फोकट का सवाल....इंदौर पानी कांड के बीच फोकस में विजयवर्गीय क्यों आ गए

2 hours ago

Kailash Vijayvargiya News: इंदौर, देश का सबसे स्वच्छ शहर माने जाने वाला स्थान, आज एक गंभीर जल संकट से जूझ रहा है. भागीरथपुरा इलाके में दूषित पेयजल की वजह से दर्जनों लोग बीमार पड़ गए और कई लोगों की जान चली गई. इस त्रासदी के बीच मध्य प्रदेश के नगरीय विकास मंत्री और स्थानीय विधायक कैलाश विजयवर्गीय सुर्खियों में हैं. क्योंकि उन्होंने मीडिया के सवालों पर आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया और कहा – ‘फोकट का सवाल मत पूछो’. यह बयान इसलिए और विवादास्पद हो गया क्योंकि घटना उनके विधानसभा क्षेत्र इंदौर-1 में हुई है, और जिम्मेदारी की बात उठने पर उनका गुस्सा सामने आया.

मामला सिर्फ गंदा पानी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मंत्री के व्यवहार ने इसे राजनीतिक रंग दे दिया. जहां एक तरफ लोग मौत और बीमारी से पीड़ित हैं, वहीं मंत्री का मीडिया से बदतमीजी भरा रवैया सत्ता के अहंकार का प्रतीक बन गया. कांग्रेस ने इसे आधार बनाकर इस्तीफे की मांग की है, जबकि भाजपा इसे व्यक्तिगत तनाव बता रही है. यह घटना न केवल प्रशासनिक लापरवाही उजागर करती है, बल्कि जनप्रतिनिधियों की संवेदनशीलता पर भी सवाल उठाती है.

क्या है पूरा मामला?

इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में नर्मदा जल आपूर्ति की मुख्य पाइपलाइन में लीकेज हुआ. इसके ऊपर एक शौचालय बना हुआ था. इससे सीवेज का गंदा पानी पीने के पानी में मिल गया, जिससे डायरिया और उल्टी-दस्त का प्रकोप फैल गया. स्थानीय लोगों के अनुसार 25 दिसंबर से ही पानी में बदबू और गंदगी की शिकायतें थीं, लेकिन समय पर कार्रवाई नहीं हुई. इसके बाद अब तक 13 लोगों की मौत हो चुकी है. इसमें एक 6 महीने का बच्चा और कई महिलाएं शामिल हैं. 2000 से अधिक लोग प्रभावित हुए, 200 से ज्यादा अस्पताल में भर्ती हुए. सरकार ने आधिकारिक तौर पर 4 मौतों की पुष्टि की है, लेकिन स्थानीय और विपक्षी दावे ज्यादा हैं. मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इसे ‘इमरजेंसी जैसी स्थिति’ बताया और जांच समिति गठित की.

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने वीडियो शेयर कर मंत्री पर हमला बोला. (फाइल फोटो PTI)

कैसे हुआ दूषित पानी का मिश्रण?

जांच में सामने आया कि पाइपलाइन में जॉइंट ढीला था और ऊपर बने शौचालय से सीवेज रिसकर पानी में मिल गया. इंदौर नगर निगम के आयुक्त ने पुष्टि की कि लीकेज की वजह से यह हादसा हुआ. शहर को नर्मदा से पानी सप्लाई होता है, लेकिन स्थानीय स्तर पर रखरखाव की कमी ने यह संकट पैदा किया. इंदौर 8 बार स्वच्छ शहर का खिताब जीत चुका है और 2021 में वाटर प्लस सिटी भी घोषित हुआ था, जहां अपशिष्ट जल का पुन: उपयोग होता है. लेकिन यह घटना दिखाती है कि सतही स्वच्छता के पीछे बुनियादी ढांचे की कमियां अभी भी हैं. निवासियों ने पहले शिकायत की, लेकिन अनदेखी हुई, जो प्रशासनिक चूक को उजागर करता है.

कैलाश विजयवर्गीय फोकस में क्यों?

कैलाश विजयवर्गीय भागीरथपुरा के स्थानीय विधायक और नगरीय विकास मंत्री हैं, इसलिए क्षेत्र की जिम्मेदारी सीधे उन पर आती है. 31 दिसंबर को मीडिया ने जब मौतों की जिम्मेदारी, इलाज खर्च के रिफंड और पानी व्यवस्था पर सवाल किए, तो मंत्री भड़क गए. उन्होंने कहा ‘छोड़ो यार, फोकट का प्रश्न मत पूछो’ और आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल किया. वीडियो वायरल होने के बाद उन्होंने माफी मांगी, कहा कि दो दिन से बिना सोए काम कर रहे हैं और दुख में गलत शब्द निकल गए. लेकिन यह बयान सत्ता की असंवेदनशीलता का प्रतीक बन गया. पहले भी उन्होंने कहा था कि कुछ मौतें ‘नेचुरल’ हैं, इस पर विवाद हुआ.

इस्तीफे की मांग क्यों हो रही?

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने वीडियो शेयर कर मंत्री पर हमला बोला. उन्होंने कहा कि जहरीले पानी से मौतें हो रही हैं, लेकिन भाजपा नेता अहंकार दिखा रहे हैं. पटवारी ने मुख्यमंत्री से नैतिक आधार पर विजयवर्गीय का इस्तीफा मांगने को कहा. विपक्ष का तर्क है कि मंत्री का व्यवहार जनता के दर्द की अनदेखी दिखाता है और क्षेत्रीय विधायक होने के नाते वे सीधे जिम्मेदार हैं. यह मांग इसलिए मजबूत हुई क्योंकि इंदौर भाजपा का गढ़ है और स्वच्छता का मॉडल, लेकिन ऐसी लापरवाही सवाल उठाती है.

कैलाश विजयवर्गीय भागीरथपुरा के स्थानीय विधायक और नगरीय विकास मंत्री हैं. (फाइल फोटो PTI)

सरकार की कार्रवाई और आगे क्या?

सरकार ने एक अधिकारी को बर्खास्त किया, दो को सस्पेंड किया और जांच पैनल बनाया. मृतकों के परिवारों को 2 लाख रुपये मुआवजा, सभी मरीजों का मुफ्त इलाज और टैंकर से पानी सप्लाई शुरू की. हाईकोर्ट ने स्टेटस रिपोर्ट मांगी और शुध्द पानी सुनिश्चित करने के आदेश दिए. लेकिन यह घटना सबक है कि स्वच्छता अभियान के साथ बुनियादी सुविधाओं का रखरखाव जरूरी है. गरीब बस्तियों में ऐसी चूक जानलेवा साबित हो सकती है. जनता को जागरूक रहना होगा और प्रशासन को जवाबदेह बनाना होगा, ताकि “स्वच्छ शहर” सिर्फ पुरस्कार न रहे, बल्कि वास्तविकता बने.

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