असम में मियां और मुसलमान में क्या है फर्क, क्यों मचा है बवाल? जानें पूरा इतिहास

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Last Updated:January 30, 2026, 11:15 IST

Miyan Vs Muslim Controversy Assam: असम में मियां और मुसलमान के फर्क ने 2026 चुनाव से पहले बड़ा बवाल खड़ा कर दिया है. भाषा, मूल और पहचान के आधार पर खिंची यह रेखा बेदखली, राजनीति और सामाजिक तनाव का कारण बन रही है. जानें पूरा इतिहास और विवाद की असली वजह.

असम में मियां और मुसलमान में क्या है फर्क, क्यों मचा है बवाल? जानें इतिहासअसम मियां और मुसलमान विवाद क्या है?

Miyan Vs Muslim Controversy Assam: असम में ‘मियां’ और ‘मुसलमान’ आज सिर्फ पहचान के शब्द नहीं रहे. अब ये राजनीति की सबसे धारदार भाषा बन चुके हैं. 2026 के विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं. चुनावी मंच सजने से पहले ही माहौल गरम हो चुका है. ऐसे में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक बयान दे दिया. इसके बाद फिर क्या था इस भाषण ने माहौल को और गरमा दिया. सवाल सीधा है कि क्या असम के सभी मुसलमान एक जैसे हैं? जवाब है नहीं. लेकिन राजनीति ने इस फर्क को इतना गहरा कर दिया है कि यह सामाजिक तनाव, बेदखली अभियान और वोट बैंक की लड़ाई का रूप ले चुका है. असम में मुस्लिम आबादी करीब 34 से 40 प्रतिशत मानी जाती है. लेकिन चुनावी बहस में पूरी आबादी को एक नजर से नहीं देखा जा रहा. यहीं से विवाद शुरू होता है.

‘मियां’ शब्द कभी सम्मानसूचक था. आज असम में यह आरोप बन चुका है. अवैध घुसपैठ का. जमीन कब्जाने का. जनसंख्या बदलने का. सरकार और विपक्ष आमने-सामने हैं. इंडियान एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार एक तरफ दावा है कि असमिया पहचान खतरे में है. दूसरी तरफ आरोप है कि भाषा और मूल के नाम पर मुसलमानों को बांटा जा रहा है. यह बहस सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं है. इसका असर जमीन पर दिख रहा है. घर टूट रहे हैं. परिवार उजड़ रहे हैं और चुनावी रणनीति खुलकर सामने आ रही है.

मूल फर्क क्या है: मियां बनाम मुसलमान

असम में मुसलमान एक समान समूह नहीं हैं. पहला वर्ग है खिलोंजिया या असमिया मुसलमान. ये सदियों से असम में रहते आए हैं. असमिया भाषा बोलते हैं. असमिया संस्कृति में रचे-बसे हैं. गोरिया, जुल्हा, सैयद जैसे समुदाय इसमें आते हैं. इन्हें असमिया समाज का हिस्सा माना जाता है. दूसरा वर्ग है मियां मुसलमान. ये मुख्य रूप से बंगाली भाषी हैं. इनके पूर्वज ब्रिटिश काल में या 1947 और 1971 के बाद पूर्वी बंगाल और बांग्लादेश से आए. ये ब्रह्मपुत्र घाटी के निचले इलाकों में बसे. खेती-किसानी इनकी आजीविका है.

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक बार फिर विवादास्पत बयान दिया है.

क्या मियां और असमिया मुसलमान कानूनी रूप से अलग हैं?

नहीं. संविधान में ऐसा कोई अलग वर्ग नहीं है. फर्क सामाजिक और राजनीतिक है. सरकार मूल और भाषा के आधार पर पहचान तय कर रही है, जबकि कानून नागरिकता के दस्तावेज देखता है.

मियां समुदाय को क्यों निशाने पर?

सरकार का दावा है कि बांग्लादेशी घुसपैठ से असम की जनसंख्या संरचना बदल रही है. मियां मुसलमानों को उसी घुसपैठ से जोड़कर देखा जा रहा है. यही वजह है कि बेदखली और जांच का फोकस इसी वर्ग पर है.

इसका 2026 चुनाव पर क्या असर पड़ेगा?

बड़ा असर पड़ेगा. यह पहचान की राजनीति है. ध्रुवीकरण तेज होगा. बीजेपी इसे असमिया अस्मिता की लड़ाई बना रही है, जबकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का मुद्दा बना रहा है.

’मियां’ शब्द विवाद क्यों बन गया?

दक्षिण एशिया में ‘मियां’ कभी सम्मान का शब्द था. लेकिन असम में यह धीरे-धीरे गाली बन गया. इसे ‘अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए’ के पर्याय की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा. बीजेपी सरकार का तर्क है कि यही वर्ग असम की डेमोग्राफी बदल रहा है. मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा खुले तौर पर कहते हैं कि मियां असमिया मुसलमान नहीं हैं. इसी महीने में उनके ‘मियां को परेशान करो’ वाले बयान ने विवाद को चरम पर पहुंचा दिया.

राजनीति, बेदखली और चुनावी गणित

सरकार अवैध घुसपैठ के खिलाफ सख्त कार्रवाई का दावा कर रही है. बेदखली अभियान चल रहे हैं. हजारों परिवार बेघर हुए हैं. वोटर लिस्ट रिवीजन और जनगणना की तैयारी चल रही है. रणनीति साफ दिखती है असमिया हिंदू और इंडिजिनस मुसलमानों को एक मंच पर लाना, और मियां को अलग करके ‘घुसपैठिया’ की पहचान देना. विपक्ष इसे सीधा मुस्लिम टारगेटिंग बता रहा है.

पहचान की लड़ाई

असम में मियां और मुसलमान का फर्क अब सिर्फ इतिहास या अकादमिक बहस नहीं रह गया है. यह सीधे तौर पर राज्य की मौजूदा राजनीति, प्रशासनिक कार्रवाइयों और सामाजिक रिश्तों को प्रभावित कर रहा है. बेदखली अभियान, नागरिकता की जांच, वोटर लिस्ट में आपत्तियां और जनगणना की तैयारी—हर कदम इसी पहचान की बहस से जुड़ता दिख रहा है. राजनीतिक दल इसे असमिया अस्मिता बनाम घुसपैठ की लड़ाई के रूप में पेश कर रहे हैं, जबकि प्रभावित समुदाय इसे अस्तित्व और अधिकारों का सवाल बता रहा है. 2026 के विधानसभा चुनाव इस मुद्दे को और तेज करेंगे. यही चुनाव तय करेंगे कि यह बहस सिर्फ चुनावी नारे तक सीमित रहेगी या असम की सामाजिक संरचना पर लंबे समय तक असर छोड़ेगी.

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Sumit Kumar

सुमित कुमार News18 हिंदी में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं. वे पिछले 3 साल से यहां सेंट्रल डेस्क टीम से जुड़े हुए हैं. उनके पास जर्नलिज्म में मास्टर डिग्री है. News18 हिंदी में काम करने से पहले, उन्ह...और पढ़ें

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January 30, 2026, 11:15 IST

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