Last Updated:February 04, 2026, 14:07 IST
Online Gaming Addiction: गाजियाबाद और भोपाल की घटनाओं ने बच्चों में बढ़ती ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया लत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि डिजिटल एडिक्शन बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है. समाज, सरकार और परिवारों के लिए यह एक चेतावनी है कि बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना जरूरी है. लेकिन सवाल है कि आखिर कितनी मासूम की जानें जाएंगी तब इस तरह के गेमिंग एप पर बैन लगेगा.

नई दिल्ली: देश में दो घटनाओं ने लोगों का दिल तोड़ दिया. गाजियाबाद की तीन मासूम बहनों निशिका, प्राची और पाखी की मौत ने पूरे समाज को आईना दिखा दिया है. रात का सन्नाटा था, घरों में लोग सो रहे थे. लेकिन एक परिवार हमेशा के लिए टूट रहा था. तीनों बहनों ने एक साथ नौवीं मंजिल से छलांग लगा दी. शुरुआती जांच में सामने आ रहा है कि वे ऑनलाइन गेमिंग की लत में फंस चुकी थीं. यह सिर्फ एक हादसा नहीं है. यह डिजिटल युग की खतरनाक सच्चाई है. यह सवाल उठाता है कि बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन देना क्या धीरे-धीरे उनकी जिंदगी से खेलने जैसा बन चुका है?
भोपाल से आई खबर इस दर्द को और गहरा कर देती है. पिपलानी इलाके में 14 साल के एक बच्चे ने भी ऑनलाइन गेमिंग के दबाव में जान गंवा दी. यह घटनाएं अलग-अलग शहरों की हैं, लेकिन कहानी एक जैसी है. बच्चे स्क्रीन के भीतर कैद हो रहे हैं. असली दुनिया से दूर जा रहे हैं. खेल का मैदान खाली है और मोबाइल की स्क्रीन चमक रही है. परिवार समझ नहीं पा रहा और समाज चुप है. वहीं सरकार की नीति अधूरी है और सोशल मीडिया कंपनियां लगातार मुनाफा कमा रही हैं. सवाल वही है कि क्या बच्चों की सुरक्षा से ज्यादा डिजिटल बाजार महत्वपूर्ण हो गया है?
जब मनोरंजन बना मानसिक जाल
आज ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया बच्चों की जिंदगी का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं. लेकिन यह सिर्फ मनोरंजन नहीं रह गया है. कई गेम्स और ऑनलाइन चैलेंज बच्चों को धीरे-धीरे मानसिक दबाव में डालते हैं. टास्क आधारित गेम्स बच्चों को लगातार नए स्तर और नए निर्देश देते हैं. कई बार यह निर्देश भावनात्मक रूप से खतरनाक हो सकते हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि जब बच्चा आभासी दुनिया को असली जिंदगी समझने लगता है, तब खतरा बढ़ जाता है.
5 अहम सवाल
क्या ऑनलाइन गेमिंग बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है?
लगातार स्क्रीन टाइम बच्चों में अकेलापन, तनाव और डिप्रेशन बढ़ा सकता है. कई अध्ययन बताते हैं कि डिजिटल एडिक्शन बच्चों के व्यवहार और भावनात्मक संतुलन को कमजोर कर सकता है. जब गेमिंग टास्क बच्चों पर दबाव डालते हैं, तो वे मानसिक रूप से टूट सकते हैं.
क्या सोशल मीडिया कंपनियां बच्चों की सुरक्षा को लेकर जिम्मेदार हैं?
सोशल मीडिया और गेमिंग कंपनियां एल्गोरिदम के जरिए यूजर को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर रोकने की कोशिश करती हैं. इससे उनका आर्थिक लाभ बढ़ता है. लेकिन बच्चों के लिए मजबूत सुरक्षा फिल्टर और आयु सत्यापन अभी भी सीमित है. विशेषज्ञ मानते हैं कि कंपनियों को बच्चों के लिए अलग सुरक्षा ढांचा बनाना चाहिए.
क्या सोशल मीडिया और गेमिंग पर बैन समाधान हो सकता है?
पूर्ण बैन एक जटिल विषय है. लेकिन सख्त नियम, समय सीमा और आयु नियंत्रण जरूरी हैं. कई देशों ने बच्चों के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर विशेष नियम बनाए हैं. भारत में भी ऐसे कानूनों की मांग बढ़ रही है.
