मानवाधिकारों की बात करने वाले नेताओं की पाखंडी नीति एक बार फिर उजागर हो गई है. बांग्लादेश में हिंदू युवक दीपू चंद्र दास को भीड़ ने ईशनिंदा के झूठे आरोप में पीट-पीटकर मार डाला, पेड़ से लटकाया और जिंदा जला दिया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय की तरफ से सन्नाटा पसरा रहा. कोई मोमबत्ती तक नहीं जलाई गई, कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन नहीं हुआ और किसी बड़े नेता या सांसद ने आवाज नहीं उठाई. वहीं, भारत में दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में जेल में बंद उमर खालिद की रिहाई के लिए अमेरिका के 8 सांसद और न्यूयॉर्क के भारतीय मूल के मेयर जोहरान ममदानी खुलकर सामने आ गए. ममदानी ने तो हाथ से लिखा पत्र तक भेजा और सांसदों ने भारत के राजदूत को पत्र लिखकर जमानत और समयबद्ध ट्रायल की मांग की.
यह दोहरी मानदंड की घिनौनी मिसाल है, जो सवाल उठाता है कि क्या मानवाधिकार सिर्फ चुनिंदा मामलों के लिए हैं? या फिर राजनीतिक एजेंडे और धार्मिक पूर्वाग्रहों के आधार पर तय होते हैं? दीपू जैसे आम आदमी की मौत पर चुप्पी और उमर जैसे कार्यकर्ता पर अंतरराष्ट्रीय हंगामा… यह असमानता न सिर्फ अन्यायपूर्ण है, बल्कि वैश्विक मानवाधिकार संगठनों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती है.
दीपू की लिंचिंग पर चुप क्यों है दुनिया?
बांग्लादेश के मैमेनसिंह स्थित भालुका इलाके में 18 दिसंबर की शाम दीपू चंद्र दास की बेरहमी से हत्या कर दी गई. 28 वर्षीय दीपू पायोनियर निटवेयर्स फैक्ट्री में काम करते थे. भीड़ ने ईशनिंदा के झूठे आरोप में उन्हें घेरा, लाठियों से पीटा, पेड़ से लटकाया और शव को जला दिया. इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ, जो दिल दहला देने वाला था. दीपू एक साल के बच्चे के पिता थे और 8 सदस्यों वाले परिवार के एकमात्र कमाने वाले.
उनके भाई अपू चंद्र दास ने बताया कि ‘जो मेरे भाई के साथ हुआ, वह कल्पना से परे है. जानवरों के साथ भी ऐसा नहीं होता.’ रैपिड एक्शन बटालियन (RAB) की जांच में साफ हुआ कि दीपू की कोई ईशनिंदक बात नहीं की थी. RAB कमांडर मोहम्मद शम्सुज्जमान ने कहा कि कोई सबूत नहीं मिला, और स्थानीय लोग या सहकर्मी भी ऐसी कोई गतिविधि की पुष्टि नहीं कर सके. इस मामले में अब तक 12 गिरफ्तारियां हुईं हैं, लेकिन अपू पूछते हैं, भीड़ के 140 लोगों का क्या? एफआईआर में सिर्फ 6 नाम क्यों?
बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के गिरने के बाद हिंदू समुदाय पर हमलों की 100 से ज्यादा घटनाएं हो चुकी हैं… मंदिर तोड़े गए, घर लूटे गए, लेकिन वैश्विक मानवाधिकार संगठनों, अमेरिकी सांसदों या ममदानी जैसे नेताओं की तरफ से कोई आवाज नहीं उठी. कोई मोमबत्ती जलाकर विरोध नहीं किया गया. यह चुप्पी क्यों? क्या दीपू की मौत इसलिए कम महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह एक गरीब हिंदू मजदूर था? या इसलिए कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार ‘सामान्य’ हो गए हैं? यह दोहरी नीति मानवाधिकारों की अवधारणा को ही कमजोर करती है.
उमर खालिद पर क्या बोले ममदानी और अमेरिकी सांसद?
दूसरी तरफ, उमर खालिद की हिरासत पर अंतरराष्ट्रीय हंगामा है. न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने उमर को पत्र लिखा, जिसमें कहा, ‘प्रिय उमर, मैं तुम्हारे कड़वाहट न पालने वाले शब्दों को अक्सर याद करता हूं. तुम्हारे माता-पिता से मिलकर खुशी हुई. हम सब तुम्हारे बारे में सोच रहे हैं.’ यह पत्र उमर के माता-पिता से दिसंबर 2025 में अमेरिका में मुलाकात के दौरान लिखा गया. उमर की पार्टनर बनोज्योत्सना लाहिड़ी ने इसे शेयर किया है.
उधर जिम मैकगवर्न, जेमी रस्किन सहित अमेरिका के 8 सांसदों ने भारत के राजदूत को पत्र लिखकर उमर की हिरासत पर सवाल उठाया. उन्होंने जमानत और समयबद्ध ट्रायल की मांग की. मैकगवर्न ने कहा कि उमर के माता-पिता से मिले और भारत के लोकतंत्र का सम्मान करते हुए पूछा कि UAPA के तहत इतनी लंबी हिरासत अंतरराष्ट्रीय मानकों से कैसे मेल खाती है. मैकगवर्न ने अलग पत्र में दिल्ली दंगों से जुड़े लोगों की हिरासत पर चिंता जताई और कहा कि स्वतंत्र जांच में उमर को आतंकवाद से जोड़ने का सबूत नहीं मिला.
मानवाधिकार संगठनों का ये कैसा पाखंड?
हालांकि यहां गौर करने वाली बात यह है कि दिल्ली दंगे से जुड़े मामले में उमर खालिद सहित तमाम आरोपियों को ट्रायल का पूरा मौका दिया जा रहा है. उनकी जमानत याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट तक में सुनवाई हो रही है. उमर को तो बहन की शादी के लिए दिसंबर में ही जमानत मिली थी. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यह असमानता क्यों? दीपू की मौत पर कोई अंतरराष्ट्रीय ध्यान नहीं, जबकि उमर पर सांसद और मेयर सक्रिय हैं. एमनेस्टी इंटरनेशनल और HRW जैसे मानवाधिकार संगठन उमर के मामले पर मुखर हैं, लेकिन बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों पर चुप. यह पाखंड है, जो वैश्विक न्याय की अवधारणा को कमजोर करता है.
अमेरिकी सांसदों की मांग वैध हो सकती है, लेकिन दीपू जैसे मामलों पर चुप्पी पूर्वाग्रह दिखाती है. बांग्लादेश में हिंदू समुदाय डरा हुआ है. दीपू की मौत के बाद परिवार को अंतिम दर्शन तक नहीं करने दिया गया. उमर के मामले में अंतरराष्ट्रीय दबाव न्याय की मांग है, लेकिन दीपू के लिए वैसा कुछ नहीं. यह असमानता मानवाधिकारों की राजनीति है, जो गरीबों और अल्पसंख्यकों को नजरअंदाज करती है. दुनिया को समान न्याय की जरूरत है, न कि चुनिंदा केसों पर हंगामे की. दीपू की मौत पर चुप्पी शर्मनाक है और मानवाधिकार संगठनों को इस पर आत्मचिंतन करना चाहिए.

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