अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए क्यों नुकसानदेह है बाल विवाह?

1 hour ago

पिछली सदी के आखिरी दशक से ही यह माना जाने लगा था कि शिक्षा, तकनीकी प्रगति और इससे आए बदलावों के नतीजे में इक्कीसवी सदी महिलाओं की सदी होगी. यह कुछ हद तक सही भी है. आज एशिया और अफ्रीका के रूढ़िवादी समाजों में भी महिलाओं की शैक्षणिक स्थिति में सुधार हुआ है व कार्यबल में उनकी भागीदारी बढ़ी है. इंटरनेट व सूचनाओं के प्रसार की वजह से आज हम महिलाओं के अधिकारों व लैंगिक समानता के प्रति पहले से कहीं अधिक जागरूक हैं. लेकिन यह भी सही है कि काफी हद तक यह संवेदनशीलता यौन उत्पीड़न, दहेज हत्या, सम्मान हत्या, भ्रूण हत्या व लैंगिक असमानता तक सीमित है. यह अभी तक बाल विवाह जैसी मूलभूत समस्या तक नहीं पहुंचा है जो लड़कियों के स्वास्थ्य, शिक्षा और उनके भविष्य पर असर डालने के साथ ही देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी नुकसानदेह है.

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे – (2019-21) के आंकड़ों के अनुसार भारत में 20 से 24 वर्ष के बीच की 23.3 प्रतिशत युवतियों का विवाह 18 वर्ष से कम उम्र में हो गया था. यानी ईक्कीसवीं सदी का एक चौथाई पूरा हो जाने के बावजूद आज भी देश में लगभग हर चौथी लड़की को बाल विवाह के दलदल में झोंक दिया जाता है. बाल अधिकारों के लिए काम कर रहे एक गैरसरकारी संगठन इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन की जुलाई 2024 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार देश में हर मिनट तीन लड़कियों का बाल विवाह होता है जबकि रोजाना सिर्फ तीन मामले ही दर्ज हो पाते हैं. इस तरह, देश में हर साल लगभग 16 लाख बच्चियों का भविष्य बाल विवाह की बलि चढ़ जाता है. हालांकि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2018-2022 के आंकड़ों के अनुसार इस दौरान बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (पीसीएमए) 2006 के तहत देश भर में सिर्फ 3,863 मामले दर्ज किए गए. रिपोर्ट बताती है कि इनमें भी 2022 तक सिर्फ 181 मामलों का निपटारा हो पाया. यानी लगभग 92 प्रतिशत मामले लंबित हैं और दोषसिद्धि की दर सिर्फ 11 प्रतिशत है.

यह एक समाज के रूप में यह हमारी नाकामी है. साथ ही, यह देश के लिए शिक्षा-स्वास्थ्य संकट भी है जो अंतत: अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह साबित होता है. आंकड़े बताते हैं कि 18 वर्ष से पूर्व ब्याही गई लड़कियों में से सिर्फ 19 प्रतिशत ही माध्यमिक शिक्षा पूरी कर पाती हैं. यानी बाल विवाह लड़कियों के कौशल विकास और श्रम बल में उनकी भागीदारी के लिए एक सीधा और प्रत्यक्ष खतरा है. इसका असर जीवन भर बाल विवाह पीड़िता के लिए आर्थिक नुकसान के रूप में दिखता है. तमाम शोध व अध्ययन बताते हैं कि 18 से कम उम्र की ब्याहताओं की सालाना आमदनी बालिग होने के बाद शादी करने वाली लड़कियों के मुकाबले आधी होती है. शादी के बाद पढ़ाई छूट जाने व कम उम्र में मातृत्व के नतीजे में बाल विवाह पीड़िताएं अपने जीवन काल में बालिग उम्र में शादी करने वाली लड़कियों के मुकाबले 9 प्रतिशत कम कमाती हैं.

बाल विवाह देश के एक स्वास्थ्य संकट भी है. कम उम्र में विवाह के नतीजे में कम उम्र में गर्भावस्था और किशोर उम्र में गर्भावस्था का परिणाम होता है लड़की की जान को खतरा, बच्चों में कुपोषण, विकलांगता और शिशु मृत्युदर में बढ़ोतरी. भारत में वर्ष 2008 से 2016 के बीच नौ सालों में 68 लाख बच्चे जन्म लेने के बाद 28 दिन के भीतर मृत्यु के शिकार हो गए. इनमें बड़ी संख्या उन बच्चों की है जिनकी माताएं खुद किशोर थीं.

बाल विवाह का एक परिणाम जनसंख्या विस्फोट के रूप में सामने आता है. दुनिया के 15 देशों में किए गए एक अध्ययन के अनुसार 13 साल की उम्र में ब्याही गई बच्चियों की 18 वर्ष की उम्र में ब्याही गई बच्चियों के मुकाबले प्रजनन दर 26 प्रतिशत ज्यादा होती है.

