क्यों आने वाले समय में हमारा खाना ही बन जाएगा जहर, चावल होगा पहले नंबर पर

19 hours ago

एक नई रिसर्च से पता चला है कि जैसे-जैसे गर्मी और CO2 का स्तर बढ़ता जा रहा है, चावल आर्सेनिक की ज्यादा मात्रा को अवशोषित कर रहा है, जिससे यह कहीं अधिक विषैला और घातक बन रहा है. लिहाजा ऐसा लग रहा है कि अगर इसी तरह चावल में अर्सेनिक की मात्रा बढ़ती रही तो वह जहर हो जाएगा.

ऐसा लगता है कि जलवायु परिवर्तन खासकर चावल को ही नया रूप दे रहा है जो अरबों लोगों का जीवनयापन का साधन है. कोलंबिया विश्वविद्यालय के नेतृत्व में किए गए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन और द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ में प्रकाशित शोध से पता चलता है कि गर्म और कार्बन-युक्त वातावरण के कारण चावल में अकार्बनिक आर्सेनिक की मात्रा बढ़ जाती है, ये एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला तत्व है जो भूजल में मौजूद होता है.

इसके एक बार आहार के माध्यम से शरीर में प्रवेश करने पर, यह विषैला पदार्थ शरीर पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है, जिससे हृदय रोग, मधुमेह और कई प्रकार के कैंसर जैसी बीमारियां हो सकती हैं.

गर्मी और कार्बन डाइऑक्साइड कैसे मिट्टी को बदल रहे हैं

चीन के यांग्त्ज़ी नदी डेल्टा में धान के खेतों पर एक दशक से अधिक समय तक किए गए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि उच्च तापमान और कार्बन डाइऑक्साइड के बढ़ते स्तर ने धान की खेती के तरीके को बदलता है. असल में इस वजह से बदलाव मिट्टी में ही होता है. जो चावल में पहुंचने लगता है. चावल की बाढ़-सिंचाई वाली खेती मिट्टी और भूजल से आर्सेनिक को घुलनशील बनाती है, जो अन्य फसलों से 10-20 गुना अधिक होता है.

कौन से देश में होगी सबसे बड़ी दिक्कत

वैसे ये समस्या केवल चीन की ही नहीं है. यही खतरा बांग्लादेश, भारत, इंडोनेशिया, म्यांमार, फिलीपींस और वियतनाम सहित पूरे एशिया में बनने लगा है.

अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन मौजूदा रफ्तार से बढ़ता रहा, तो शोधकर्ताओं का कहना है कि 2050 तक चावल में आर्सेनिक का स्तर खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है. चीन में 2050 तक 1.93 करोड़ कैंसर मामले अनुमानित हैं. भारत के प्रदूषित क्षेत्रों जैसे छत्तीसगढ़ में यह समस्या गंभीर है.

वियतनाम और इंडोनेशिया सबसे खतरनाक क्षेत्र माने जा रहे हैं, जहां आर्सेनिक की मात्रा सबसे अधिक होने की आशंका है. इससे फेफड़े, त्वचा और मूत्राशय के कैंसर में भारी वृद्धि होगी, बच्चों में मस्तिष्क संबंधी विकार का खतरा बढ़ जाएगा.

इससे कैसे बच सकते हैं

तो हम इस भयावह स्थिति से कैसे बच सकते हैं? वैश्विक उत्सर्जन को कम करने के अलावा, वैज्ञानिक चावल की ऐसी नई किस्में विकसित करने का सुझाव देते हैं जो प्राकृतिक रूप से आर्सेनिक के जमाव को रोकती हैं. वैज्ञानिक इसके लिए काम कर रहे हैं. फिर बासमती ऐसा चावल है, जिसमें कम आर्सेनिक होता है; ब्राउन राइस से बचें. चावल को अधिक पानी में धोकर उबालें.

