पटना. बिहार में आगामी पंचायत चुनावों में आरक्षण की व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव होने जा रहे हैं. राज्य निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि 2026 के चुनावों के लिए नया आरक्षण रोस्टर लागू होगा. यह बदलाव बिहार राज्य पंचायती राज अधिनियम के नियमों के तहत हो रहा है, जहां हर दो चुनावों के बाद रोस्टर को अपडेट किया जाता है. बता दें कि बिहार में मुखिया के 8053 पद हैं. ग्राम कचहरी के भी 8053 पद हैं. वार्ड सदस्य के 11307 पद हैं. पंचायत समिति सदस्य 11497 हैं. पंच के एक लाख 13307 पद हैं और जिला परिषद के 1162 सदस्य हैं. इन सभी पदों के लिए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की तैयारियां शुरू हो गई हैं. इस वर्ष होने जा रहे चुनाव पर कुछ नई जानकारियां सामने आईं हैं जो बेहद महत्वपूर्ण हैं.राज्य निर्वाचन आयोग से मिली जानकारी के अनुसार, बिहार में 30 साल पुराने परिसीमन के आधार पर पंचायत चुनाव होने जा रहे हैं. 2,55,379 पदों के लिए चुनाव होंगे. इसके साथ ही आरक्षण रोस्टर बदलाव होगा.
बदलेगा पंचायत चुनाव में कुर्सी का खेल
दरअसल, बिहार पंचायती राज अधिनियम के अनुसार यह रोस्टर हर दो चुनावों के बाद बदला जाना अनिवार्य है. पिछली बार 2016 और 2021 के चुनावों में एक ही रोस्टर लागू रहा था, इसलिए 2026 में इसका बदलना तय था. इसका मतलब यह हुआ जो सीट अभी SC के लिए आरक्षित है, संभव है सामान्य कोटे की हो जाए. इसी तरह जनरल सीट रिजर्व हो सकती है. बता दें कि पिछली बार 2016 और 2021 में पुरानी व्यवस्था चली थी, लेकिन अब नई सूची से कई सीटों की श्रेणी यानी कैटेगरी (Category) बदल जाएगी. इससे ग्रामीण राजनीति में नए चेहरे उभर सकते हैं और सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिलेगा. बता दें कि चुनाव का कार्यकाल दिसंबर 2026 में समाप्त हो रहा है, इसलिए मतदान अक्टूबर-नवंबर के आसपास होने की संभावना है.
रोस्टर बदलाव का कारण और प्रभाव
बता दें कि आरक्षण रोस्टर एक तरह की सूची है जो तय करती है कि कौन से पद किस वर्ग के लिए सुरक्षित रहेंगे. पंचायत चुनाव अधिनियम के मुताबिक, यह बदलाव इसलिए जरूरी है ताकि सभी समुदायों को बारी-बारी से नेतृत्व का मौका मिले. उदाहरण के लिए, अगर कोई मुखिया सीट एससी के लिए आरक्षित थी तो अब वह सामान्य या अन्य श्रेणी में जा सकती है. इसी तरह सामान्य सीटें ईबीसी या एसटी के लिए आरक्षित हो सकती हैं. यहां यह भी बता दें कि कुल पदों का 50 प्रतिशत तक आरक्षण दिया जाता है जो एससी, एसटी और ईबीसी वर्गों के बीच बंटता है. ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि इस बदलाव से राजनीतिक समीकरण बदलेंगे और कई पुराने नेता नए क्षेत्रों में उतरने को मजबूर होंगे.
