म इलेक्शन्स को देखते हुए. उनकी गणना में यह “कॉस्ट-बेनिफिट” एनालिसिस फेल हो जाता है: जोखिम बहुत ज्यादा, लाभ बहुत कम. इसलिए, सीमित हमले (जैसे 2025 में परमाणु सुविधाओं पर) तक सीमित रहना ज्यादा व्यावहारिक लगता है, न कि पूर्ण सत्ता परिवर्तन वाला बड़ा ऑपरेशन.

ईरान में मोसाद और सीआईए एजेंट्स पर ईरान की कार्रवाई
हाल के वर्षों में ईरान ने मोसाद (इजरायली खुफिया एजेंसी) और सीआईए से जुड़े कई लोगों पर आरोप लगाकर गिरफ्तारियाँ और फाँसी दी हैं. मेजर जनरल अस्थाना के अनुसार, इनकी संख्या काफी ज्यादा हो सकती है—हजारों में. हालांकि कोई सटीक आंकड़ा नहीं है (क्योंकि यह खुफिया मामला है और अनुमान पर आधारित), लेकिन ईरान की सख्त धार्मिक व्यवस्था के बावजूद कई लोग “खरीदे” जा चुके हैं.

ईरान में धर्म की सख्ती के बावजूद, आर्थिक संकट और असंतोष के कारण कुछ लोग विदेशी एजेंसियों के संपर्क में आ जाते हैं, लेकिन रेजीम इसे कुचलने में सक्षम है. हाल की रिपोर्ट्स में ईरान ने सैकड़ों लोगों को “मोसाद एजेंट्स” या जासूस बताकर गिरफ्तार किया है, और कई को फाँसी दी गई है. ट्रंप की “न डरो, न मारो” वाली नीति के पीछे मानवीय प्रेम कम, बल्कि अपने सीआईए और मोसाद एजेंट्स की सुरक्षा ज्यादा है—क्योंकि उनकी मौत से अमेरिकी खुफिया नेटवर्क को भारी नुकसान होता है.

ट्रंप प्रशासन ईरान पर हमले की धमकी देता है, लेकिन जमीनी हकीकत उन्हें पीछे खींचती है. रेजीम की मजबूत IRGC सपोर्ट, प्रॉक्सी फोर्सेस, मिसाइल क्षमता और आंतरिक नियंत्रण के कारण “बांग्लादेश जैसा” आसान परिवर्तन संभव नहीं. अमेरिका जानता है कि असफल हमला रणनीतिक तबाही ला सकता है—खासकर चुनावी साल में.

मेजर जनरल शशि अस्थाना (सेवानिवृत्त) इंटरनेशनल अफेयर्स में पीएचडी धारक हैं तथा भारतीय सेना में 45 वर्ष और संयुक्त राष्ट्र में व्यापक अनुभव रखते हैं. वे भारतीय सेना में पूर्व महानिदेशक इन्फैंट्री (Director General of Infantry) रह चुके हैं. उन्होंने विभिन्न महत्वपूर्ण अभियानों में भाग लिया, जिनमें कारगिल युद्ध, इथियोपिया और इरिट्रिया में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन (UNMEE), तथा त्रिपुरा में काउंटर-इंसर्जेंसी (आतंकवाद-विरोधी) अभियान शामिल हैं.

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