SIR से नर्वस क्यों हैं ममता बनर्जी? 1 करोड़ वोटों का 'गणित' बिगाड़ देगा TMC का खेल!

7 hours ago

एसआईआर बिहार में हुआ, राजस्‍थान- यूपी में हुआ, तम‍िलनाडु से लेकर कई राज्‍यों में हुआ, लेकिन उतना हंगामा नहीं मचा, ज‍ितना पश्च‍िम बंगाल में हो रहा है. बिहार में सियासी बवाल जरूर हुआ, क्‍योंक‍ि वहां चुनाव सिर पर थे, लेकिन बंगाल में तो चुनाव में अभी वक्‍त है, फ‍िर मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी इतनी नर्वस क्‍यों हैं? कहीं इसके पीछे वोट सरकने का खेल तो नहीं.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस एसआईआर को लेकर आक्रामक हैं. बंगाल में तो लड़ाई लड़ ही रही हैं, सुप्रीम कोर्ट में भी इसे घसीट रही हैं. बार-बार इसे अलग अलग तरीके से पेश क‍िया जा रहा है. हालत यहां तक आ पहुंची क‍ि सोमवार को सीजेआई को यहां तक कहना पड़ा क‍ि क्या हमारे पास बंगाल के अलावा और कोई काम नहीं? ममता का सीधा आरोप है कि बीजेपी चुनाव आयोग और और केंद्रीय एजेंसियों के कंधे पर बंदूक रखकर वोट चोरी की साजिश रच रही है. लेकिन इस घबराहट के पीछे का असली कारण केवल आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि वे आंकड़े हैं जो बंगाल की सत्ता के समीकरण को पूरी तरह ध्वस्त करने की क्षमता रखते हैं.

1 करोड़ वोटों का खेल

TMC के सूत्रों और चुनाव आयोग को लिखी गई चिट्ठी के अनुसार, बंगाल एसआईआर में अब तक लगभग 63.66 लाख लोगों के नाम वोटर ल‍िस्‍ट से या तो हटाए जा चुके हैं या फ‍िर उन पर आपत्ति जताई गई है. पार्टी का अनुमान है कि आने वाले दिनों में यह संख्या 40 लाख और बढ़ सकती है.

यदि कुल 1 करोड़ वोट कट जाते हैं, तो यह बंगाल के चुनावी इतिहास का सबसे बड़ा उलटफेर होगा. बंगाल की राजनीति‍ पर पकड़ रखने वाले जानकारों का मानना है क‍ि इनमें से बहुसंख्यक वोट TMC के पारंपरिक वोट बैंक से जुड़े हैं.

हर सीट पर 23,000+ का झटका

पश्चिम बंगाल में विधानसभा की 294 सीटें हैं. यदि 1 करोड़ वोट कटते हैं, तो औसतन हर विधानसभा सीट पर लगभग 34,000 वोट कम हो जाएंगे. वहीं लोकसभा के लिहाज से देखें तो हर सीट पर औसतन 2.38 लाख वोट गायब हो सकते हैं.

बंगाल में हार-जीत का अंतर अक्सर बहुत कम होता है. ऐसे में हर सीट पर हजारों वोटों का कम होना ममता बनर्जी के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है. विशेषकर उन सीटों पर जहां मुस्लिम आबादी या शरणार्थी आबादी अधिक है, वहां असर सबसे घातक होने की संभावना है.

ममता बनर्जी की नाराजगी के 3 मुख्य कारण

TMC का आरोप है कि चुनाव आयोग ने कानून तोड़कर ERO यानी इलेक्शन रजिस्ट्रेशन ऑफिसर की शक्तियां छीनकर DEO और माइक्रो-ऑब्जर्वर के हाथों में दे दी हैं. पार्टी का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और व्हाट्सएप के जरिए मौखिक आदेश दिए जा रहे हैं. तृणमूल का दावा है कि ग्राम पंचायत सर्टिफिकेट और आवास परियोजना के कागजों जैसे वैध दस्तावेजों को वोटर लिस्ट वेरिफिकेशन के लिए स्वीकार नहीं किया जा रहा है. ममता बनर्जी का मानना है कि यह जानबूझकर गरीब और ग्रामीण वोटरों को निशाना बनाने की साजिश है. धर्मतला के धरने से ममता ने सीधा हमला बोला कि बीजेपी एनआईए, ईडी जैसी सेंट्रल एजेंसियां भेजकर और मतदाता सूची में हेरफेर करके चुनाव जीतना चाहती है. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर भाजपा के लोग धरना स्थल पर पर्चे बांटते हुए या गड़बड़ी करते पकड़े गए, तो उनके खिलाफ FIR दर्ज की जाएगी.

हर विधानसभा सीट पर औसतन कितने वोट कटने का अनुमान है?

यदि 1 करोड़ वोट कटने का अनुमान सच साबित होता है, तो बंगाल की 294 सीटों के हिसाब से हर सीट पर लगभग 34,000 वोट कटेंगे. यह संख्या किसी भी उम्मीदवार की जीत या हार तय करने के लिए पर्याप्त है, क्योंकि कई सीटों पर हार-जीत का अंतर 5,000 से 15,000 के बीच होता है.

सबसे ज्यादा किन इलाकों में वोट कटने की संभावना है?

सबसे ज्यादा असर सीमावर्ती जिलों जैसे उत्तर और दक्षिण 24 परगना, मुर्शिदाबाद, मालदा और नदिया में होने की संभावना है. इन क्षेत्रों में पहचान और दस्तावेजों के सत्यापन को लेकर सबसे ज्यादा विवाद और आपत्तियां (Form-7) सामने आई हैं, जो TMC के मजबूत गढ़ हैं.

ममता बनर्जी SIR को वोट चोरी क्यों कह रही हैं?

ममता का आरोप है कि भाजपा डिजिटल पोर्टल्स में तकनीकी छेड़छाड़ और माइक्रो-ऑब्जर्वर के माध्यम से जानबूझकर उनके समर्थकों के नाम हटवा रही है. वैध दस्तावेजों को स्वीकार न करना और अधिकारियों की शक्तियों में बदलाव को वे लोकतंत्र की हत्या और वोट की चोरी मानती हैं.

अभिषेक बनर्जी ने चुनाव आयोग को लिखी चिट्ठी में क्या मुख्य मांग की है?

अभिषेक बनर्जी ने मांग की है कि वोटर लिस्ट संशोधन की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन किया जाए, और जिन 63 लाख से अधिक लोगों के नाम पर आपत्ति है, उनकी विस्तृत व्याख्या दी जाए. साथ ही खारिज किए गए वैध दस्तावेजों को दोबारा स्वीकार किया जाए.

क्या इस प्रक्रिया से TMC के बड़े नेताओं पर भी असर पड़ा है?

जी हां, तृणमूल कांग्रेस का दावा है कि सिर्फ आम जनता ही नहीं, बल्कि कई जनप्रतिनिधि, मंत्री और सरकारी अधिकारियों के नाम भी मतदाता सूची से या तो हटा दिए गए हैं या उन्हें ‘वेरिफिकेशन’ की श्रेणी में डाल दिया गया है, जो पार्टी के लिए चिंता का विषय है.

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