Last Updated:March 03, 2026, 15:20 IST
ईरान-इजरायल तनाव के बीच कतर के बड़े LNG प्लांट के बंद होने से वैश्विक गैस बाजार में भूचाल आ गया है. यूरोप में गैस कीमतें एक हफ्ते में 40 फीसदी से ज्यादा उछल गईं और एशिया में भी आपूर्ति की होड़ मच गई. इस संकट का सबसे बड़ा फायदा अमेरिकी LNG निर्यातकों को मिलता दिख रहा है. वहीं भारत जैसे आयातक देशों के लिए बढ़ती कीमतें और सप्लाई जोखिम चिंता बढ़ा रहे हैं.

नई दिल्ली. ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच ऊर्जा बाजार में जबरदस्त उथल-पुथल देखने को मिल रही है. कतर के बड़े LNG प्लांट के बंद होने के बाद यूरोप और एशिया में गैस की कीमतें तेजी से बढ़ीं. इस हालात का सबसे बड़ा फायदा अमेरिकी LNG निर्यातकों को होता दिख रहा है. वहीं भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए यह चिंता का विषय बन गया है.
कतर प्लांट बंद, यूरोप में गैस की कीमतों में आग
ईरानी ड्रोन हमले के बाद कतर के रास लफान LNG प्लांट में उत्पादन रोक दिया गया. यह दुनिया के सबसे बड़े निर्यात केंद्रों में से एक है और वैश्विक आपूर्ति का बड़ा हिस्सा यहीं से जाता है. जैसे ही उत्पादन रुका, यूरोप के बेंचमार्क डच TTF गैस कॉन्ट्रैक्ट में करीब 45 फीसदी की छलांग लग गई और कीमत 46 यूरो प्रति मेगावॉट-घंटे के पार पहुंच गई. ब्रिटेन में भी प्राकृतिक गैस की कीमतें लगभग 45 फीसदी तक चढ़ गईं. एशियाई खरीदारों ने भी तेजी से अतिरिक्त आपूर्ति सुरक्षित करने की कोशिश की. बाजार में डर यह है कि अगर कतर से सप्लाई लंबे समय तक बाधित रहती है, तो गैस की वैश्विक कमी और गहरा सकती है.
अमेरिकी निर्यातकों की दौड़, टेक्सास से बढ़ेगा निर्यात
कतर में सप्लाई रुकने के बाद अमेरिका की बड़ी कंपनियां जैसे Venture Global और Cheniere Energy तेजी से अतिरिक्त LNG कार्गो बाजार में उतारने की कोशिश कर रही हैं. टेक्सास और लुइसियाना के टर्मिनलों से ज्यादा से ज्यादा गैस भेजने की तैयारी है. अमेरिका 2023 में दुनिया का सबसे बड़ा LNG निर्यातक बन चुका है. उसने 100 मिलियन मीट्रिक टन से ज्यादा LNG विदेशों को भेजी. कई नए प्लांट निर्माणाधीन हैं, लेकिन उन्हें पूरी क्षमता से काम शुरू करने में महीनों या साल लग सकते हैं. गोल्डन पास जैसी बड़ी परियोजना जल्द उत्पादन शुरू कर सकती है, पर उसे भी पूरी रफ्तार पकड़ने में समय लगेगा. दिलचस्प बात यह है कि यूरोप और एशिया में कीमतों में 40 फीसदी से ज्यादा उछाल आया, जबकि अमेरिका में गैस की कीमतें केवल 3-4 फीसदी ही बढ़ीं. इसका मतलब है कि अमेरिकी कंपनियां कम घरेलू कीमत पर खरीदकर महंगे अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचकर मोटा मुनाफा कमा सकती हैं.
क्या अमेरिका पूरी कमी भर पाएगा?
विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका पूरी तरह कतर की कमी की भरपाई नहीं कर सकता. अगर कतर का प्लांट लंबे समय तक बंद रहता है या बुनियादी ढांचे को नुकसान होता है, तो गैस बाजार में 2022 जैसी बड़ी हलचल देखी जा सकती है, जब रूस ने यूरोप को पाइपलाइन गैस रोक दी थी. अमेरिकी कंपनियां जितना संभव होगा, उतना कार्गो जहाजों पर लादेंगी. लेकिन उत्पादन क्षमता सीमित है. फिर भी स्पॉट मार्केट में जिन कंपनियों के पास खुला कार्गो है, वे 40-50 फीसदी ऊंचे दाम पर बेचकर बड़ा फायदा उठा सकती हैं. यही वजह है कि कुछ अमेरिकी ऊर्जा कंपनियों के शेयरों में भी तेजी देखने को मिली है.
भारत के लिए कितना बड़ा खतरा?
भारत के लिए यह स्थिति संवेदनशील है क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है. लगभग 60 फीसदी LNG आयात कतर और यूएई से आता है और यह सप्लाई होरमुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरती है. अगर इस रास्ते में रुकावट आती है तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ेगा. सरकारी सूत्रों के मुताबिक, भारत के पास फिलहाल अल्पकालिक संकट से निपटने के लिए पर्याप्त बफर स्टॉक है. LNG और LPG की जरूरत लगभग 15 दिन तक और कच्चे तेल का भंडार करीब 45 दिन तक चल सकता है. लेकिन यदि संकट लंबा खिंचता है, तो आयात बिल में तेज बढ़ोतरी तय है. विश्लेषकों का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमत में हर 1 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का सालाना आयात बिल करीब 2 अरब डॉलर बढ़ जाता है. LNG की महंगाई से उर्वरक, बिजली उत्पादन और सिटी गैस नेटवर्क की लागत बढ़ सकती है. इसका असर घरेलू गैस टैरिफ और सरकारी सब्सिडी पर भी पड़ सकता है.
आगे क्या? बाजार की नजर होरमुज पर
इस पूरे संकट की जड़ में कतर के प्लांट का बंद होना और ईरान की ओर से होरमुज जलडमरूमध्य को लेकर दी गई चेतावनी है. यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा रास्तों में से एक है. अगर यहां आवाजाही बाधित होती है, तो वैश्विक गैस और तेल बाजार में और तेज उछाल आ सकता है. फिलहाल बाजार की नजर इस बात पर टिकी है कि कतर में उत्पादन कब बहाल होगा और क्या होरमुज सुरक्षित रहेगा. तब तक अमेरिकी LNG निर्यातक ऊंची कीमतों का लाभ उठाते रहेंगे, जबकि भारत जैसे आयातक देशों को महंगी ऊर्जा का दबाव झेलना पड़ सकता है.
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Rakesh Singh is a chief sub editor with 14 years of experience in media and publication. affairs, Politics and agriculture are area of Interest. Many articles written by Rakesh Singh published in ...और पढ़ें
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New Delhi,Delhi
First Published :
March 03, 2026, 15:20 IST

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