Last Updated:March 07, 2026, 19:19 IST
आज के समय में घर, कार या अन्य जरूरतों के लिए लोन लेना आम बात हो गई है. लेकिन कई बार बढ़ती EMI सैलरी का बड़ा हिस्सा अपने साथ ले जाती है. ऐसे में महीने के अंत तक बजट संभालना कई लोगों के लिए चुनौती बन जाता है. हालांकि सही प्लानिंग और खर्चों पर नियंत्रण रखकर इस दबाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

नई दिल्ली. कई लोगों के लिए EMI जीवन का जरूरी हिस्सा बन चुकी है. घर, कार या शिक्षा जैसे बड़े खर्चों के लिए लिया गया लोन शुरुआत में संभालने लायक लगता है, लेकिन समय के साथ जब क्रेडिट कार्ड बिल, घरेलू खर्च और अन्य जिम्मेदारियां जुड़ जाती हैं तो मासिक बजट पर दबाव बढ़ने लगता है. अगर आपकी सैलरी भी महीने खत्म होने से पहले ही खत्म हो जाती है, तो यह संकेत है कि आपको अपनी वित्तीय योजना पर दोबारा नजर डालने की जरूरत है.
नए कर्ज से बचें और खर्च पर लगाएं लगाम
जब पैसों की कमी महसूस होती है तो कई लोग नया लोन लेकर पुराने खर्च संभालने की कोशिश करते हैं. लेकिन यह तरीका अक्सर कर्ज का बोझ और बढ़ा देता है. ऐसे में सबसे पहले गैर-जरूरी खर्चों को कम करना जरूरी है. क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल सोच-समझकर करें और फालतू शॉपिंग, बार-बार बाहर खाना या महंगी लाइफस्टाइल पर लगाम लगाएं. छोटी-छोटी बचत भी समय के साथ बड़ा फर्क पैदा कर सकती है.
कई लोन को एक साथ मैनेज करना आसान बनाएं
अगर आपके ऊपर कई तरह के लोन हैं, तो अलग-अलग EMI और ब्याज दरों को संभालना मुश्किल हो सकता है. ऐसी स्थिति में लोन कंसॉलिडेशन यानी कई लोन को मिलाकर एक लोन बनाना मददगार हो सकता है. इससे आपको हर महीने सिर्फ एक EMI चुकानी होगी और ब्याज दर भी कम हो सकती है. इसके अलावा आप अपने मौजूदा लोन को ऐसे बैंक में ट्रांसफर करने पर भी विचार कर सकते हैं जो कम ब्याज दर की पेशकश कर रहा हो.
50-30-20 बजट नियम से संतुलित रखें खर्च
वित्तीय विशेषज्ञ आमतौर पर 50-30-20 नियम अपनाने की सलाह देते हैं. इस नियम के अनुसार आपकी आय का लगभग 50 प्रतिशत जरूरी खर्चों जैसे किराया, राशन, बिल और EMI पर जाना चाहिए. करीब 30 प्रतिशत हिस्सा मनोरंजन, शॉपिंग या अन्य व्यक्तिगत जरूरतों पर खर्च किया जा सकता है. वहीं कम से कम 20 प्रतिशत रकम बचत या निवेश के लिए अलग रखनी चाहिए. अगर EMI आपकी आय के 50 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा ले रही है, तो यह आर्थिक दबाव का संकेत हो सकता है.
इमरजेंसी फंड बनाना है बेहद जरूरी
अचानक आने वाले खर्च जैसे बीमारी, नौकरी का नुकसान या घर की मरम्मत जैसी स्थितियां वित्तीय स्थिति को बिगाड़ सकती हैं. ऐसे समय में इमरजेंसी फंड बहुत काम आता है. विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि कम से कम तीन से छह महीने के खर्च के बराबर रकम का इमरजेंसी फंड होना चाहिए. शुरुआत में छोटी रकम से बचत शुरू करें और हर महीने थोड़ा-थोड़ा जोड़ते रहें. इससे भविष्य में अचानक आने वाले खर्चों से निपटना आसान हो जाएगा और कर्ज का दबाव भी कम महसूस होगा.
About the Author
Rakesh Singh is a chief sub editor with 14 years of experience in media and publication. affairs, Politics and agriculture are area of Interest. Many articles written by Rakesh Singh published in ...और पढ़ें
Location :
New Delhi,Delhi
First Published :
March 07, 2026, 19:19 IST

1 hour ago