आरक्षण का फॉर्मूला और इसका आधार
आरक्षण तय करने का तरीका पूरी तरह जनसंख्या पर निर्भर है. एससी और एसटी वर्गों को उनके इलाके में मौजूद प्रतिशत के हिसाब से सीटें मिलती हैं. उदाहरण के तौर पर इसको ऐसे समझिये कि – अगर किसी पंचायत में एससी की आबादी 25 प्रतिशत है तो उतने ही प्रतिशत पद उनके लिए आरक्षित होंगे. बाकी सीटों में ईबीसी को करीब 20 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है. यहां खास व्यवस्था यह भी है कि कुल आरक्षण कभी 50 प्रतिशत से ऊपर नहीं जाता. दूसरी ओर यह भी अहम है कि महिलाओं के लिए हर श्रेणी में 50 प्रतिशत हिस्सा सुरक्षित है जिसे ‘आरक्षण के अंदर आरक्षण’ कहा जाता है.
पहले जैसी नहीं रहेगी पंचायत चुनाव की व्यवस्था
राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देश के अनुसार बिहार में आगामी पंचायत चुनावों में आरक्षण की व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव होने जा रहे हैं. जिला मजिस्ट्रेट इस प्रक्रिया की देखरेख करते हैं और अंतिम फैसला लेते हैं. ग्राम पंचायत स्तर पर वार्ड सदस्यों का आरक्षण कुल सीटों से तय होता है, जबकि मुखिया का पंचायत समिति की संख्या से. प्रखंड प्रमुख और जिला परिषद अध्यक्ष का आरक्षण जिले की कुल सीटों पर आधारित होता है. आरक्षण बदलाव से कुछ इलाकों में असंतोष हो सकता है, लेकिन यह संवैधानिक प्रक्रिया है.
पंचायती राज अधिनियम के तहत बदलाव
बिहार राज्य निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि 2026 के चुनावों के लिए नया आरक्षण रोस्टर लागू होगा. यह बदलाव बिहार पंचायती राज अधिनियम के नियमों के तहत हो रहा है, जहां हर दो चुनावों के बाद रोस्टर को अपडेट किया जाता है. आयोग ने तैयारियां तेज कर दी हैं, जिसमें वोटर लिस्ट अपडेट और ईवीएम की खरीद शामिल है. ग्रामीण मतदाताओं को नए नियमों की जानकारी देने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं. आयोग का मानना है कि यह बदलाव बिहार की ग्रामीण राजनीति को अधिक समावेशी बनाएगा.
सामाजिक न्याय, नया नेतृत्व और नई ऊर्जा
यह रोस्टर बदलाव का मुख्य उद्देश्य पिछड़े वर्गों को मजबूत आवाज देना है. अगर कोई सीट लगातार एक वर्ग के लिए आरक्षित रहती है, तो अन्य समुदायों को मौका नहीं मिलता. नई व्यवस्था से सभी को बराबर अवसर मिलेगा जिससे चुनाव में विविधता बढ़ेगी. जानकारों का मानना है कि इससे ग्रामीण विकास में नए विचार आएंगे और पुरानी सत्ता की एकाधिकार टूटेगा. हालांकि, कुछ संगठन पुरानी डिलिमिटेशन पर चुनाव कराने को लेकर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन आयोग ने जनगणना की कमी को वजह बताया है. कुल मिलाकर, 2026 का चुनाव ईवीएम के साथ और नए आरक्षण से ऐतिहासिक होगा.
ग्रामीण राजनीति में नया अध्याय लिखा जाएगा
आरक्षण रोस्टर बदलने का मकसद किसी एक वर्ग को फायदा या नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि नेतृत्व के अवसरों का संतुलन बनाए रखना है. अगर कोई सीट लंबे समय तक एक ही वर्ग के लिए आरक्षित रहे, तो अन्य समुदायों के लोग उस पद तक पहुंच ही नहीं पाते. नया रोस्टर यह सुनिश्चित करता है कि हर वर्ग को समय-समय पर नेतृत्व का अवसर मिले और पंचायतों में सामाजिक भागीदारी बनी रहे. नया आरक्षण रोस्टर जहां कई दावेदारों की रणनीति बदलेगा, वहीं ग्रामीण राजनीति में नई ऊर्जा और नए चेहरे भी सामने लाएगा.

23 hours ago
