BJP Rajya Sabha Candidate: राहुल स‍िन्‍हा कौन हैं, ज‍िन्‍हें बीजेपी ने द‍िया राज्‍यसभा का ट‍िकट

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राहुल स‍िन्‍हा कौन हैं, ज‍िन्‍हें बीजेपी ने द‍िया राज्‍यसभा का ट‍िकट

Last Updated:March 03, 2026, 16:08 IST

Rahul Sinha BJP Rajya Sabha Candidate: राहुल सिन्हा का राज्यसभा जाना केवल एक व्यक्ति की जीत नहीं है, बल्कि बंगाल के उन हजारों अज्ञात बीजेपी कार्यकर्ताओं के धैर्य और समर्पण का सम्मान है, जिन्होंने राज्य में बदलाव की उम्मीद में दशकों तक संघर्ष किया है.

राहुल स‍िन्‍हा कौन हैं, ज‍िन्‍हें बीजेपी ने द‍िया राज्‍यसभा का ट‍िकटZoom

राहुल स‍िन्‍हा बंगाल बीजेपी के कद्दावर नेता हैं.

बीजेपी ने राज्यसभा चुनाव के लिए पश्चिम बंगाल से अपने वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राहुल सिन्हा को उम्मीदवार बनाया है. यह फैसला सिर्फ एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं है, बल्कि बंगाल में दशकों तक पार्टी का झंडा बुलंद रखने वाले एक आक्रामक और वफादार सिपाही को दिया गया एक बड़ा इनाम है. जब बंगाल में बीजेपी का कोई मजबूत जनाधार नहीं था, तब राहुल सिन्हा ही वह चेहरा थे जो वामदलों और बाद में तृणमूल कांग्रेस की आक्रामक राजनीति से सीधे टकरा रहे थे.

राहुल सिन्हा लंबे समय से आरएसएस और बीजेपी से जुड़े रहे हैं. बंगाल में जब बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ना हार की गारंटी माना जाता था, तब भी उन्होंने पार्टी के लिए कई चुनाव लड़े. उन्हें उच्च सदन भेजना कैडर के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि पार्टी अपने मूल और वफादार कार्यकर्ताओं को कभी दरकिनार नहीं करती.

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पुराने चेहरे को सम्‍मान
पश्चिम बंगाल में 2026 में विधानसभा चुनाव होने हैं. राज्य में पार्टी के भीतर अक्सर पुराने बीजेपी कार्यकर्ताओं और अन्य दलों विशेषकर TMC से आए नेताओं के बीच तालमेल की कमी की खबरें आती हैं. राहुल सिन्हा जैसे कद्दावर और सर्वमान्य पुराने नेता को आगे करके बीजेपी अपने कोर कैडर को एकजुट और उत्साहित करना चाहती है.

संसद में बंगाल की मुखर आवाज
राहुल सिन्हा अपने तीखे और आक्रामक भाषणों के लिए जाने जाते हैं. राज्यसभा में उनकी उपस्थिति से बीजेपी को ममता सरकार और टीएमसी की नीतियों के खिलाफ संसद के भीतर एक बेहद मुखर और बेबाक आवाज मिल जाएगी.

कैसा रहा राजनीतिक सफर

राहुल सिन्हा का राजनीतिक ग्राफ उनके प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद तेजी से ऊपर चढ़ा. वे 2009 से 2015 तक पश्चिम बंगाल बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रहे (इनके बाद दिलीप घोष ने यह पद संभाला था). वर्ष 2012 में, पश्चिम बंगाल भारतीय जनता पार्टी के दो महीने तक चले संगठनात्मक चुनावों के बाद सिन्हा को लगातार दूसरी बार तीन साल के लिए प्रदेश अध्यक्ष चुना गया था. अध्यक्ष के रूप में उनका यह कार्यकाल बंगाल बीजेपी के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. उनके नेतृत्व में ही पार्टी ने 2013 के पंचायत चुनावों में मजबूती से कदम रखा और वामदलों के पतन के बीच खुद को मुख्य विपक्ष के रूप में पेश करना शुरू किया. इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने पार्टी का कुशल नेतृत्व किया. 2014 का चुनाव ऐतिहासिक था क्योंकि राहुल सिन्हा के अध्यक्ष रहते हुए बीजेपी ने बंगाल में लगभग 17% वोट शेयर हासिल किया और दार्जिलिंग के साथ-साथ आसनसोल की लोकसभा सीट भी जीती. इस मजबूत प्रदर्शन ने ही राज्य में 2019 और 2021 में बीजेपी की बड़ी सफलताओं की असल नींव रखी थी.

बंगाल में बीजेपी का आक्रामक चेहरा
राहुल सिन्हा को हमेशा से बंगाल में बीजेपी का आक्रामक चेहरा माना जाता रहा है. बंगाल की राजनीति हमेशा से चुनौतीपूर्ण और हिंसक रही है. पहले वाम मोर्चा का 34 साल का वर्चस्व और फिर ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का उदय, इन दोनों ही दौर में सड़क पर उतरकर विपक्ष की राजनीति करना आसान नहीं था.

सिन्हा ने इस खौफनाक माहौल में बीजेपी कार्यकर्ताओं में जोश भरा. सड़कों पर उतरकर जन-आंदोलन करना, टीएमसी की ‘तुष्टीकरण की राजनीति’ पर सीधे और तीखे प्रहार करना, और पुलिस की लाठियों का डटकर सामना करना, ये राहुल सिन्हा की कार्यशैली का हिस्सा रहे हैं. जब राज्य में बीजेपी को मुख्यधारा की राजनीति में गंभीरता से नहीं लिया जाता था, तब राहुल सिन्हा की इसी आक्रामक शैली और बुलंद आवाज ने मीडिया और जनता का ध्यान पार्टी की ओर खींचा.

लगातार चुनावी संघर्ष
प्रदेश अध्यक्ष के पद से अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद, पार्टी ने उनके लंबे सांगठनिक अनुभव का सम्मान करते हुए उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय सचिव नियुक्त किया. उन्होंने पार्टी के केंद्रीय संगठन में अहम भूमिका निभाई और राष्ट्रीय स्तर पर बंगाल के मुद्दों को उठाया.

सच्‍चे स‍िपाही की तरह काम
चुनावी राजनीति की बात करें तो राहुल सिन्हा ने पार्टी के सच्चे सिपाही की तरह निर्देश मिलने पर हमेशा कठिन सीटों से चुनाव लड़ा है. वे कोलकाता उत्तर से लोकसभा चुनाव और जोरासांको तथा हावड़ा जैसी चुनौतीपूर्ण सीटों से विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं. भले ही चुनावी अंकगणित और टीएमसी के मजबूत चक्रव्यूह के कारण वे जीत दर्ज नहीं कर पाए, लेकिन उन्होंने हर चुनाव में पार्टी का वोट बैंक बढ़ाया, कैडर का मनोबल टूटने नहीं दिया और कभी भी पाला बदलने की राजनीति नहीं की.

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Gyanendra Mishra

Mr. Gyanendra Kumar Mishra is associated with hindi.news18.com. working on home page. He has 20 yrs of rich experience in journalism. He Started his career with Amar Ujala then worked for 'Hindustan Times Group...और पढ़ें

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Delhi,Delhi,Delhi

First Published :

March 03, 2026, 16:08 IST

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