लेकिन इसके नतीजे शिक्षा, स्वास्थ्य व जनसंख्या वृद्धि से कहीं ज्यादा पूरी अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक हैं. विश्व बैंक और इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वूमेन (आईसीआरडब्ल्यू) ने 2017 में अपनी तरह के एक पहले अध्ययन में अनुमान लगाया कि यदि 2014 में दुनिया से बाल विवाह का खात्मा हो गया हो होता तो 2030 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में चार खरब डॉलर का इजाफा होता. यदि 2015 तक बाल विवाह का खात्मा हो जाता तो अगले 15 वर्ष में दुनिया के 15 देशों में लोगों की जीवन भर की कमाई में 26 अरब डॉलर का इजाफा होता. साथ ही, जनसंख्या पर नियंत्रण से 2030 तक वैश्विक लाभ सालाना 500 अरब डॉलर तक पहुंच जाता. रिपोर्ट कहती है कि बाल विवाह के नतीजे में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर व कुपोषण जैसी समस्याओं पर काबू पा लिया जाए तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में 2030 तक सालाना 90 अरब डॉलर का इजाफा हो सकता है.

वर्ष 2017 में आई एक शोध रिपोर्ट ‘इकोनॉमिक एंड हेल्थ कॉस्ट्स ऑफ चाइल्ड मैरेज इन इंडिया’ के अनुसार बाल विवाह के कारण सेहत व अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर हुई दिक्कतों के कारण भारत को 1,899 अरब रुपये का नुकसान हुआ जो सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का 1.68 प्रतिशत था. यानी अगर हम बाल विवाह को पूरी तरह खत्म कर दें तो जीडीपी में एक से दो प्रतिशत की बढ़ोतरी स्वत: ही हो जाएगी.

यह स्पष्ट है कि बाल विवाह सीधे तौर से गरीबी व अशिक्षा से जुड़ा है. भारत में 40 प्रतिशत बाल विवाह पीड़िताएं आर्थिक दृष्टि से हाशिये के परिवारों की हैं. ये वो परिवार हैं जिन्हें आर्थिक परेशानियों व सुरक्षा संबंधी संकटों के कारण बेटी को पढ़ाने के बजाय उसका विवाह कर देना बेहतर विकल्प लगता है. लेकिन यह अंतत: गरीबी के दुष्चक्र को ही बढ़ावा देता है. दूसरा, बाल विवाह पीड़िताओं में 48 प्रतिशत बच्चियां वो हैं जो कभी स्कूल नहीं गईं या पढ़ाई छोड़ चुकी थीं. ऐसे में यदि लड़कियों को बाल विवाह से बचाना है तो उन्हें स्कूल में बनाए रखना होगा और आर्थिक दृष्टि से संवेदनशील परिवारों को सरकारी योजनाओं से जोड़ना होगा.

बच्चियों के पढ़ाई छोड़ने और नतीजे में उनके बाल विवाह का अर्थव्यवस्था पर नुकसान का आंकलन करते हुए विश्व बैंक ने कहा कि बालिकाओं की शिक्षा पर किया गया निवेश, किसी भी देश के लिए सबसे अधिक लाभ देने वाला निवेश है क्योंकि पढ़ी-लिखी लड़की केवल आत्मनिर्भर नहीं बनती, वह अर्थव्यवस्था को गति देती है. निश्चित रूप से सरकार इस बात को समझ रही है और नीति आयोग ने नागरिक समाज संगठनों के साथ मिल कर कुछ अहम कदम उठाए हैं. नीति आयोग के साथ मिलकर बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए नागरिक समाज संगठनों का देश का सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) कानूनी हस्तक्षेपों के जरिए बाल विवाह को रोकने और लड़कियों को स्कूल में बनाए रखने और बाल विवाह की दृष्टि से संवेदनशील परिवारों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने की दिशा में काम कर रहा है. जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के 250 से भी ज्यादा सहयोगी संगठनों ने देश के 451 जिलों में कानून लागू करने वाली एजेंसियों के साथ करीबी समन्वय से अप्रैल 2023 से अब तक 4,00,000 से अधिक बाल विवाह रोके हैं. इनके प्रयासों से महज एक साल में ही सात लाख से अधिक लड़कियां स्कूल लौटीं और आर्थिक दृष्टि से 21 लाख संवेदनशील परिवार सरकारी योजनाओं से जोड़े गए.

ये प्रयास बाल विवाह के खात्मे की दिशा में निश्चित रूप से अहम साबित होंगे लेकिन इन्हें और गति देने की आवश्यकता है. साथ ही, 14 वर्ष की आयु तक मुफ्त शिक्षा के अधिकार का दायरा बढ़ाकर 18 साल कर देने से क्रांतिकारी बदलाव हो सकते हैं. यदि विकसित भारत के संकल्प को पूरा करना है तो बाल विवाह के पूरी तरह खात्मे का कोई विकल्प नहीं है. बाल विवाह और कुछ नहीं बल्कि विवाह की आड़ में बच्चों से बलात्कार है. इसके नतीजे उन्हें सिर्फ व्यक्तिगत रूप से ही नहीं बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भुगतने पड़ते हैं. इसलिए हमें स्पष्ट होना होगा कि बाल विवाह अर्थव्यव्यवस्था के लिए खतरा है और इसकी रोकथाम में आज किया गया निवेश कल समृद्ध भविष्य की गारंटी है.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)

ब्लॉगर के बारे में

अनिल पांडेय

अनिल पांडेय

अनिल पांडेय मीडिया रणनीतिकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं। वह जनसत्ता से लेकर स्टार न्यूज और द संडे इंडियन के साथ काम कर चुके हैं। देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक नब्ज को अच्छे से समझने वाले चुनिंदा पत्रकारों में शुमार हैं।

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