मैं कितनी मोटी हूं! युवाओं में तनाव की सबसे बड़ी वजह आई सामने, एम्‍स- ICMR....

1 day ago

Last Updated:January 05, 2026, 21:25 IST

एम्स और आईसीएमआर के हालि‍या अध्ययन में सामने आया है क‍ि र‍िलेशन‍श‍िप की समस्‍याएं या पढ़ाई और कर‍ियर की टेंशन नहीं बल्‍क‍ि बॉडी इमेज भारतीय युवाओं में तनाव की सबसे बड़ी वजह है. स्‍टडी बताती है क‍ि 49 फीसदी मोटे और 47 फीसदी कम वजन वाले युवा मानसिक कष्ट झेल रहे हैं. आइए जानते हैं क्‍या कहती है स्‍टडी...

मैं कितनी मोटी हूं! युवाओं में तनाव की सबसे बड़ी वजह आई सामने, एम्‍स- ICMR....ज्‍यादा मोटा होना या ज्‍यादा पतला होना, दोनों ही युवाओं को तनाव दे रहे हैं.

Body Image and Stress: अभी तक लोगों को लगता था कि युवाओं में तनाव की सबसे बड़ी वजह पढ़ाई की टेंशन, रिश्तों में उलझाव, ऑफिस और करियर की चिंता होगी, लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि युवाओं में तनाव की सबसे बड़ी वजह ये सब नहीं बल्कि उनकी बॉडी इमेज है. कोई चाहे मोटा है या पतला है, शरीर की दोनों ही परेशानियां युवाओं को परेशान कर रही हैं. शरीर कैसा दिखाई देता है यह भारतीय युवाओं की गंभीर समस्या बनती जा रही है.

हाल ही में एम्स और आईसीएमआर के एक भारतीय अध्ययन में पाया गया है कि चाहे मोटा है या पतला, शरीर के वजन के दोनों चरम सिरों पर खड़े लगभग हर दो में से एक युवा बॉडी इमेज की वजह से गंभीर मानसिक कष्ट से जूझ रहा है. टीओआई में छपी खबर के मुताबिक जर्नल ऑफ एजुकेशन एंड हेल्थ प्रमोशन में प्रकाशित हालिया अध्ययन बताता है कि एम्स अस्पताल की ओपीडी में आने वाले 18 से 30 वर्ष आयु के 1,071 युवाओं पर किए गए शोध में सामने आया कि 49 फीसदी मोटापे से ग्रस्त और 47 फीसदी कम वजन वाले युवाओं ने बॉडी इमेज से जुड़ी गंभीर समस्याएं बताईं.

अध्ययन के मुताबिक करीब 25 फीसदी युवा मोटापे से ग्रस्त थे और 11 फीसदी कम वजन वाले थे. इनमें से अधिकांश मध्यम आय वर्ग के परिवारों से आने वाले छात्र थे. सामान्य वजन वाले युवाओं की तुलना में, कम वजन वाले युवाओं में बॉडी इमेज से जुड़ी परेशानी की संभावना लगभग दोगुनी थी, जबकि मोटापे से ग्रस्त युवाओं में यह संभावना लगभग तीन गुना पाई गई.

शोध से जुड़े विशेषज्ञों का कहना था कि वजन से संबंधित समस्याओं का समाधान मानसिक स्वास्थ्य को देखे बिना संभव नहीं है. मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर पियूष रंजन ने कहा कि वजन प्रबंधन केवल वजन घटाने तक सीमित नहीं है. भावनात्मक समस्याओं को नजरअंदाज करना युवाओं के लाइफस्टाइल कार्यक्रमों से बीच में ही बाहर हो जाने का एक बड़ा कारण है. टिकाऊ परिणामों के लिए नियमित पोषण देखभाल में मनोवैज्ञानिक जांच को शामिल करना बेहद जरूरी है.

पोषण विशेषज्ञ और पीएचडी शोधार्थी वरीशा अनवर के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन में पाया गया कि कई युवा वजन घटाने के कार्यक्रमों की शुरुआत उत्साह के साथ करते हैं, लेकिन मनोवैज्ञानिक थकान, बॉडी इमेज को लेकर तनाव, शैक्षणिक दबाव और जीवन के इस चरण में होने वाले बदलावों के कारण वे अक्सर बीच में ही जुड़ाव खो देते हैं. यह भारत में वजन प्रबंधन के उस दृष्टिकोण की कमी को उजागर करता है, जो मुख्य रूप से कैलोरी पर केंद्रित है.

युवाओं को च‍िंता, जज कर रहे लोग 

वजन के अनुसार मानसिक परेशानी के स्वरूप में भी अंतर देखा गया. मोटापे से ग्रस्त युवाओं में आत्म-संकोच और आत्मविश्वास में कमी अधिक थी, जबकि कम वजन वाले युवाओं में चिंता, अकेलापन और शर्मिंदगी ज्यादा पाई गई. कुल मिलाकर, आधे से अधिक युवा लगातार अपने वजन को लेकर सचेत रहते थे, हर तीन में से एक ने खुद को कम आत्मविश्वासी महसूस किया, और हर चार में से एक को लगा कि लोग उन्हें जज कर रहे हैं. चिंता, अलगाव और शर्मिंदगी वजन के दोनों चरम सिरों पर सबसे अधिक देखी गई.

सामाजिक स्टिग्मा और आर्टिफिशियल खूबसूरती बढ़ाती है तनाव
शोधकर्ताओं ने कहा कि सामाजिक कलंक और अवास्तविक सौंदर्य मानक भावनात्मक तनाव को बढ़ावा देते हैं, जो प्रेरणा, उपचार के पालन और दीर्घकालिक स्वास्थ्य परिणामों को प्रभावित करता है. आईसीएमआर द्वारा वित्तपोषित इस अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया अब भी मोटापे पर ज्यादा केंद्रित है, जबकि कम वजन वाले युवाओं पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक बोझ को नजरअंदाज किया जा रहा है.

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प्रिया गौतमSenior Correspondent

अमर उजाला एनसीआर में रिपोर्टिंग से करियर की शुरुआत करने वाली प्रिया गौतम ने हिंदुस्तान दिल्ली में संवाददाता का काम किया. इसके बाद Hindi.News18.com में वरिष्ठ संवाददाता के तौर पर काम कर रही हैं. हेल्थ एंड लाइफस्...और पढ़ें

Location :

Noida,Gautam Buddha Nagar,Uttar Pradesh

First Published :

January 05, 2026, 21:25 IST

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