Last Updated:January 08, 2026, 09:58 IST
Somnath Temple: सोमनाथ मंदिर पर 1000 साल पहले मुस्लिम आक्रांताओं ने हमला किया था. हमलावरों ने न केवल मंदिर को नुकसान पहुंचाया था, बल्कि जमकर लूट-खसोट भी मचाई गई थी. अब भाजपा ने जवाहरलाल नेहरू के लिखे 17 पत्र सार्वजनिक किए हैं. इन पत्रों में नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण और उसके उद्घाटन को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज की थीं.
Somnath Temple: सोमनाथ मंदिर पर जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखी चिट्ठी को सार्वजनिक किया गया है. (फाइल फोटो/Reuters) रिपोर्ट: अनिंदय बनर्जी
Somnath Temple: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ की शुरुआत के बाद देश की राजनीति में एक पुराना अध्याय फिर से चर्चा में आ गया है. यह पर्व सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले आक्रमण के 1000 साल पूरे होने के अवसर पर मनाया जा रहा है. इसी बीच सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के लिखे 17 पत्र सार्वजनिक किए हैं. इन पत्रों में नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण और उसके उद्घाटन को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज की थीं. भाजपा का दावा है कि ये पत्र दशकों तक इतिहास के पन्नों में दबे रहे और अब सामने आने के बाद कांग्रेस के लिए असहज स्थिति पैदा कर रहे हैं. इन पत्रों में नेहरू ने तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री लियाकत अली खान से लेकर भारत के राष्ट्रपति और मुख्यमंत्रियों तक को सोमनाथ मंदिर से जुड़े मुद्दों पर अपनी राय लिखी थी. सवाल यह है कि इन पत्रों के सामने आने का आज की राजनीति में क्या मतलब है और इससे कौन से बड़े संकेत मिलते हैं.
सोमनाथ से राम मंदिर तक: कांग्रेस की निरंतर सोच?
साल 2024 में अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन को लेकर कांग्रेस नेतृत्व ने आमंत्रण ठुकरा दिया था. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा था कि राम मंदिर का उद्घाटन भाजपा और आरएसएस ने एक राजनीतिक कार्यक्रम बना दिया है. पार्टी के बयान में कहा गया कि धर्म निजी आस्था का विषय है, लेकिन भाजपा ने इसे चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल किया. अब भाजपा यह तर्क दे रही है कि यही सोच कांग्रेस में पहले भी थी. नेहरू ने 1951 में तत्कालीन राजदूत केएम पणिक्कर को लिखे पत्र में साफ कहा था कि उन्होंने राष्ट्रपति के सोमनाथ मंदिर दौरे के प्रभाव को कम करने की कोशिश की. इसका मतलब यह था कि नेहरू केवल तटस्थ नहीं थे, बल्कि वे इस आयोजन को सीमित रखना चाहते थे. भाजपा का कहना है कि सोमनाथ मंदिर को लेकर नेहरू की सोच और 2024 में राम मंदिर उद्घाटन को लेकर कांग्रेस का रुख, दोनों में एक निरंतरता दिखाई देती है. पार्टी इसे कांग्रेस की पुरानी मानसिकता बता रही है, जबकि कांग्रेस इसे धर्म और राजनीति को अलग रखने की अपनी नीति कहती है.
दावा और ऐतिहासिक विवाद
नेहरू ने 21 अप्रैल 1951 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को लिखे पत्र में सोमनाथ मंदिर के द्वारों से जुड़ी कहानी को पूरी तरह झूठा बताया था. यह वही कहानी है, जिसमें कहा जाता है कि महमूद गजनवी 1026 ईस्वी में सोमनाथ मंदिर से द्वार लूटकर गजनी ले गया था और बाद में अंग्रेजों ने उन्हें भारत लाने की कोशिश की. इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि वे द्वार भारतीय शैली के नहीं थे. ऐसे में नेहरू का संदेह गलत नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन आलोचकों का कहना है कि एक संप्रभु देश के प्रधानमंत्री का इस तरह पड़ोसी देश के नेता को आश्वस्त करना राजनीतिक रूप से संवेदनशील था. भाजपा इस मुद्दे को कांग्रेस के उस रुख से जोड़ रही है, जब 2007 में यूपीए सरकार ने सेतु समुद्रम परियोजना के दौरान सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि राम या रामायण के पात्रों के ऐतिहासिक अस्तित्व का कोई ठोस प्रमाण नहीं है. भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस बार-बार आस्था और परंपरा से जुड़े मुद्दों को खारिज करती रही है.
सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन को लेकर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को भी चिट्ठी लिखी थी. (फाइल फोटो/Reuters)
सोमनाथ यात्रा से पहले सियासी तापमान
भाजपा ने नेहरू के 17 पत्र ऐसे समय पर जारी किए हैं, जब प्रधानमंत्री मोदी 11 जनवरी को सोमनाथ मंदिर जाने वाले हैं. पार्टी ने नई दिल्ली में एक हाई-वोल्टेज प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इन पत्रों को पढ़कर सुनाया और कांग्रेस पर तीखा हमला बोला. भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने आरोप लगाया कि स्वतंत्र भारत में नेहरू ने भगवान सोमनाथ के प्रति सबसे अधिक विरोध का भाव रखा. भाजपा नेताओं का कहना है कि सोमनाथ मंदिर को अतीत में विदेशी आक्रमणकारियों ने लूटा, लेकिन आजादी के बाद भी उसे पूरा सम्मान नहीं मिला. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा प्रधानमंत्री की यात्रा से पहले माहौल बना रही है. गुजरात प्रधानमंत्री का गृह राज्य है और सोमनाथ मंदिर वहां आस्था का बड़ा केंद्र है. ऐसे में मोदी की यात्रा के दौरान कांग्रेस पर तीखा हमला होने की संभावना जताई जा रही है.
इंडिया गठबंधन के लिए भी मुश्किलें
नेहरू के पत्रों के सामने आने से सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, बल्कि उसके सहयोगी दल भी असहज स्थिति में हैं. इंडिया गठबंधन में शामिल तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) और असम के क्षेत्रीय दलों को भी अपने राज्यों में जवाब देना पड़ सकता है. 1951 में मुख्यमंत्रियों को लिखे एक पत्र में नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन में “धूमधाम और समारोह” पर नाराजगी जताई थी. उन्होंने कहा था कि इससे विदेशों में भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को नुकसान पहुंचता है. उन्होंने यहां तक निर्देश दिए थे कि सोमनाथ ट्रस्ट की ओर से पवित्र नदी का जल भेजने के अनुरोधों पर दूतावास ध्यान न दें. भाजपा अब इन पत्रों को स्थानीय भाषाओं में प्रचारित कर रही है. पार्टी का मानना है कि भले ही तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल या असम के लोग सोमनाथ मंदिर न गए हों, लेकिन वे इसे हिंदू आस्था के प्रतीक के रूप में देखते हैं. ऐसे में कांग्रेस और उसके सहयोगियों को जवाब देना मुश्किल हो सकता है.
इतिहास, आस्था और राजनीति का टकराव
सोमनाथ मंदिर का इतिहास भारत की सांस्कृतिक स्मृति से गहराई से जुड़ा है. एक ओर इसे बार-बार टूटने और फिर खड़े होने का प्रतीक माना जाता है, तो दूसरी ओर इसे लेकर राजनीतिक बहस भी लगातार चलती रही है. नेहरू आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष भारत की कल्पना करते थे, जहां राज्य धार्मिक आयोजनों से दूरी बनाए रखे. आज भाजपा उसी इतिहास को नए नजरिए से पेश कर रही है. पार्टी का कहना है कि यह केवल नेहरू की आलोचना नहीं, बल्कि उस सोच पर सवाल है जिसने हिंदू प्रतीकों को सार्वजनिक जीवन से दूर रखने की कोशिश की. जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, यह बहस और तेज होने की संभावना है. सोमनाथ मंदिर, जो कभी इतिहास का विषय था, अब फिर से वर्तमान राजनीति के केंद्र में आ गया है. यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता इसे इतिहास की बहस मानती है या आज की राजनीति का हिस्सा.
Location :
New Delhi,Delhi
First Published :
January 08, 2026, 09:50 IST

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