क्या ऐसा दूसरे अनाज के साथ भी हो रहा है

वायु प्रदूषण और बढ़ते कार्बन डाइऑक्साइड स्तर से खेतों में उगने वाली दालें, गेहूं और सब्जियां पूरी तरह जहर नहीं बनेंगी, लेकिन ये अपना पोषण मूल्य यानि पौष्टिकता खो देंगी. कुछ मामलों में इनमें हानिकारक तत्व बढ़ सकते हैं, जिससे हेल्थ खतरे में आ सकती है, क्योंकि ये माना जा रहा है कि इस स्थिति से इनमें प्रोटीन, आयरन और जिंक जैसे पोषक तत्वों की कमी हो जाएगी.

उच्च CO₂ स्तर से फसलों में सीसा जैसे जहरीले तत्व बढ़ जाएंगे, जिसके लंबे सेवन से बच्चों और गर्भवती महिलाओं को खतरा हो सकता है. इनकी फसलें खाने योग्य बेशक रहें लेकिन पोषण असंतुलन कुपोषण को बढ़ावा दे सकता है. इससे दुनिया भर में कुपोषण का खतरा बढ़ जाएगा, खासकर उन देशों में जहां लोग मुख्य रूप से अनाज पर निर्भर हैं. भारत जैसे प्रदूषण-प्रभावित क्षेत्रों में गेहूं और दालों पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ने की आशंका है.

दरअसल बढ़ता प्रदूषण पौधों को यह उनके पोषक तत्वों को सोखने की क्षमता को कम कर देता है. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के शोध के अनुसार गेहूं, चावल और जौ में प्रोटीन, जिंक और आयरन की मात्रा 5% से 15% तक कम हो सकती है.

वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मक्का सबसे अधिक प्रभावित होने वाली फसलों में से एक होगी. तापमान बढ़ा तो मक्के की फसल में काफी गिरावट आ जाएगी. भविष्य की फल और सब्जियां भी आज की तुलना में कम स्वास्थ्यवर्धक हो सकती हैं.

क्या होंगी फिर भविष्य के अनाज

मिलेट्स यानि बाजरा, ज्वार, रागी जैसी फसलें जिन्हें अब “सुपरफूड” और “स्मार्ट क्रॉप” कहा जा रहा है, वो जलवायु परिवर्तन के खिलाफ सबसे मजबूत हैं. इनमें कम पानी की जरूरत होती है. ये अधिक तापमान में आसानी से उग सकते हैं.पोषक तत्वों से भरपूर भी होती हैं. ये आयरन, कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे मिनरल्स से भरपूर होती हैं. जो बढ़ते हुए कॉर्बन डायऑक्साइड के प्रभाव से सुरक्षित रहती हैं.

कुछ दालें भी बेहतर काम करेंगी, जैसे चना, मूंग और अरहर जैसे पौधे हवा से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में वापस डालते हैं. इससे रासायनिक खाद की जरूरत कम पड़ती है.इनकी जड़ें गहरी होती हैं, जो जमीन के अंदर से नमी सोखने में सक्षम होती हैं.

समुद्री घास बनेगी भविष्य का बड़ा खाना

समुद्री घास भविष्य का एक बहुत बड़ा खाद्य स्रोत बन सकती है. ये जमीन पर मौजूद पेड़ों की तुलना में कहीं ज्यादा तेजी से कार्बन डाइऑक्साइड सोखती है. उन्हें उगाने के लिए ना तो जमीन चाहिए और न ही मीठे पानी की जरूरत है. ये विटामिन और ओमेगा-3 फैटी एसिड का बेहतरीन स्रोत है.

शकरकंद को “तबाही से बचाने वाली फसल” कहा जा रहा है. चूंकि ये जमीन के नीचे उगती है, इसलिए यह तेज हवाओं और चक्रवात जैसी आपदाओं से सुरक्षित रहती है. इसमें विटामिन ए खूब होता है. ये कुपोषण से लड़ने में बहुत मददगार है.

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