Last Updated:February 06, 2026, 13:45 IST
मीर यार बलोच ने न्यूज़ 18 को इंटरव्यू में कहा अगर पाकिस्तान ने बलूचिस्तान की अमीर और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ज़मीन पर मिलिट्री हमला करके कब्ज़ा नहीं किया होता, तो पाकिस्तान अपने जन्म के एक साल के अंदर ही खत्म हो जाता.

बलूचिस्तान में जारी हिंसा, मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों और तेज़ होते सशस्त्र टकराव के बीच, फ्री बलूचिस्तान मूवमेंट से जुड़े प्रतिनिधि, लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता मीर यार बलोच ने न्यूज़ 18 को एक विस्तृत एक्सक्लूसिव इंटरव्यू दिया. बातचीत के दौरान उन्होंने जबरन गुमशुदगी, धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने के आरोप, प्राकृतिक संसाधनों के कथित दोहन और बलूच समाज पर व्यापक सैन्य अभियानों जैसे मुद्दों पर खुलकर अपना पक्ष रखा.
इस इंटरव्यू में मीर यार बलोच ने बलूच इतिहास, मौजूदा संघर्ष की जटिलताएं, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी, CPEC परियोजनाओं और भारत के साथ संभावित संबंधों जैसे कई संवेदनशील विषयों पर अपने संगठन और आंदोलन का दृष्टिकोण विस्तार से साझा किया. इसी क्रम में उन्होंने एक बड़ा दावा करते हुए कहा कि यदि “पाकिस्तान ने बलूचिस्तान की रणनीतिक रूप से अहम ज़मीन पर सैन्य कार्रवाई कर कब्ज़ा न किया होता, तो उनके मुताबिक पाकिस्तान अपने गठन के एक साल के भीतर ही बिखर सकता था”.
उनसे यह सवाल भी पूछा गया कि पाकिस्तान सेना पर बलोच लोगों के खिलाफ जबरन गुमशुदगी, धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुँचाने, संसाधनों के कथित दोहन और गंभीर हिंसा जैसे आरोपों को वे किस नज़र से देखते हैं. इस पर मीर यार बलोच ने अपने संगठन और आंदोलन का पक्ष रखते हुए विस्तार से जवाब दिया.
मीर यार बलोच ने दावा किया कि उनका संगठन लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की नीतियों और कार्रवाईयों को उजागर करता रहा है. उनके अनुसार, पाकिस्तान खुद को इस्लाम का संरक्षक बताता है, लेकिन बलूचिस्तान में हुई सैन्य कार्रवाइयों के दौरान धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुँचाया गया. उन्होंने आरोप लगाया कि कई मस्जिदें भारी हथियारों की कार्रवाई में प्रभावित हुईं, जिनमें तत्कालीन बलूच शासक मीर अहमद यार खान के महल परिसर की एक ऐतिहासिक मस्जिद भी शामिल बताई जाती है, जहाँ आज भी संघर्ष के निशान दिखाई देने का उनका दावा है.
इतिहास के संदर्भ में उन्होंने कहा कि 1947 के बाद की राजनीतिक परिस्थितियों में बलूचिस्तान को जबरन पाकिस्तान में शामिल किया गया. उनके मुताबिक, उस समय के निर्णयों में बाहरी शक्तियों की भूमिका रही और 27 मार्च 1948 को हुई कार्रवाई को वे गैर-कानूनी सैन्य कब्ज़ा मानते हैं. उन्होंने यह भी दावा किया कि यदि पाकिस्तान ने बलूचिस्तान के रणनीतिक और संसाधन-संपन्न इलाके पर सैन्य नियंत्रण स्थापित न किया होता, तो नया बना पाकिस्तान आंतरिक संकटों के कारण जल्दी ही कमजोर पड़ सकता था.
मीर यार बलोच के अनुसार, बलूच शासक अहमद यार खान के छोटे भाई प्रिंस अब्दुल करीम बलूच और उनके समर्थकों ने उस समय विरोध किया था, जबकि कथित तौर पर बलूच प्रतिनिधि संस्थाओं ने भी पाकिस्तान में विलय के प्रस्ताव को अस्वीकार किया था. उन्होंने कहा कि बलूच आंदोलन का उद्देश्य क्षेत्र को लंबे समय से जारी संघर्ष और अस्थिरता से मुक्त कराना है. साथ ही उनका दावा है कि यदि बलूचिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता मिलती है, तो क्षेत्रीय संसाधनों का उपयोग अलग ढंग से होगा और इससे क्षेत्रीय शांति को बढ़ावा मिल सकता है.
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Mohit Chauhan is an experienced Editorial Researcher with over seven years in digital and television journalism. He specializes in Defence, Relations and Strategic Military Affairs, with a strong ...और पढ़ें
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Noida,Gautam Buddha Nagar,Uttar Pradesh
First Published :
February 06, 2026, 13:45 IST

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