नई दिल्ली: देश की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है. नेता जब तक अपनी पार्टी में रहते हैं, चेहरे पर पार्टी को लेकर काम करने की इच्छा और भाषणों में विचारधारा दिखाई देती है. लेकिन जैसे ही वे नया राजनीतिक चोला पहनते हैं आंखें नम हो जाती हैं. आवाज भर्रा जाती है और पूरा माहौल भावुकता से भर उठता है. मानों पार्टी बदलना नहीं किसी जिंदगी-भर की तपस्या का त्याग हो. यह कहानी इतना बार रिपीट हो चुकी है कि जनता अब इसे एक तरह का पॉलिटिकल इमोशनल रूटीन मानने लगी है.
यही वजह है कि चोला बदलते ही आंखों में सैलाब अब सिर्फ एक जुमला नहीं, बल्कि राजनीति की नई पहचान बन गया है. तर्क और विचारधारा जहां पीछे छूट गए हैं, वहीं आंसू और भावनाओं की स्क्रिप्ट फ्रंट सीट पर आ गई है. सवाल यह है कि यह संवेदनशीलता अचानक जागती क्यों है? क्या यह वाकई मन का दर्द है या सत्ता के गलियारों में बदलती हवा का असर? इसी बदलती राजनीति को समझने के लिए हाल के कुछ चर्चित उदाहरण एक रोचक तस्वीर पेश करते हैं.
कैलाश गहलोत: सत्ता से मोहभंग या जवाबदेही का बोझ?
दिल्ली के पूर्व मंत्री कैलाश गहलोत ने जैसे ही नई पार्टी का दामन थामा, उनका गला भर आया. वे मुद्दे जिन्हें कल तक वे मजबूती से डिफेंड करते थे जैसे मुख्यमंत्री आवास या ‘शीशमहल’ अब उनके लिए असहज सच बन गए. उन्होंने कहा कि वे दबाव में नहीं, मूल्य-गिरावट से आहत हैं. पर राजनीति में यह बदलाव नया नहीं… भावनाओं का उभार कई बार जिम्मेदारी से ज्यादा सुविधाजनक लगता है. कैलाश गहलोत के अलावा दिल्ली के पार्टी उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय प्रवक्ता और विधानसभा की याचिका एवं अनुमान समिति के पूर्व अध्यक्ष राजेश गुप्ता ने भी भाजपा का दामन थाम है. वह भी भावुक हुए हैं.
दिल्ली आम आदमी पार्टी के नेता ने भाजपा का दामन थामा. (BJP4India)
ज्योतिरादित्य सिंधिया: ‘घुटन’ से निकले या सत्ता का रास्ता चुना?
कांग्रेस में दशकों तक प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 2020 में दल-बदल किया. उनका भावुक बयान था, आज मन बहुत व्यथित है. लेकिन यह व्यथा उस समय प्रकट हुई जब मध्य प्रदेश की राजनीति में बदलते समीकरण उनके पक्ष में नहीं थे.
एकनाथ शिंदे: बगावत, भावुकता और सत्ता का संतुलन
महाराष्ट्र में शिवसेना के विभाजन के समय एकनाथ शिंदे के हर कदम के साथ भावनाएं भी जुड़ी रहीं. एक तरफ वे बालासाहेब ठाकरे की सीख का हवाला देते दिखे. दूसरी ओर राजनीतिक समीकरण भी उनकी राह आसान बना रहे थे. उनकी भावुकता ने उन समर्थकों को जोड़ने में मदद की जो बगावत को समझ नहीं पा रहे थे.
उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे.
गुलाम नबी आजाद: भावनाएं, नाराजगी और नई राह
राज्यसभा की विदाई में आंखें नम होने से शुरू हुआ उनका सफर तब मोड़ लेता है जब वे कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी बनाते हैं. रैलियों में उनके कई भाषणों में पुरानी यादें, भावनाएं और शिकायतें सब एक साथ नजर आती हैं. यह घटनाक्रम बताता है कि भावुकता कई बार पुराने रिश्तों को सम्मान देने का तरीका भी बन जाती है.
अशोक चव्हाण: आरोपों की छाया और नई शुरुआत की संवेदनशीलता
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने जब दल-बदल किया, तो उन्होंने इसे कठिन फैसला बताया. मीडिया के सामने उनकी झुकी निगाहें और भारी आवाज एक संदेश दे रही थी कि यह कदम सोच-समझकर उठाया गया है. पर राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, नया मंच अक्सर पुरानी मुश्किलों को पीछे छोड़ने का अवसर भी देता है.
राजनीति में भावुक दल-बदल क्यों बढ़ रहा है?
नेता जानते हैं कि भावनाएं जनता को जल्दी प्रभावित करती हैं. दल-बदल को मजबूरी की तरह दिखाने के लिए भावुकता आसान रास्ता है. आंसुओं से पुराने समर्थकों की नाराजगी कम होती है. मीडिया कवरेज में भावनात्मक दृश्य ज्यादा प्रमुखता पाते हैं. सत्ता-विपक्ष की राजनीति में विक्टिम नैरेटिव अक्सर रणनीति का हिस्सा बनता है.हालिया सालों में प्रमुख दल-बदल और भावनाओं की भूमिका
| नेता का नाम | साल | प्रमुख भावुक बयान | राजनीतिक संदर्भ |
| कैलाश गहलोत | 2025 | मूल्य-गिरावट से आहत | दिल्ली राजनीति, नई पार्टी में प्रवेश |
| ज्योतिरादित्य सिंधिया | 2020 | मन बहुत व्यथित है | मध्य प्रदेश सत्ता संघर्ष |
| एकनाथ शिंदे | 2022 | शिवसैनिक होने की दुहाई | शिवसेना विभाजन |
| अशोक चव्हाण | 2024 | कठिन फैसला बताया | महाराष्ट्र राजनीति |
| गुलाम नबी आजाद | 2022 | धोखे और यादों का जिक्र | नई पार्टी का गठन |
राजनीति की ‘भावुकता’ के 5 पैटर्न
दल-बदल को हमेशा “मजबूरी” बताया जाता है. पुराने नेताओं के प्रति सम्मान प्रकट करना अनिवार्य-सा हो गया है. भावुकता से पुराने वोटरों को मैसेज भेजा जाता है. मीडिया कवरेज में भावनात्मक दृश्य सुर्खियां बनाते हैं. नए राजनीतिक समीकरणों में भावनाएं रणनीति का हिस्सा बन चुकी हैंजनता अब समझदार
राजनीति में आंसू अब सिर्फ संवेदनाओं का प्रतीक नहीं, बल्कि रणनीति का हिस्सा बन चुके हैं. लेकिन 2024–25 का भारत पहले जैसा नहीं जनता भावनाओं के पीछे छिपे राजनीतिक गणित को पहचानने लगी है. दल-बदल चाहे जो भी कारणों से हो, लेकिन चोला बदलते ही आंखों में सैलाब अब लोगों को उतना प्रभावित नहीं कर पाता जितना पहले करता था.

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