माता-पिता बच्चों को इस खतरे से कैसे बचा सकते हैं?
माता-पिता को बच्चों की डिजिटल गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए. स्क्रीन टाइम सीमित करना जरूरी है. बच्चों से खुलकर बातचीत करना और भावनात्मक समर्थन देना बेहद अहम है. डिजिटल उपकरणों को पूरी तरह बच्चों के भरोसे छोड़ना जोखिम भरा हो सकता है.
स्कूल और समाज इस संकट को कैसे रोक सकते हैं?
स्कूलों में डिजिटल एडिक्शन पर काउंसलिंग शुरू की जानी चाहिए. बच्चों को खेल, कला और सामाजिक गतिविधियों से जोड़ना जरूरी है. समाज को भी डिजिटल संतुलन पर जागरूकता फैलानी होगी.
‘कोरियन लवर गेम’ और डिजिटल लत का खतरनाक ट्रेंडगाजियाबाद की घटना में सामने आया कि बच्चियां कथित रूप से टास्क आधारित ऑनलाइन गेम खेल रही थीं. कोरोना काल में बच्चों के हाथ में मोबाइल तेजी से पहुंचा. स्कूल बंद हुए. डिजिटल क्लास शुरू हुई. लेकिन उसी समय कई बच्चे गेमिंग और सोशल मीडिया में फंस गए. धीरे-धीरे यह लत बन गई. विशेषज्ञ बताते हैं कि ऐसे गेम बच्चों के दिमाग पर गहरा प्रभाव डालते हैं और उन्हें आभासी दुनिया में बांध देते हैं.
समस्या सिर्फ तकनीक की नहीं है. समस्या उसके अनियंत्रित इस्तेमाल की है. डिजिटल प्लेटफॉर्म बच्चों को लगातार जोड़कर रखते हैं. एल्गोरिदम ऐसा बनाया जाता है कि बच्चे लंबे समय तक स्क्रीन पर रहें. इससे कंपनियों का मुनाफा बढ़ता है. लेकिन बच्चों का मानसिक संतुलन प्रभावित होता है. भारत में ऑनलाइन गेमिंग इंडस्ट्री तेजी से बढ़ रही है. लेकिन बच्चों की सुरक्षा के लिए ठोस नीति अभी भी अधूरी है. समाज को यह समझना होगा कि डिजिटल दुनिया जरूरी है, लेकिन उसका संतुलन भी उतना ही जरूरी है. बच्चों को मोबाइल देना आसान है. लेकिन उनकी डिजिटल जिंदगी को समझना मुश्किल है. माता-पिता, स्कूल और सरकार को मिलकर इस संकट का समाधान निकालना होगा. अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसी घटनाएं बढ़ सकती हैं. और हर बार समाज सिर्फ अफसोस जताकर आगे बढ़ जाएगा.ऑनलाइन गेमिंग का खतरा अब सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा है. PUBG, BGMI, Free Fire, ब्लू व्हेल, टास्क-बेस्ड कोरियन लवर गेम, रियल मनी गेमिंग ऐप्स जैसे रमी और पोकर जैसे प्लेटफॉर्म बच्चों और युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हुए हैं. लेकिन कई मामलों में यही गेम मानसिक दबाव, आर्थिक नुकसान और गंभीर भावनात्मक संकट की वजह बनते दिख रहे हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि इन गेम्स का एल्गोरिदम यूजर को लंबे समय तक जोड़े रखने के लिए डिजाइन किया जाता है, जिससे एडिक्शन का खतरा बढ़ जाता है. भारत में पिछले कुछ वर्षों में सामने आए कई मामलों ने यह संकेत दिया है कि ऑनलाइन गेमिंग अब सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य का बड़ा संकट बन चुकी है.
About the Author
सुमित कुमार News18 हिंदी में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं. वे पिछले 3 साल से यहां सेंट्रल डेस्क टीम से जुड़े हुए हैं. उनके पास जर्नलिज्म में मास्टर डिग्री है. News18 हिंदी में काम करने से पहले, उन्ह...और पढ़ें
First Published :
February 04, 2026, 14:07 IST

1 hour ago
